प्रतिध्वनि: सवाल-जवाब

कविता, कहानी, संस्मरण अक्सर लेखक के मन की आवाज की प्रतिध्वनि ही होती है जो उसके समाज रुपी दीवार से टकराकर कागज पर उकेरी जाती है। यह कोना उन्हीं प्रतिध्वनियों को दर्ज करने की जगह है।

शनिवार, 7 मई 2022

लेखक राजहंस की विशिष्ट लेखन शैली कैसे परिवर्तित होती चली गई

मई 07, 2022 3




ब्लॉग पर राजहंस बनाम विजय पॉकेट बुक्स -1 पर डॉक्टर ओंकार नायाराण सिंह जी का एक प्रश्न आया। मुझे लगता है उस प्रश्न का उत्तर राजहंस के अन्य पाठकों के लिए महत्वपूर्ण होगा इसलिए पोस्ट के रूप में भी लिख रहा हूँ।


प्रश्न: समस्त किश्तों के विवेचन एवं अपने पास संग्रहीत राजहंस के उपन्यासों के अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि उनकी विशिष्ट लेखन शैली कैसे परिवर्तित होती चली गई।क्या आप उनके परवर्ती जीवन की जानकारी से अवगत करा सकते हैं? 


मेरा उत्तर:

आदरणीय ओंकार जी, 

सादर सप्रेम नमस्कार! 


जैसा कि आपने जानना चाहा है कि राजहंस की विशिष्ट शैली समय के अन्तराल में कैसे परिवर्तित होती चली गई तो मैं यह कहना चाहूँगा कि कुछ थोड़ा सा परिवर्तन तो मैं स्वीकार करता हूँ और उसका कारण था आरम्भ में वह भी आरिफ़ मारहर्वी, जमील अंजुम, अंजुम अर्शी की तरह उर्दू में ही लिखते थे और उनका हिन्दी ट्रांसलेशन होता था, लेकिन सात आठ उपन्यासों के बाद वह हिन्दी में लिखने लगे तो कुछ उर्दू अल्फ़ाज़ों का मोह सम्भवतः छोड़ दिया और विजय पाकेट बुक्स से मनोज और हिन्द में जाते ही, उन दोनों जगहों पर काम करने वाले प्रूफरीडर्स ने सम्भवतः कुछ ज्यादा ही छेड़छाड़ कर दी! 


आप नोट करेंगे तो जानेंगे कि शैली परिवर्तन का असर विजय पाकेट बुक्स के आरम्भिक उपन्यासों में नाममात्र है, लेकिन बाद में एक मजबूरी यह आ गई थी कि हाइकोर्ट की डीबी (डबल बेंच) ने प्रकाशकों और लेखक को जता दिया था कि या तो कम्प्रोमाइज़ कीजिये या नाम पर बैन लगना सम्भव था! 


ऐसे में मुकदमे के बाद विजय पाकेट बुक्स से छपने वाले सभी उपन्यास यशपाल वालिया और हरविन्दर के लिखे हुए थे! 


और हिन्द पाकेट बुक्स के कर्ता धर्ता तो आरम्भ में राजहंस की शैली में 'था, थे, थी' के प्रयोग को दोषपूर्ण मानते थे और तब के साहित्यिक लेखक तो 'राजहंस' को गुलशन नन्दा से भी घटिया लेखक मानते थे और हिन्द पाकेट बुक्स में साहित्यिक रुचि वाले लोगों का प्रभुत्व था, वहाँ के एडीटर व प्रूफरीडर्स भी साहित्यिक अभिरुचि के थे, इसलिए हिन्द पाकेट बुक्स की पुस्तकों में शैली परिवर्तित नज़र आयेगी! 


वस्तुतः केवलकृष्ण कालिया उर्फ़ राजहंस ने अपनी शैली परिवर्तित नहीं की थी! उनकी शैली उनके व्यक्तित्व में इस कदर रची-बसी थी कि वह चाहते तो भी परिवर्तित नहीं कर सकते थे, लेकिन जिनमें आपको राजहंस की शैली परिवर्तित नज़र आयी, वे उपन्यास या तो हिन्द पाकेट बुक्स के होंगे या यशपाल वालिया अथवा हरविन्दर के लिखे! अथवा प्रूफरीडर्स तथा एडीटर्स की अति समझदारी का शिकार...! 


और हाँ, साहित्यिक क्षेत्र के बहुत से लेखक गुलशन नन्दा को न केवल घटिया लेखक मानते थे, बल्कि अश्लील लेखक कहते थे, इस बारे में बहुत जल्द गुलशन नन्दा जी से मनोज पाकेट बुक्स के अग्रवाल मार्ग, शक्तिनगर में हुई अपनी मुलाकात का ब्यौरा प्रस्तुत करूँगा, तब आप जानेंगे कि पल्प फिक्शन के मनोरंजक साहित्य प्रस्तुत करने वाले लेखकों को साहित्यिक लाबी किस कदर अछूत मानती थी! 


जय श्रीकृष्ण...!

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शुक्रवार, 25 जून 2021

सवाल-जवाब: कोई कहानी जो आपने लिखी और आपको बहुत पसंद हो?

जून 25, 2021 0

फेसबुक मित्र चेतन विश्वकर्मा द्वारा फेसबुक पर मुझसे एक प्रश्न पूछा। उस प्रश्न का उत्तर आपके समक्ष पेश है। 


मित्र चेतन विश्वकर्मा का प्रश्न:


कोई कहानी जो आपने लिखी और आपको बहुत पसंद हो?


