प्रतिध्वनि

प्रतिध्वनि

कविता, कहानी, संस्मरण अक्सर लेखक के मन की आवाज की प्रतिध्वनि ही होती है जो उसके समाज रुपी दीवार से टकराकर कागज पर उकेरी जाती है। यह कोना उन्हीं प्रतिध्वनियों को दर्ज करने की जगह है।

सोमवार, 27 सितंबर 2021

कचरे के डिब्बे में डालो | हिंदी कविता | योगेश मित्तल

सितंबर 27, 2021 0
Image by 👀 Mabel Amber, who will one day from Pixabay 


मुर्दों  का  जो  माँस नोचकर, 

हलवा     पूड़ी      खाते      हैं! 

खुद  को  धर्मात्मा  कहते  हैं, 

और     बाबा    कहलाते     हैं! 


गिरगिट   जैसे   रंग   बदलते, 

करते   रहते    जर्नी   -   यात्रा! 

दस प्रतिशत सच में जो मिलाते

नब्बे  प्रतिशत  झूठ  की  मात्रा! 


उन   मीठे  -  मीठे   लोगों   से 

शूगर   जैसा    रोग   न   पालो!

बीमारी   के    सभी   कीटाणु, 

कचरे   के    डिब्बे    में   डालो! 


योगेश मित्तल

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रविवार, 19 सितंबर 2021

कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा के साथ की - 18

सितंबर 19, 2021 2

कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा के साथ की - 18

 

"ताला तेरा नहीं है, यह क्या बात हुई?" वेद ने चकित होकर कहा। 


बात तो मेरी भी समझ में नहीं आ रही थी, लेकिन इससे पहले कि मैं कुछ कहता, सामने की गैलरी में आ खड़े हुए, जयन्ती प्रसाद सिंघल जी बुलन्द और रौबदार आवाज कानों में पड़ी -"अबे तू जिन्दा है, मैं तो सयझा, मर-खप गया हो गया।  सदियाँ बीत गईं तुझे देखे। "


"सदियाँ....। " मैं और वेद दोनों जयन्ती प्रसाद सिंघल के इस शब्द पर मुस्कुराये, तभी जयन्ती प्रसाद सिंघल जी का खुशी से सराबोर स्वर उभरा -"अरे वेद जी, आप भी आये हैं, इस नमूने के साथ।  धन्य भाग हमारे।  आये हैं तो जरा हमारी कुटिया भी तो पवित्र कर दीजिये। "


जयन्ती प्रसाद सिंघल ने बायीं ओर स्थित रायल पाकेट बुक्स के छोटे से आफिस की ओर प्रवेश के लिये संकेत किया।  आफिस में आगन्तुकों के बैठने के लिए एक ही फोल्डिंग कुर्सी खुली पड़ी थी, जयन्ती प्रसाद सिंघल जी ने दूसरी भी खोल दी, फिर स्वयं टेबल के पीछे बास की कुर्सी पर विराजे और हमसे बैठने का अनुरोध किया।  


वेद और मैं बैठ गये, पर बैठते-बैठते वेद ने कह ही दिया - "मैं तो यहाँ योगेश जी का कमरा देखने आया था, पर यहाँ तो दिक्खै आपने अपना ताला लगा रखा है। "


"इसका ताला तोड़ कर, अपना न लगाता तो और क्या करता, दस महीने में तो यह कमरा भूतों का डेरा हो जाता।  हम सारे घर की रोज सफाई करवावैं हैं, लेकिन..."


"दस महीने कहाँ हुए अभी...। " तभी मैंने जयन्ती प्रसाद सिंघल जी की बात काटते हुए कहा तो वह बोले -"हिसाब लगाना आवै है या सिर्फ कागज़ काले करना ही जानै है?"


