राजहंस : दवाओं का एजेन्ट केवलकृष्ण बना : उपन्यासकार राजहंस - प्रतिध्वनि

कविता, कहानी, संस्मरण अक्सर लेखक के मन की आवाज की प्रतिध्वनि ही होती है जो उसके समाज रुपी दीवार से टकराकर कागज पर उकेरी जाती है। यह कोना उन्हीं प्रतिध्वनियों को दर्ज करने की जगह है।

गुरुवार, 20 मई 2021

राजहंस : दवाओं का एजेन्ट केवलकृष्ण बना : उपन्यासकार राजहंस

विजय कुमार मलहोत्रा के पास राणा प्रताप बाग में अन्दरूनी रोड पर सड़क के मुहाने पर काफी बड़ी जगह थी। 


उसी पते पर विजय कुमार मलहोत्रा ने विजय पाकेट बुक्स की नींव रखी।


विजय कुमार मलहोत्रा की अशोक पाकेट बुक्स के स्वामी बसन्त सहगल से अच्छी दोस्ती थी। अक्सर उन दोनों का राणा प्रताप बाग स्थित विजय पाकेट बुक्स के आफिस में अथवा शक्ति नगर स्थित बसन्त जी की बैठक में जमावड़ा होता। संयोगवश मैं गिनती के उस खुशकिस्मतों में हूँ, जिसे दोनों जगह बैठने का अवसर मिला। 


पूरा आलेख पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ: दवाओं का एजेंट केवलकृष्ण बना उपन्यास राजहंस


विजय पॉकेट बुक्स से प्रकाशित राजहंस के उपन्यास


बाद का किस्सा -  राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स


हिन्द - मनोज और विजय पाकेट बुक्स के बीच सनसनीखेज मुकदमा में आप पढ़ेंगे, लेकिन खास बात अभी बता दूँ कि विजय पाकेट बुक्स की इस लिस्ट में आखिरी बहुत से उपन्यास केवलकृष्ण कालिया के लिखे नहीं हैं। कुछ उपन्यास यशपाल वालिया के लिखे थे और कुछ उस समय लुधियाना और बाद में डलहौजी में रहने वाले सरदार लेखक हरविन्दर के, किन्तु वह किस्सा अगली बार...। 


इस बार यह तो आप जान गये कि एक मामूली दवा कम्पनी का मामूली सा सेल्स एजेन्ट (वह दवा कम्पनी बाद में बन्द भी हो गई थी) केवलकृष्ण, किस तरह एक विख्यात उपन्यासकार 'राजहंस' बन गया है। 


शायद इसे ही किस्मत कहते हैं।


2 टिप्‍पणियां:

  1. सुरेन्द्र मोहन पाठक जी का अत्यन्त लोकप्रिय उपन्यास 'लाश ग़ायब' अशोक पॉकेट बुक्स ने ही प्रकाशित किया था और रामबली सीरीज़ के उपन्यासों के बाद के संस्करण 'जराजहंस' के नाम से ही प्रकाशित हुए थे। पाठक जी की आत्मकथा से उस युग के विषय में जानकारियां मिलीं। आपके लेखों से भी बहुत कुछ जानने को मिल रहा है।

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    1. शुक्रिया!
      पाठक जी से अशोक पॉकेट बुक्स के सहगल साहब की दोस्ती जितनी पुरानी थी, उस लिहाज़ से पाठक साहब ने छापने के लिए उन्हें उपन्यास बहुत देर में दिए- वह भी रीप्रिंट, क्योंकि पाठक साहब दोस्ती में भी, अपने पारिश्रमिक में रियायत करने के आदी नहीं हैं !
      और विजय कुमार मल्होत्रा जी ने मुझसे रामबली सीरीज के जो पेज लिखवाये थे ! वे इस्तेमाल हुए या नहीं, पता नहीं ! विजय बाबू ने कहा तो था कि वो पेज केवल (राजहंस ) को दे दूंगा, पर दिए या मेरी लिखी शानदार कहानी नष्ट कर दी गयी, यह मुझे नहीं मालूम! मेरे साथ ऐसा एक बार पहले भी राज पॉकेट बुक्स में हुआ था ! जब सूरज नाम से पहला उपन्यास "दोस्ती" मेरे द्वारा लिखा उपन्यास छपना था!
      इस बारे में भी एक एपिसोड लिखूंगा !
      आपका शुक्रिया !
      आपके कमैंट्स से याद आ गया ! बहुत-बहुत धन्यवाद !

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