मेरा उत्तर:


कोई नहीं, कई हैं। प्रणय नाम से छपे 'पापी' और 'कलियुग' दोनों ही पसन्द थे। यशपाल वालिया के नाम से छपने वाला 'लोक लाज' भी पसन्द धा। राजभारती जी के लिए लिखा 'चूहेदान'


कुमारप्रिय के लिए लिखा 'सौगात' जगदीश नाम के लिए लिखा 'बेवफा'भारत नाम के लिए लिखा 'माँ-बाप'सूरज नाम के लिए लिखा 'बेटी गरीब की'धीरज नाम के लिए लिखा 'सदा सुहागन'मोहन पाकेट बुक्स में लिखे 'बहन का सुहाग' और 'सौतेला बाप'एच. इकबाल नाम के लिए लिखे 'हत्यारों का बादशाह' और 'खूनी द्वीप'नकली ओमप्रकाश शर्मा के लिए लिखे 'जगत की अरब यात्रा' और 'जगत के दुश्मन'विक्रांत सीरीज़ के कई उपन्यास बेहद शानदार थे। 'विक्रांत के दुश्मन' के अलावा किसी का नाम याद नहीं। लेकिन रजत राजवंशी नाम से छपे 'रिवाल्वर का मिज़ाज', रिवाल्वर का नशा, रिवाल्वर का इंसाफ, पंगा। मगर रजत राजवंशी नाम से दो भागों में छपी कहानी 'डायल 101' और 'सब मरेंगे बारी-बारी' बहुत ज्यादा चर्चित हुए थे।


पर मुझे लगता है कि जो उपन्यास मैं लिख नहीं पाया या लिखने का अवसर नहीं पा सका, वे सर्वश्रेष्ठ होते। गंगा पाकेट बुक्स से 'लाश की दुल्हन' और लक्ष्मी पाकेट बुक्स से 'मिट्टी का ताजमहल'


और अब तो लगता है कि जो अब भविष्य में लिखने का विचार है

  1. कब तक जियें
  2. मेरी पत्नी : मेरी दुश्मन
  3. शीशे का आदमी
  4. टांगें बोलती हैं

यही सब उपन्यास बेहतरीन होंगे।


दरअसल मैं अधिकांशतः कोई भी उपन्यास लिखने से पहले उसके आरम्भ और अन्त और बीच का हल्का सा खाका दिमाग में तैयार कर लेता हूँ, फिर लिखना आरम्भ करता हूँ।


पर कामर्शियल लेखन में अक्सर बिना सोचे समझे ही उपन्यास आरम्भ कर देता था।


इस बारे में, मैं नये लेखकों को बेहतरीन लिखने के लिए टिप देने वाली एक श्रृंखला भी फेसबुक में आरम्भ करना चाहता हूँ, जोकि उनके लिए भी लाभप्रद होगी, जो लेखक नहीं हैं। मेरी उस श्रृंखला के बाद, जो लोग लेखक नहीं हैं, लेकिन भाषा पर उनकी पकड़ है, एक बेहतरीन पुस्तक लिख सकेंगे।


मेरा यह मानना है कि एक कहानी तो हर एक इन्सान के जीवन में भी होती है और एक कहानी तो हर एक इन्सान लिख सकता है, बस, उसे यह पता होना चाहिए कि कैसे लिखना है और क्या लिखना है।


मेरी उपरोक्त किताब उपन्यास तो नहीं होगी, लेकिन मेरी एक बहुत बेहतरीन कृति होगी।


रवि पाकेट बुक्स के स्वामी, मेरे अनुज सम प्रिय मनेश जैन अभी से उपरोक्त पुस्तक छापने का बीड़ा उठाने के लिए तैयार हो चुके हैं।


मुझे यकीन है कि मेरी उक़्त पुस्तक पढ़कर, जिसने कभी कलम नहीं उठाई, वह भी कलम उठाने का प्रयास अवश्य करेगा।


- योगेश मित्तल
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सवाल-जवाब: कैसे लिख पाया मैं एक साथ इतने सारे उपन्यास?

जून 25, 2021 0

अशोक शर्मा के फेसबुक पर दिए कमेन्ट पर कुछ और बातें याद आ गईं  पेश हैं 

अशोक शर्मा जी का कमेन्ट


बाप रे... ।

एक साथ इतने उपन्यास ।

इतने उपन्यास एक साथ लिखना मेरी नजर में तो असंभव ही है ।

और ये असंभव इसलिए लिख रहा हूँ, क्यों कि मैं भी एक उपन्यासकार रह चुका हूँ और मेरे उपन्यास राजा पॉकेट बुक्स और राधा पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हो चुके है । पर इतने तो क्या, मात्र दो उपन्यास भी एक साथ लिखना मेरे लिए तो असंभव ही था।

मान गए उस्ताद। चाचा चौधरी की तरह आपका दिमाग भी कंप्यूटर से तेज चलता है ।
लिखते रहिएगा।

पढ़कर सचमुच बहुत मजा आता है।

आपके संग मैं भी उपन्यासों की पुरानी दुनिया में पहुँच जाता हूँ।

अशोक जी के कमेन्ट पर याद आई कुछ बातें

पता नहीं कैसे उस समय ऐसा कर पाया। माता सरस्वती की तो मुझ पर बचपन से ही असीम कृपा रही। 