मेरी तो सिट्टी-पिट्टी गुम हो रही थी कि अगर जयन्ती प्रसाद जी ने दस महीने के हिसाब से किराया-भाड़ा और बिजली, जो कि मैंने बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं की थी, सब जोड़-जाड़ कर पैसे माँग लिये तो....? 


पर तभी अचानक वेद ने गम्भीर स्वर में कहा -"पर आपने योगेश जी का ताला क्यों तोड़ा? यह तो आपने गलत किया न...?"


"बिल्कुल नहीं। " जयन्ती प्रसाद जी बोले -"हमने पन्द्रह-बीस दिन इसका इन्तज़ार किया, फिर ताला तोड़ दिया कि इसके पीछे कमरे की साफ सफाई तो हो जाये? हम तो रोज इसकी सफाई करवाते थे, अब किराये-भाड़े के साथ इसे बीस रूपये हर महीने सफाई के भी देने होंगे। "


"क-क-कितने रुपये देने होंगे?" मेरी आवाज काँपने लगी थी।  तुरन्त ही वेद ने मेरी ओर देखा और उसका हाथ मेरी पीठ पर चला गया।  उसे उस समय मुझ पर बहुत तरस आया था।  


तभी मेरे सवाल के जवाब में जयन्ती प्रसाद जी बोले -"तू अपने आप हिसाब लगा ले, दस महीने के कितने हुए? तू जो हिसाब लगायेगा, हम मान लेंगे। "


मैंने नोट किया कि जो जयन्ती प्रसाद मुझसे योगेश जी और आप करके बोलते थे, वह तू-तड़ाक से और बड़े फ्रेंक लहज़े में बात कर रहे थे।  सही भी था, अब मैं उनका लेखक बनकर, उनके सामने नहीं बैठा था, बल्कि किरायेदार था।  


"दस महीने नहीं हुए हैं अभी। " मैंने कहा।  


"हुए तो दस महीने ही हैं, पर चल तू बता, तेरे हिसाब से कितने महीने हुए हैं, उसी से हिसाब लगा ले। "


मैं चुप।  हिसाब लगाने में भी दिल घबरा रहा था कि मेरे हिसाब को गलत बता कर जयन्ती प्रसाद जी कोई और चुभती बात न कह दें।  


यहाँ वेद ने मेरे लिये बात सम्भाली और विनम्र स्वर में जयन्ती प्रसाद जी से कहा -"हिसाब आप ही लगाकर बता दो, पर कम से कम हिसाब बनाना, क्या है कि लेखक तो होता ही गरीब है और आप जितने महीने का भी किराया लोगे, योगेश पर तो मुफ्त का वजन पड़ेगा, क्योंकि जितने भी दिन का यह किराया देगा, उसमें से एक भी दिन यह यहाँ रहा तो है ही नहीं। "


"ठीक है।  आप पहली बार हमारे यहाँ आये हैं, हमारी कुटिया को पवित्र किया है तो आपकी बात मानकर, मैं योगेश के लिये ज्यादा से ज्यादा कनशेसन कर देता हूँ और एक ही बात बोलूँगा। "


"बोलिये....। " वेद ने कहा।  


"तो इससे कहिये - पचास रुपये दे दे।  हमारा इसका हिसाब खत्म। " जयन्ती प्रसाद सिंघल एकदम बोले तो मेरा दिल बल्लियों उछल गया।  


"पचास रुपये। " हठात् ही मेरे मुंह से निकला।  इतनी छोटी रकम में जान छूटने की तो मैंने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी।  सिर्फ पचास रुपये देने थे मुझे, जबकि मैं तो बुरी तरह लुटने के लिए तैयार बैठा था। 


"बेटा, ये तो वेद साहब के लिहाज़ में तुझे छोड़ रहा हूँ, वरना आज तो तेरी जेब से एक-एक छदाम निकलवा लेनी थी मैंने।  कंगला करके भेजना था। " जयन्ती प्रसाद सिंघल जी मेरा चेहरा गौर से देखते हुए बोले तो वेद ने मेरी पीठ पर धौल मारा -"अब देख क्या रहा है, फटाफट दे पचास रुपये, इससे पहले कि मकानमालिक का इरादा बदल जाये। "