पर सबसे मुश्किल काम उस समय यह था कि कहानी के लिंक में कोई गड़बड़ी न रहे। दो- दो पेज करके लिखने और मैटर प्रेस में देते रहने में एक मुसीबत यह भी थी कि जो लिख दिया, सो लिख दिया। कथानक समाप्त करते हुए कुछ छूट गया। कोई गलती रह गई तो बाद में सुधारने की कोई गुंजाइश नहीं थी। बाल उपन्यास, चूँकि पाँच पाँच फार्म के थे (अस्सी पेज) इसलिए उनमें तो गलती रह जाने की सम्भावना नहीं थी, पर बड़े उपन्यासों में ईश्वर ने ही बचाया। एक उपन्यास 'प्रेम का खिलाड़ी' जरूर दो पार्ट का बन गया था।और अधजली लाश में मैटर ज्यादा लिखा गया था तो गंगा पाकेट बुक्स के स्वामी सुशील जैन ने उसका मैटर बचा कर, उसे जबरदस्ती पार्ट का बना दिया था। 


आज तो मैं भी यही सोचता हूँ कि बाप रे, कैसे लिखे गये थे सारे उपन्यास और प्रकाशकों से गालियाँ भी नहीं मिलीं, बल्कि चंचल नाम से छपे 'तुम्हारे लिए' और बेगम कानपुरी नाम के लिए लिखे गये 'बेवफा' को सतीश जैन ने बहुत पसन्द किया था। 

एक बात और उन दिनों बिमल चटर्जी, परशुराम शर्मा, आबिद रिज़वी, वेदप्रकाश शर्मा के साथ भी कई बार ऐसा अवसर आया था, जब एक-एक दो-दो फार्म लिख-लिख मैटर प्रेस में देते रहना पड़ता था। 

पर एक साथ एक से अधिक उपन्यास लिखने वाला बकरा बनने की नौबत मेरे साथ ही आई थी। 

उन दिनों चन्द्रकिरण जैन के पिताजी, मेरे प्रकाशक और मकानमालिक को मुझ पर बहुत तरस आता था और वो मुझसे कहते थे- अपने शरीर और दिमाग को इतना मत थका, पागल हो जायेगा। और लोगों को मना करना सीख, मना करने से तू छोटा नहीं होगा, बड़ा लेखक ही बनेगा। 

उनका नाम भूल रहा हूँ। चन्द्रकिरण जैन, राकेश जैन, मनेश जैन या मेरठ के कोई अन्य साथी याद दिला दें तो अच्छा लगेगा। 

-योगेश मित्तल
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शनिवार, 29 मई 2021

सवाल जवाब: फेसबुक मित्र मयूर सावला का मेरी कहानी 'प्यार तो बस प्यार है' पर एक सवाल

मई 29, 2021 0
योगेश मित्तल

फेसबुक मित्र मयूर सावला जी ने मेरी कहानी "प्यार तो बस, प्यार है" पढ़कर एक सवाल किया। सवाल और उसका मैंने जो जवाब दिया, वह आपके लिए प्रस्तुत है, जिससे आप भी कहानी और उपन्यास में अन्तर समझ पायें। 

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मयूर सावला जी का सवाल -

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सर जी, मूर्तिकार क्यों औरतों से नफरत करता था इसका कारण नहीं बताया। मूर्तिकार को कल्पना कों बिमारी में देखने के बाद उनके अच्छा होनें के लिए इश्वर से प्रार्थना की बाद में क्या वह परफेक्ट हों गई या यह कहानी का भाग नहीं था मुझे लगा इसलिए पूछ रहा हूँ। कहानी अच्छी थी।

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मेरा जवाब

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Mayur Savla 


कहानियों में कई चीजें स्पष्ट बताई नहीं जातीं, सिर्फ इशारा ही काफी होता है। प्रख्यात लेखक गोविन्द सिंह कहते थे कि पाठक लेखकों से ज्यादा अक्लमंद होते हैं। लेखक चालीस दिन लगाकर एक उपन्यास लिखता है और पाठक घंटे भर में पढ़कर, उसमें चालीस गलतियाँ निकाल देता है। 


मूर्तिकार कुबड़ा व कुरुप था। ऐसे इन्सान को उसके अच्छे व्यवहार से अगर कोई महिला पसन्द भी कर ले तो भी प्यार करेगी, यह सोचना भी गलत है। 


प्यार हर साधारण से साधारण इन्सान से किया जा सकता है, किन्तु किसी कुरुप से नहीं। कुरुप से सहानुभूति हो सकती है - प्यार नहीं। 


और एक कुरुप व्यक्ति द्वारा महिलाओं तो क्या सारे समाज को नापसन्द करना, या समाज से नफरत करना असम्भव नहीं है। फिर कहानियाँ उपन्यास नहीं होतीं, उनमें हर बात के कारण नहीं बताये जाते। अनावश्यक डिस्क्रिप्शन नहीं दिया जाता। कई बार कहानियों में अन्त भी अधूरा सा दिया जाता है  ताकि  पाठक स्वयं अनुमान लगाये। 


और कल्पना अच्छी हुई या बीमार रही या मर गई। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि कल्पना कहानी का एक सूक्ष्म सा हिस्सा है। न तो कल्पना कहानी का विषय है, ना ही मुख्य पात्र। 


और एक बार फिर ध्यान दें। कहानी उपन्यास नहीं होती। उपन्यास में बहुत सारे चरित्र होते हैं। बहुत से मुख्य पात्र होते हैं। जबकि कहानी में अमूमन एक या दो अथवा अधिक से अधिक तीन-चार मुख्य पात्र होते हैं। 


लेकिन इस कहानी में सिर्फ दो ही मुख्य पात्र हैं। कुबड़ा मूर्तिकार और उसका शिष्य...। 


विस्तारपूर्वक आपको इसलिए बताया है, जिससे नई पीढ़ी के लेखक भी कहानी और उपन्यास के फर्क को समझें और कहानी को उपन्यास की तरह ना लिखें। 


ध्यान दें - उपन्यास को आप कहानी की तरह लिख सकते हैं, लेकिन कहानी को उपन्यास की तरह नहीं लिख सकते। ना ही लिखा जाना चाहिए। 


कहानी को उपन्यास की तरह लिखने से कहानी के चरित्र मर जाते हैं। मुख्य पात्र और सहयोगी पात्र से उचित न्याय नहीं हो पाता। 

- योगेश मित्तल


नोट: आप भी अपने प्रश्न योगेश मित्तल जी को भेज सकते हैं। वह यथासंभव उनका उत्तर देने की कोशिश करेंगे। 

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शुक्रवार, 7 मई 2021

लेखक जो बम्बई गये और उनकी कहानी पर फिल्म बनी?

मई 07, 2021 2

प्रिय मित्र सत्य व्यास जी ने मेरी एक पोस्ट के कमेन्ट बाक्स में एक सवाल किया! सवाल निम्नांकित है -

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सत्य व्यास जी का सवाल

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योगेश जी,एक सवाल यह भी काफी दिनों से मन मे रहा। कृपया इस पर भी कभी बात हो कि वो कौन कौन से  पल्प/लोकप्रिय लेखक थे जो सफलता या यूं कहें फिल्मो की तलाश में मुम्बई गए। उनकी किन किताबों पर उनके नाम से  फिल्में बनी, या कौन सी कहानी वह बेनामी ही बेच आये और बाद में निर्माता निर्देशक ने अपने नाम से वो फिल्में बना लीं।


पूछने का कारण यह भी है कि पुरानी साधना प्रतापी, प्रेम वाजपेयी, प्यारेलाल आवारा इत्यादि की किताबों में इस बात की घोषणा तो मिलती है। मगर हम इन फिल्मों को ढूंढ नहीं पाते।


आपने राज भारती जी की मुम्बई भ्रमण की बात की तो यह सवाल जेहन में आ गया। 

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मेरा जवाब

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जहाँ तक मेरी जानकारी है - फिल्मों में सबसे पहले हिट होने वाले  पाकेट बुक्स लेखक गुलशन नन्दा थे - जिनके उपन्यास माधवी पर फिल्म काजल बनी। नीलकमल पर नीलकमल बनी। कटी पतंग पर कटी पतंग बनी। नया जमाना उनकी कहानी पर बनी। उसका स्क्रीन प्ले पाकेट बुक्स में बाद में आया। 


गुलशन नन्दा के बाद आरिफ मारहर्वीं साहब की कहानियों पर मिठुन चक्रवर्ती की रफ्तार, सुरक्षा, गनमास्टर जी - 9 आदि फिल्में आईं। 


इसके बाद हम वेद प्रकाश शर्मा का नाम ले सकते हैं, जिनके उपन्यास बहू माँगे इन्साफ पर फिल्म बहू की आवाज बनी, इसके अलावा विधवा का पति पर अनाम तथा लल्लू पर सबसे बड़ा खिलाड़ी। इनमें सिर्फ सबसे बड़ा खिलाड़ी ही हिट रही। 


इसके अलावा भी बहुत से पाकेट बुक्स लेखकों की कहानी पर फिल्में बनी होंगी, पर मेरे लिए विवरण देना सम्भव नहीं। 


फिल्मों में यदि किसी पाकेट बुक्स लेखक को आलवेज़ हिट माना जाये तो वह केवल गुलशन नन्दा ही रहे हैं। 


लेकिन नन्दा जी के फिल्मों में प्रवेश से पहले भी उनकी एक उपन्यास डरपोक पर फिल्म बनी थी, किन्तु उसका श्रेय कभी गुलशन नन्दा को नहीं मिल सका। 


एक सच्ची और कड़वी बात यह भी है कि फिल्म वाले लुगदी साहित्य से अक्सर प्लाट चुराते भी थे। 


पर तब लुगदी साहित्य में उपन्यास लिखने वाले भी फिल्मों से आइडिया लेते थे। पुराने फिल्मी लेखक पण्डित मुख राम शर्मा ऐसे लेखक थे, जिनकी लिखी फिल्मों की कहानियों से अनेक सामाजिक उपन्यासकारों ने आइडिया लिया और कामयाब उपन्यास लिखा। 


पर आइडिया लेने मात्र से कोई नकलची नहीं हो जाता, यह साबित किया - फिल्म "बम्बई का बाबू ने। 


लुगदी साहित्य के उपन्यासों पर फिल्म बनाने के बहुत किस्से होंगे और हो सकते हैं। सब के बारे में बताना सम्भव नहीं है। हालांकि अखबार पढ़ने की नियमित आदत होने और फिल्मी पत्रिकाओं के नजरों से गुजरते रहने के कारण मैं यह कहूँ कि मैंने कभी कुछ नहीं पढ़ा, मुझे कुछ नहीं मालूम, तो निस्संदेह गलत होगा। हाँ, इस विषय में याद्दाश्त का साथ बहुत ज्यादा नहीं मिल रहा, पर मैं एक बात दावे से कह सकता हूँ कि साहित्यिक क्षेत्र के लेखकों प्रेम चंद, शरत चन्द्र, बंकिमचन्द्र, रवीन्द्र नाथ टैगोर जैसे ख्याति प्राप्त लेखकों की रचनाओं पर फिल्म बनाते हुए किसी भी फिल्मकार ने कभी चोरी नहीं की। 


लेकिन लुगदी साहित्य कहें या  पल्प साहित्य कहें या पाकेट बुक्स साहित्य की कृतियों का ही फिल्मी लेखक आइडिया चुरा लेते थे, जिसके बारे में कई बार फिल्म के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर को पता ही नहीं होता। 