"काहे का मकानमालिक, हम सब भाई-बन्द हैं वेद जी।  एक-दूसरे का ख्याल नहीं रखेंगे तो कैसे चलेगा। " जयन्ती प्रसाद सिंघल जी बोले।  इस समय उनका स्वर व लहज़ा बिल्कुल बदला हुआ था और स्वर ऐसा था कि मकानमालिक नहीं कोई घर का बुजुर्ग सामने बैठा हो।  


मैंने जेब से पचास रुपये निकालकर फटाफट जयन्ती प्रसाद जी की ओर बढ़ाये तो वह मुस्कुराये -"खुश है, लूटा तो नहीं तुझे?"


मेरी हँसी और खुशी ऐसी थी कि जुबान गुंग हो गई थी।  


"अच्छा, अब योगेश का कमरा तो देख लिया, मैं चलूँगा, योगेश के साथ बहुत वक़्त बीत गया। " और वेद एकदम उठ खड़े हो गये।  


"अरे, ऐसे कैसे चलूँगा, अभी तो आपसे कुछ बात भी नहीं हुई।  चाय-वाय का दौर भी नहीं चला। " जयन्ती प्रसाद सिंघल जी तुरन्त बोले तो वेद ने उनकी ओर हाथ बढ़ा कर विनम्र स्वर में कहा - "फिर कभी जैन साहब।  ये वादा रहा। "


जयन्ती प्रसाद जी को भी सभी लेखक व परिचित 'जैन साहब' ही कहते थे, वैसे भी वह जैन समुदाय से ही थे।  


जयन्ती प्रसाद जी ने वेद से हाथ मिलाया और हाथ थामे-थामे ही बोले -"थोड़ी देर रुकते न?"


"फिर कभी...।  आज आप योगेश जी से बात कीजिये।  इन्हें ‘दबाकर’ चाय नाश्ता कराइये। " कहकर वेद एक पल भी रुके नहीं।  अपना हाथ छुड़ा, पलटे और जाते-जाते मेरी पीठ थपथपाई -"फिर मिलते हैं। "


मुझे कुछ भी बोलने का अवसर ही नहीं दिया वेद ने।  उसके ऐसे अचानक आंधी तूफान की तरह निकल जाने से मुझे यही लगा कि शायद कोई बहुत जरूरी काम ध्यान आ गया होगा।  जाते-जाते वेद मेरे लिए चाय नाश्ते का डायलॉग मार गये थे तो आफिस में बैठे-बैठे ही जयन्ती प्रसाद जी ने चाय के लिए बोल दिया।  


थोड़ी देर बाद जयन्ती प्रसाद जी के सुपुत्र चन्द्रकिरण जैन एक ट्रे में चाय-नाश्ता लिये आये और मुझे देखते ही बोले -"ओहो, आज तो ईद का चांद निकल आया।  कहाँ रहे इतने दिन?"


"दिल्ली...। " मैं धीरे से बोला।  


"अब तो रहोगे... कुछ दिन  मेरठ में ?"


"हां...। " मैंने कहा और जो बात अभी तक जयन्ती प्रसाद जी से नहीं कह पाया था, चन्द्र किरण से बोला -"वो यार मेरे कमरे की चाबी....। "


मगर चन्द्र किरण की ओर से किसी भी रिस्पांस से पहले जयन्ती प्रसाद जी बोल उठे -"काहे की चाबी... अन्दर कुछ नहीं है तेरा?"