मुझे उपन्यासों के नाम तो नहीं याद, पर मनोज पाकेट बुक्स के संस्थापक और राज व राजा पाकेट बुक्स के स्वामी स्वर्गीय राज कुमार गुप्ता जी ने एक बार मुझसे कहा था कि सोमनाथ अकेला के सामाजिक उपन्यासों के आइडियाज कई फिल्म वालों ने चुराये हैं, लेकिन सोमनाथ अकेला ने कभी मुकदमे का विचार नहीं किया। कारण था - एक तो आर्थिक स्थिति और दूसरे वह मुकदमे की टेन्शन का शिकार नहीं होना चाहते थे। 


अपने जमाने में सोमनाथ अकेला, प्रेम बाजपेयी से भी ज्यादा लोकप्रिय थे। 


उनका एक उपन्यास "एक लड़की चौराहे की" मार्केट में आते ही दो दिन में ही बुक स्टालों से गायब हो गया था। 


एक लड़की चौराहे की ससुराल में सताई ऐसी लड़की की कहानी थी, जिसके माँ-बाप ने उसे विदा करते हुए समझा दिया था कि बेटी, अब ससुराल ही तेरा घर है। भले घर की लड़कियों की डोली मायके से उठती है और अर्थी ससुराल से ही उठनी चाहिए। 


एक अवसर ऐसा आता है, जब दहेज पर्याप्त न मिलने के कारण नायिका को ससुराल से धक्के मार कर घर से निकाल दिया जाता है और रोती-बिलखती नायिका एक ऐसे चौराहे पर पहुँच जाती है, जहाँ एक रास्ता उसके ससुराल से आता था और एक रास्ता मायके जा रहा होता है। तीसरा रास्ता वेश्याओं के कोठों की ओर जाता था और चौराहे का चौथा रास्ता किसी नदी या रेल की पटरियों की ओर जाता था। जहाँ वह आत्महत्या कर सकती है। पूरी तरह कहानी याद नहीं, पर पचास से सत्तर के अर्से में कई फिल्मों में ऐसी सिचुएशन क्रियेट थी, यह स्वर्गीय राज कुमार गुप्ता जी का कहना था। 


पाकेट बुक्स में सबसे पहले सबसे ज्यादा चर्चित हुए गुलशन नन्दा का एक उपन्यास था - डरपोक।


1960 में प्रदर्शित राज खोसला निर्देशित फिल्म "बम्बई का बाबू" डरपोक उपन्यास की ही कहानी थी। किन्तु फिल्म के कहानीकारों में विख्यात साहित्यकार उपन्यासकार व फिल्मी लेखक राजिन्दर सिंह बेदी और एम. आर. कामथ का नाम था। अपने शुभचिन्तकों की सलाह पर गुलशन नन्दा जी ने फिल्म बनाने वालों को नोटिस भेजा, किन्तु फिल्मी लेखकों का कहना था कि यह आइडिया उन्होंने ओ. हेनरी की कहानी से लिया है। नन्दा जी को उस फिल्म की कहानी का श्रेय नहीं मिला। हालांकि उन दिनों गुलशन नन्दा इतने ज्यादा पढ़े जाते थे कि असम्भव नहीं लेखक द्वय कामथ और बेदी ने नन्दा जी का उपन्यास और ओ. हेनरी की कहानी दोनों पढ़े हों और आइडिया नन्दा जी के उपन्यास से ही विकसित किया हो। 


इन्टरनेट पर बम्बई का बाबू के बारे में वर्णन है कि देवआनंद अभिनीत राज खोसला दवारा निर्देशित बम्बई का बाबू फिल्म की कहानी में राजिंदर बेदी और एम.आर कामथ ने O Henry की कहानी A Double Dyed Deceiver से प्रेरित प्रसंगों को रखा और इसमें इनसेस्ट के कोण का मिश्रण करके हिंदी सिनेमा के लिए इसे एक बिल्कुल भिन्न फिल्म बना दिया जिसके कथानक की बराबारी न तो इससे पहले बनने वाली हिंदी फ़िल्में कर सकती हैं न बाद में बनने वाली| सत्तर के दशक में जब बी.आर.चोपडा के सुपुत्र रवि चोपडा ने निर्देशन की कमान संभाली तो उन्होंने बम्बई का बाबू के कथानक को कम तनाव उत्पन्न करने वाला बनाकर अमिताभ और सायरा बानो को लेकर जमीर फिल्म का निर्माण किया|


भाई बहन के आदर्श रूप पर जाएँ तो सतह पर फिल्म में इनसेस्ट का पुट है लेकिन यह फिल्म का मकसद नहीं कि हॉलीवुड की फिल्मों The Cement Garden और Desire Under the Elms की भांति इनसेस्ट को खंगालें, बल्कि यहाँ फिल्म नायक नायिका के मध्य एक गलतफहमी, जिसे नायक तो जानता है अतः उसके दिमाग में सब कुछ स्पष्ट है, परन्तु नायिका सच से अनभिज्ञ है अतः तनावग्रस्त है, के कारण उपजी तनावग्रस्त स्थितियों में उनके मानसिक संघर्षों को दर्शाने का लक्ष्य लेकर चलती है|


अमिताभ बच्चन और सायरा बानो की फिल्म ज़मीर में भी गुलशन नन्दा जी को कहानी का श्रेय नही दिया गया। कहानीकार के रूप में सी. जे. पावरी का नाम था। 


इस संस्मरण से आप यह तो समझ सकते हैं कि फिल्म बनाने वालों से टकराना एक पाकेट बुक्स लेखक के लिए कभी आसान नहीं रहा। 


कानूनी किताबों के रिकॉर्ड में तो ऐसे बहुत से किस्से मिल जायेंगे, जब किसी लेखक ने किसी फिल्म की कहानी अपनी होने का दावा किया, हमेशा दो ही बातें हुई हैं या तो लेखक मुकदमा हार गया या उसे दस-बीस-पचास हज़ार देकर खामोश कर दिया गया। 