"पर मेरा सामान...?" मैं एकदम बौखला गया।  


"सब तेरे मामा को बुलवा कर उठवा दिया।  उन्हीं के घर मिलेगा।  लगै - मामा के यहाँ होकर नहीं आ रहा। " जयन्ती प्रसाद जी बोले।  


यह सच ही था, मेरठ आने के बाद अभी तक मैं मामाजी के यहाँ नहीं गया था।  मैंने स्वीकार किया कि मामाजी के यहाँ अभी तक नहीं गया हूँ।      


खैर, चाय-नाश्ता करने के बाद मैं रायल पाकेट बुक्स के आफिस से निकला तो फिर बीच में किसी अन्य प्रकाशक से नहीं मिला।  


सबसे नजरें बचाता हुआ ईश्वरपुरी से बाहर आ गया, लेकिन सड़क तक नहीं पहुँच सका, कार्नर पर ही गिरधारी पान और चाय वाले की दुकान थी, जिस पर उस दिन गिरधारी का बेटा राधे बैठा था, मुझ पर नज़र पड़ते ही बोला -"राइटर साहब, पान तो खाते जाओ। "


मैं ठिठककर घूम गया और पान की दुकान पर आ गया।  राधे मुझसे बिना पूछे ही पान लगाने लगा।  दरअसल उन दिनों मुझे जानने वाला हर पनवाड़ीे जानता था कि मैं कभी सादी तो कभी सादी और पीली पत्ती तम्बाकू का पान खाता था।  


"पीली पत्ती डालूँ?" राधे ने सादी पत्ती डालने के बाद पूछा।  


"नहीं, आज रहने दे। " मैंने कहा।  मामाजी के यहाँ जा रहा था और पीली पत्ती की महक तेज़ नाक वालों को पलक झपकते ही आ जाती थी, जबकि सादी पत्ती में चलने वाले 'रवि' तम्बाकू की महक का पता भी नहीं चलता था।  


राधे ने एक जोड़ा बना कर मुझे पकड़ाया।  मैंने बीड़ा अपनी दायीं दाढ़ में फँसाया और आगे बढ़ गया।  


ईश्वरपुरी की अगली गली हरीनगर कहलाती है, जिसका पहला ही काफी बड़ा मकान मेरे मेरठ वाले मामाओं का है।  सबसे बड़े मणिकान्त का ग्राउण्ड फ्लोर में दायाँ पोर्शन था, उनसे छोटे रामाकान्त गुप्ता बायें पोर्शन में  तथा उनसे छोटे विजयकान्त रामाकान्त मामाजी के ऊपर फर्स्ट फ्लोर में व सबसे छोटे हरीकान्त गुप्ता, जो कि एडवोकेट थे, बड़े मामा जी मणिकान्त गुप्ता जी के ऊपर के पोर्शन में फर्स्ट फ्लोर पर रहते थे।  चारों मामाओं की एक या दो बसें यूपी रोडवेज़ में प्राइवेट बसों के तौर पर निर्धारित रूट पर दौड़ती थीं।  


बडे़ मामाजी मणिकान्त गुप्ता की यूपी के बड़ौत के बड़का गाँव में लम्बी चौड़ी खेतीबाड़ी और जमींदारी भी थी।  उनसे छोटे रामाकान्त गुप्ता एल आई सी के एजेन्ट भी थे और जेवर आदि सामान गिरवी रख जरूरतमन्दों को ब्याज पर कर्ज भी दिया करते थे।  तीसरे नम्बर के मामाजी विजयकान्त गुप्ता ने मेरठ के पुल बेगम के पास स्थित 'जगत' सिनेमा का ठेका भी ले रखा था, जहाँ वह नई पुरानी फिल्में भी लगाते थे।  मुझे वहाँ विजयकान्त मामाजी के बच्चों और मामीजी के साथ अनेक फिल्में मुफ्त में देखने के अनेक अवसर मिले, जिसमें चन्दरशेखर, शकीला, आगा, के.एन. सिंह, मुकरी की 'काली टोपी लाल रूमाल तथा प्रोड्यूसर डायरेक्टर नासिर हुसैन की देवानन्द, आशा पारेख, प्राण, राजेन्द्रनाथ अभिनीत 'जब प्यार किसी से होता है' की मुझे आज भी याद है।  


सबसे छोटे हरीकान्त गुप्ता मामाजी की भी यूपी रोडवेज़ में बसें चलती थीं और वकालत भी चलती थी।  मामाओं का मेरठ में खासा रसूख और दबदबा था, पर जब भी मैं मेरठ रहा, खाने-पीने-रहने का तो हमेशा आराम रहा, लेकिन जिन्दगी में कभी उनसे कभी भी एक पैसे की आर्थिक सहायता लेने की स्थिति कभी नहीं आई, लेकिन वहाँ भाई बहन सभी उम्र में मुझसे छोटे थे, इसलिए उन पर जब तब मैं कुछ न कुछ खर्च कर देता था, जिसके लिए मामा-मामी तो नहीं, भाई-बहन ही अक्सर टोका करते थे कि "भैया, इतना खर्चा क्यों करते हो फिजूल में। "


रामाकान्त मामाजी के मेरे ईश्वरपुरी वाले सभी प्रकाशकों से नजदीकी सम्बन्ध थे और अक्सर प्रकाशकों के आफिस में भी उनका उठना-बैठना होता रहता था, इसलिये मैं निश्चिन्त हो गया था कि जयन्ती प्रसाद जी ने मेरा सामान मामाजी को उठवा दिया है तो उन्होंने और भाई-बहनों ने सहेज़ कर सलीके से ही रखवाया होगा, इसलिये पान चबाते हुए मामाजी के घर तक पहुँचा, किन्तु अन्दर जाने से पहले मैंने सारा पान नाली में थूक दिया।  कारण था रामाकान्त मामाजी की धर्मपत्नी चन्द्रावल मामीजी।  वो जब भी मुझे पान खाते देखतीं, कहतीं -"योगेश भैया, तुम्हारे दांत बहुत अच्छे हैं, पान मत खाया करो।  हालांकि वह स्वयं पान सुपारी खा लेती थीं और अपने दांतों की सुन्दरता से सन्तुष्ट नहीं थीं और उनके सौन्दर्य नष्ट होने का कारण पान और सुपारी को ही बताती थीं।  


जब मैं रामाकान्त मामाजी के घर पहुँचा, वे दालान में कतार से लगे गमलों के पौधों को पानी दे रहे थे।  मुझे देखते ही उन्होंने हाथ रोक लिया और बोले -"आ जा, सही टाइम पर आया।  आ जा, थोड़ा पुण्य तू भी कमा ले। "


"पुण्य....?" मैं कुछ समझा नहीं, इसलिये प्रश्नवाचक नज़रों से मामाजी की ओर देखा तो उन्होंने पानी से भरी एक बाल्टी और उसमें पड़े मग्गे की ओर इशारा किया और बोले -"बाल्टी भरी है, मग्गा पड़ा है।  चल, पानी दे पौधों को। "


मैं बाल्टी की ओर बढ़ा।  मग्गा पानी से भरकर बाल्टी से बाहर निकाला, फिर पूछा -"किस-किस गमले में पानी देना है?"


"निरा बुद्धू ही है तू... जो गमला गीला दिख रहा है, जिसमें पानी भरा है।  उसमें मैंने दे दिया है, बाकी जो सूखे दिख रहे हैं, जिनकी मिट्टी पर ताजा पानी नहीं दिख रहा, उनमें पानी देना है। "


"कितना-कितना पानी डालना है?" मैंने पूछा।  


"तू सचमुच बुद्धू है....। " मामाजी 'बुद्धू' शब्द पर जोर डालते हुए बोले -"न बहुत ज्यादा, ना बहुत कम...।  अभी आधा-आधा मग्गा डाल दे सभी में। "


मैं पौधों को पानी देने के लिए गमलों में पानी डालने लगा।  जब दायित्व से मुक्ति मिली तो देखा, मामाजी बान की खुरदुरी चारपाई  वहीं पीछे ही चारपाई डाल कर बैठे हुए हैं।  


मैं भी मामाजी के पास जाकर बैठ गया और बैठकर बोला -"मामाजी, मेरा सामान कहाँ पर रखवाया है?"