देव आनन्द की फिल्म ये गुलिस्ताँ हमारा पर भी किसी लेखक ने कहानी अपनी होने का दावा किया था। फिल्म ठीक चल रही थी। मुकदमे की वजह से फिल्म पर रोक न लगे, कोई परेशानी न हो, इसलिए देव आनन्द ने आऊट आफ कोर्ट बात की और उस लेखक की औकात के हिसाब से कुछ लाख देकर उसे खामोश कर दिया। मुकदमे की नौबत ही नहीं आई। 


पर पाकेट बुक्स लेखकों की कहानियाँ फिल्म वालों द्वारा चुराने के और भी बहुत से किस्से मिल जायेंगे, पर उनके बारे में फिल्मी पत्रिकाओं में लिखने वाले गासिप लेखक बेहतर बता सकते हैं। मैंने तो फिल्मों पर गिनती के दो आर्टिकल से ज्यादा तीसरा भी कभी नहीं लिखा। वो भी किसी फिल्मी पत्रिका के लिए नहीं, एक नई पत्रिका के लिए लिखें थे, जो बहुत जल्दी बन्द भी हो गई थी और अशोक कुमार और गुरुदत्त पर ही लिखे थे।. 


मैं जानता हूँ - मेरे जवाब से बहुतों की प्यास नहीं बुझी होगी, पर इस सन्दर्भ में, मैं अधिक कुछ भी नहीं लिख सकता। 


- योगेश मित्तल

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क्या अब भी होता है भूत लेखन?

मई 07, 2021 0

मयूर सावला जी ने एक सवाल किया :

सर जी, अब भी ऐसा होता है क्या कि किसी से नाम पर कोई और उपन्यास लिखे? अब तो ऐसा नहीं होता होगा ?

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मयूर सावला जी को मेरा विस्तृत जवाब

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मनोज पाकेट बुक्स के प्रकाशन जगत में आने से पहले सिर्फ हिन्द पाकेट बुक्स का दबदबा था और उनके यहाँ भी अधिक से अधिक बीस हज़ार से अधिक कोई लेखक नहीं छपा था। 


अधिकांशतः पहला प्रिन्ट आर्डर कभी भी पांच हज़ार से अधिक नहीं होता था।


मनोज पाकेट बुक्स के आगमन के बाद प्रिन्ट आर्डर चालीस-पचास हज़ार और फिर गुलशन नन्दा और वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों द्वारा लाख की संख्या के पार पहुँचा। 


सबसे पहला उपन्यास - जिसने लाख की संख्या पार की, वह हिन्द पाकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित गुलशन नन्दा का उपन्यास "झील के उस पार" था, जिसकी पांच लाख प्रतियाँ छापी गईं। 


मनोज व राजा पाकेट बुक्स में लाख की प्रतियां तो बहुत उपन्यासों की छपीं। पर वेद प्रकाश शर्मा का उपन्यास " कानून का बेटा" के शुरुआती दौर में ही कई एडीशन हुए और आठ लाख कापियाँ छपीं। 


लेकिन तब लेखक एक बात के लिए बदनाम थे, वह यह कि बिकने वाले लेखक को जिस प्रकाशक से सब कुछ मिलता था, थोड़े से अधिक पारिश्रमिक के लालच में लेखक अपने रेगुलर पब्लिशर को छोड़ दूसरे का दामन थाम लेता था। 


प्रकाशकों द्वारा ट्रेडमार्क स्थापित करने के पीछे एक मुख्य कारण तो यह था। दूसरा कारण था - पश्चिम का अन्धानुकरण।


कई प्रकाशक - जो विदेश हो आये थे, जानते थे कि विदेशों में कई प्रकाशकों ने लेखकों के रूप में ट्रेडमार्क स्थापित कर रखे हैं, जिनमें अनेक लेखकों के उपन्यास छपते हैं। 


इंग्लिश में तब एनिड ब्लायटन के उपन्यास बहुतायत में छपते थे। उनकी अनेक सीरीज़ भी रही हैं। 


आरम्भ में एनिड ब्लायटन में बैक कवर पर किसी की तस्वीर नहीं छपती थी, आज एनिड ब्लायटन की तस्वीर उपलब्ध है तो भी यह संदिग्ध है कि एनिड ब्लायटन के सभी उपन्यास एक ही शख्स के लिखे हुए थे। अंग्रेजी के विद्वान भाषाई अन्तर को बखूबी पकड़ सकते हैं। 


खैर, कहने का मतलब यह है कि तब पुस्तकें बहुत बिकती थीं और प्रकाशन का धन्धा ढंग से किये जाने पर प्राफिटेबल था। तब लेखकों को पैसा देना पड़ता था और कई बार मुंहमाँगा पैसा देना पड़ता था, इसलिए ट्रेडमार्क छापना या घोस्ट लेखक छापना, फ्रकाशक की व्यापारिक आवश्यकता व कुशलता का परिणाम थे। 


लेकिन आज स्थिति भिन्न है, आज ऐसा एक भी लेखक तलाशना मुश्किल है, जिसकी रोजी रोटी ही उसकी कलम हो। आज लेखकों के लिए नाम से छपना ज्यादा आसान है। छापने वाले आज लेखक को एडवांस या पारिश्रमिक नहीं देते। कई बार लेखक से ही छापने के लिए एक मुश्त कोई निश्चित रकम ले लेते हैं। 


आज यह सम्भव नहीं है कि लिखे कोई और, तथा छपे किसी और के नाम से। 


- योगेश मित्तल

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गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

हो सकता है - वेद प्रकाश शर्मा ने लिखा हो : एक दिन में एक उपन्यास...!