"कौन सा सामान?" मामाजी ने पूछा।  


"वही - जो मेरे पब्लिशर ने आपको उठवाया है। " मैंने कहा।  


"क्या बक रहा है? मुझे किसी ने कोई सामान नहीं उठवाया। " मामाजी ने कहा और मैं सन्नाटे में डूब गया।  


यह क्या कह रहे हैं मामाजी? मुझसे मज़ाक तो नहीं कर रहे? 


जयन्ती प्रसाद जी ने तो मुझे वो कमरा खोल कर भी नहीं दिखाया था, जिसमें मैं किरायेदार था।  


(शेष फिर)

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शनिवार, 18 सितंबर 2021

कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा के साथ की - 17

सितंबर 18, 2021 0
कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा के साथ की - 17



सुशील जैन एकदम कुर्सी से उठे और कुर्सी पीछे धकेल, मेज को क्रास कर, आगे निकल आये और बड़े तपाक से वेद प्रकाश शर्मा की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा -"आज योगेश और आप साथ-साथ कैसे?" 


और फिर पीछे पड़ी कुर्सी खींचकर सुशील जी ने वेद के निकट कर दी।  मैंने अपने लिए खुद ही कुर्सी खींच ली।  


"आज मैं योगेश की सिफारिश करने आया हूँ। " वेद ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा।  


"इसे सिफारिश की क्या जरूरत पड़ गई?" सुशील जैन अपनी कुर्सी पर बिराजते हुए बोले -"ये तो हमारा वैसे ही हीरो है, जो काम कोई न कर सकै, इससे करवा लो। "


"काम ही करवाते रहोगे या कुछ नाम और दाम भी दोगे?" वेद ने कहा और इससे पहले कि सुशील जैन बात समझ कर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करते, वेद ने बात आगे बढ़ा दी -"सुना है, आपने इसका विज्ञापन छापा है, किसी नावल का।  बहुत अच्छा-सा नाम है.... "


"लाश की दुल्हन...। " सुशील जैन ने वेद की बात पूरी की। 


"हाँ... हाँ... वही.... लाश की दुल्हन... तो कब छाप रहे हो यह नावल, योगेश के नाम से...? 


" हम तो कल छाप दें... पहले यह नावल दे तो सही, पर इसने तो इतने खसम पाल रखे हैं कि हमारा नम्बर ही नहीं आता।  आज भी छ: महीने बाद शक्ल देख रहा हूँ.... वो भी शायद आप पकड़ लाये हो, इसलिए.... " सुशील जैन धाराप्रवाह कहते चले गये।  


वेद ने मेरी ओर देखा -"यो क्या चक्कर है भई? मुझे 'जुल' दिया सो दिया, जैन साहब को भी लपेट लिया। "


"नहीं यार, वो दिल्ली से आना ही नहीं हुआ। " मैं कुछ खिसियाकर बोला।  


"यह गलत बात है योगेश। " वेद ने मुझसे दो टूक स्वर में कहा -"या तो विज्ञापन नहीं देना था और विज्ञापन दिया है तो नावल भी दो।  तुम दोगे तो जैन साहब न छापें, यह हो ही नहीं सकता। "


"लिखूँगा यार....। " मैंने फिर से खिसियाये लहज़े में कहा।  


"कब लिखेगा, जब लोग विज्ञापन भी भूल जायेंगे...?" 