अप्रैल 29, 2021 0
वेद प्रकाश शर्मा की एक तस्वीर जो मैंने खींची थी


फेसबुक फ्रेंड आदरणीय शिखा अग्रवाल जी ने मेरी एक पोस्ट के कमेन्ट बाक्स में लिखा....


सर, वेद प्रकाश शर्मा जी ने लिखा था कि उन्होंने एक नॉवल एक ही रात में लिखा था, जिसके उन्हें 100 रुपये मिले थे, वो नॉवेल उनके नाम से नहीं छपा था, अब सही है या गलत......ये पता नहीं...? 


वेद से मेरा दोस्ताना तब हो गया था, जब उसके नाम से दहकते शहर या जो भी नाम से - उसका पहला उपन्यास छपने वाला था! 


और मुझे वेद के साथ बैठ कर लिखने का अवसर कई बार मिला है, इसलिए शिखा जी की बात का मुझसे बेहतर जवाब कोई दूसरा सम्भवतः नहीं दे सकता! 


तो मैंने शिखा जी से कहा है कि हो सकता है..... 


हो सकता है......यह वर्ल्ड रिकॉर्ड ही हो! 


दरअसल उन दिनों मेरठ में आठ फार्म के उपन्यास पच्चीस लाइनों से छपते थे अर्थात एक उपन्यास में दिल्ली के उपन्यासों से लगभग दो सौ चवालीस लाइनें कम लिखनी होती थीं और तब पेज जल्दी जल्दी भरने के लिए वेद प्रकाश शर्मा और मेरे जैसे लेखक भी जहाँ पर नोंक झोंक या वार्तालाप होता तो दो-दो चार-चार शब्दों मे लाइनें पूरी कर देते थे! 


उदाहरण :


"अबे झानझरोखे....!"

"क्या है...?"

"भूख लग रही है!"

"तो मैं क्या करूँ...?"

"यार, कहीं से गरम गरम समोसे..! "

"नहीं मिल सकते!"

"क्यों यार...?"

"रात के बारह बज रहे हैं!"

"हांय, इतनी जल्दी बारह भी बज गये?"

"जल्दी नहीं, बारह अपने टाइम पर बजे हैं! 

" तो यार, सूइयाँ पीछे खिसका दे!"

"उससे क्या होगा?"

"समय पीछे चला जायेगा!"

"मगर समोसे की दुकान, फिर भी नहीं खुलेगी!"


मेरा ख्याल है शिखा जी और सभी मित्रगण, वह समझ गये होंगे, जो मैं समझाना चाहता हूँ! 


तब बहुत से उपन्यासों में ऐसी ही बेगार काटने वाली लाइनें होती थीं, जिनका मूल कहानी से कोई सम्बन्ध नहीं होता था, फिर भी वे कहानी आगे बढ़ाती थीं! 


और खास बात यह कि जब वेद प्रकाश शर्मा का लेखन सफर आरम्भ हुआ था, उनमें लम्बी सीटिंग लगाने की जबरदस्त उर्जा थी! क्षमता थी! आदत थी! 


एक बार.... सिर्फ एक बार उनके स्वामीपाड़ा स्थित किराये के घर की एक परछत्ती में उनके साथ बैठकर लिखने का अवसर मिला था! अवसर बाद में भी मिले, पर बहुत सालों बाद उनके डीएन कालेज के सामने वाले आफिस में या शास्त्री नगर के आफिस में! 



स्वामीपाड़ा - वेद के घर मैं उनसे मिलने गया था! तभी मूसलाधार बारिश होने लगी थी! 


तब हमने साथ में ही खाना खाया था और बारिश को देखते हुए वेद प्रकाश शर्मा जी ने ही कहा- "टाइम क्यों वेस्ट करें! कुछ लिखते हैं!" 

मुझे पेन और कागज भी वेद ने ही दिये! 


खास बात यह रही कि आरम्भ में जितनी देर में मैंने चार पेज लिखे, वेद दस पेज लिख चुके थे! 

वह एक घंटे में आठ से दस-ग्यारह पेज तक लिख लेते थे और आठ-आठ घंटे की सीटिंग लगा लेते थे! 


और जिस दिन नाइट लगाते थे अर्थात पूरी रात लिखते थे, तब रात नौ बजे से पहले खाना-पीना निपटा कर अपने कमरे में बन्द हो लेते थे और सुबह सात बजे तक लिखते रहते थे! 


उसके बाद नित्य कर्म से फ्रेश होने-नहाने के बाद कुछ नाश्ता करके दो घंटे की नींद लेते थे! फिर उठकर दोबारा लिखना शुरू कर देते थे! 


पर यह उनके आरम्भिक दिनों की बात है, जब उनकी शादी नहीं हुई थी! शादी के बाद की दिनचर्या मुझे नहीं मालूम! 


शादी से पहले वेद प्रकाश शर्मा ने कोई या कई उपन्यास एक ही दिन में लिखें हों, यह असम्भव नहीं है! 

- योगेश मित्तल

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बुधवार, 28 अप्रैल 2021

लेखकों को क्रम देना सम्भव नहीं!

अप्रैल 28, 2021 0

 मुम्बई, भिवंडी के मयूर सावला जी ने मुझसे बहुत से उपन्यासकारों के बारे में एक सवाल पूछा! उन्हें जो जवाब दिया, आप भी पढ़िये! 


जासूसी उपन्यास लेखन में हमें इब्ने सफी को पहले नम्बर पर ही रखना चाहिए, क्योंकि बाकी जितने भी हैं, सबने इब्ने सफी को पढ़ने के बाद ही कलम थामी है! 


बाकी नम्बरों में हरएक की अलग सोच होगी! 


पर मैं देवकीनंदन खत्री और दुर्गा प्रसाद खत्री और कुशवाहा कान्त के लाल रेखा और गोल निशान को वरीयता देना चाहूँगा, क्योंकि वे तब छपे और हिट हुए थे, जब अधिकांश जासूसी लेखकों का सफर आरम्भिक ही था! 


उसके बाद सबसे आगे आने वालों में श्रद्धेय ओम प्रकाश शर्मा और वेद प्रकाश काम्बोज ही थे! वेद प्रकाश शर्मा ने कितना भी बेहतरीन लिखा हो, अगर उन्होंने वेद प्रकाश काम्बोज को नहीं पढ़ा होता तो शायद ऐसी कल्पना शक्ति के धनी नहीं बनते, जैसे थे!

 

वेद प्रकाश काम्बोज के बाद सबसे ज्यादा और भिन्नता लिए उपन्यास राज भारती के ही हैं! 


उसके बाद वेद प्रकाश शर्मा को कुछ अलग हट के लिखने का श्रेय दिया जा सकता है! 


कर्नल रंजीत के नाम से छपने वाले एक भी उपन्यास को मौलिक नहीं कहा जा सकता! सब पैरी मैसन तथा अन्य अंग्रेजी उपन्यासों के रूपांतर हैं! 


हाँ, भाषा के दृष्टिकोण से मखमूर जालन्धरी साहब को नौवें - दसवें स्थान पर रखा जा सकता है! 


सुरेन्द्र मोहन पाठक को चमत्कारी भाषा का  लेखक कह सकते हैं! उनके सभी उपन्यास अच्छे हैं, पर कथानकों के लिये वह अंग्रेजी उपन्यासों से आइडिया लेते थे, उन्होंने स्वयं भी कई बार स्वीकार किया है! 


कथा प्रवाह ने मामले में सुरेन्द्र मोहन पाठक बहुत लेखकों से आगे रखे जा सकता हैं, क्योंकि वह छोटे से प्लाट पर भी बड़ा उपन्यास खड़ा करने के माहिर रहे हैं! तो भी भाषा के चमत्कार में औम प्रकाश शर्मा और कृश्नचन्दर उनसे बहुत आगे रहे हैं! 


जब मैंने सुरेन्द्र मोहन पाठक को पढ़ना आरम्भ किया! पूरा- पूरा मनोरंजन प्रदान करने वाले लेखक के रूप में वह मेरी पहली पसन्द थे, लेकिन एक लेखक के रूप में मुझे उनके उपन्यास पढ़कर लिखने के लिये कोई आइडिया, कोई प्लाट नहीं आया, जबकि ओम प्रकाश शर्मा, वेद प्रकाश काम्बोज, राज भारती के उपन्यासों में से एक नये उपन्यास की थीम मिल जाना मामूली बात रही है! 


चन्दर ने भी अंग्रेजी उपन्यासों के रूपांतर से जासूसी लेखन आरम्भ किया! लेकिन चन्दर नाम से लिखने वाले, तब की बाल पत्रिका "पराग" के सम्पादक आनन्द प्रकाश जैन थे, जो कि खुद को साहित्यकार मानते थे और आरम्भ में जासूसी उपन्यास लिखना एक घटिया काम या लेखन मानते थे! बाद में उनकी विचारधारा बदल गई तो उन्होंने स्वयं स्वीकार कर लिया कि चन्दर नाम से वह ही लिखते रहे हैं! 

परशुराम शर्मा को भाषा और कथानकों के दृष्टिकोण से बेहद शक्तिशाली लेखक मानते हुए अपनी पसंद के हिसाब से आप पहले दूसरे पांचवे किसी भी स्थान पर रख सकते हैं! 


बाकी सब को आप बाक्स आफिस फार्मूला लेखकों की गिनती में रख सकते हैं! कुमार कश्यप, एस. सी. बेदी प्रदीप कुमार शर्मा आदि ने बेहतरीन लिखा है, लेकिन आप उन्हें एक अलग वजूद नहीं दे सकते! सब लेखक हैं और सबने लोगों का दिल खुश किया है, किन्तु कुछ भी ऐसा नहीं है, जिससे उन्हें कहीं नम्बरों में स्थान दिया जाये!


लोकप्रियता में भी सर्वोच्च नम्बरों से बहुत पीछे ही रखा जायेगा! 


नजमा सफी, एन सफी, एच इकबाल पाकिस्तान में रहे होंगे किसी नम्बर पर, यहाँ तो उनके ज्यादातर नकली उपन्यास ही छपे हैं! मैंने स्वयं इन तीनों नामों के लिए लिखा है!


बिमल चटर्जी ने तूफान तो बहुत मचाया था, किन्तु एक 


" टैंजा " नाम के कैरेक्टर के कुछ यूनिक उपन्यासों के अलावा पाठकों को कुछ चमत्कारी या बहुत ज्यादा यादगार नहीं दिया!


कुल मिलाकर यह समझिये कि ओम प्रकाश शर्मा, वेद प्रकाश काम्बोज, सुरेन्द्र मोहन पाठक, राज भारती, परशुराम शर्मा, वेद प्रकाश शर्मा आदि के उपन्यास अभी भी आपको भरपूर मनोरंजन तो दे रहे हैं, लेकिन अब जमाना नये लेखकों का है! आज के लेखकों का है! उन लेखकों का है, जो कुछ भी लिखें - यदि कल्पनाशक्ति और लेखन शैली में विशिष्टता रखेंगे तो सब बड़े नामों से आगे निकल सकते हैं! 

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