"विज्ञापन तो लोग अब तक भूल ही चुके होंगे। " सुशील जैन बोले -"छ: महीने पहले छपा था, फिर हमने रिपीट ही नहीं किया। "


"रिपीट क्यों नहीं किया?" वेद ने सुशील जैन से पूछा।  


"करते कैसे... यह मेरठ से ऐसा गायब हुआ, जैसे गधे के सिर से सींग और हमें तो अपना पता भी नहीं देकर गया कि कहीं हम एक चिट्ठी ना लिख दें।  हाँ, मामा से इसकी घणी यारी है... उसके पास अपना तो अपना, शायद पड़ोसियों का भी अता-पता लिखा रखा है। "


"तो यार, आप मामा से मेरा पता ले लेते। " मैंने कहा।  


"क्यों माँग लेते मामा से?" सुशील जैन तमक कर बोले -"हमारी कोई इज्जत नहीं है क्या? अपने लेखक का पता दूसरे पब्लिशर से माँगना हमारे लिए तो भीख माँगने जैसा है। "


"कह तो जैन साहब सही रहे हैं। " वेद ने सुशील जैन का पक्ष लिया -"तुझे खुद अपना पता इन्हें लिखवाना चाहिए था। "


यहाँ सभी पाठक समझ गये होंगे कि 'मामा' सम्बोधन द्वारा लक्ष्मी पाकेट बुक्स के सतीश जैन का जिक्र हो रहा था। 


"अब लिखवा दूँगा...। " मैंने कहा, फिर सुशील जैन से बोला -"एक कागज़ और पेन दीजिये। "


सुशील जैन ने एक तरफ रखा, रफ पेपर्स का पैड और पैन मेरी तरफ बढ़ा दिया।  मैंने उस पैड के ऊपरी पेपर पर अपना दिल्ली का पता लिख दिया।  


वेद प्रकाश शर्मा ने अब आगे जो कहा, वो पूरी तरह मेरी सिफारिश थी।  बड़े ही नम्र स्वर में वेद सुशील जैन से बोला -"जैसा कि मैंने लोगों से सुना है, आपको योगेश से बहुत प्यार है। "


"वो तो है। " सुशील जैन एकदम कह उठे।  


"तो इसे इसके नाम से छापो न, इस बात की गारन्टी मैं लेता हूँ, इसे छापकर आपको कभी अफसोस नहीं होगा और यह आपके साथ गद्दारी भी नहीं करेगा। " वेद ने कहा।  


"यह तो है...। " सुशील जैन बोले - "इसकी ईमानदारी और सच्चाई पर तो मेरठ का कोई पब्लिशर शक नहीं कर सकता। "


"तो फिर छापिये न योगेश मित्तल का उपन्यास...। "


"हमने कब मना किया, पहले यह नावल दे तो सही। " सुशील जैन ने गेंद मेरे पाले में फेंक दी।  


"ले भई...। " वेद ने  ओर देखा -"जैन साहब तो तैयार बैठे हैं।  अब तू बता - कब देवेगा उपन्यास?"


"जल्दी ही स्टार्ट करूँगा, कम्पलीट होते ही दे दूँगा। " मैंने कहा।  दरअसल अर्सा पहले अमर पाकेट बुक्स में जब मेरे सामाजिक उपन्यास 'पापी' और 'कलियुग' उपन्यासकार के रूप में मेरे पहले उपनाम - "प्रणय" नाम से बैक कवर पर रंगीन तस्वीर के साथ के साथ छपे थे, तब तीसरे उपन्यास 'लोक-लाज' को पब्लिशर साहब को देने के समय मेरे साथ कुछ ऐसा घटा था कि मैंने प्रकाशकों से निश्चित वायदा करना छोड़ दिया था, पर वो किस्सा फिर कभी....।  हाँ, उस घटना के बाद 'प्रणय' नाम से मेरा कोई उपन्यास फिर कभी नहीं छपा। 

 

अब भी मैंने वेद प्रकाश शर्मा और सुशील जैन के सामने गोल-मोल बात कही थी, पर वेद प्रकाश शर्मा के सामने मेरी दाल न गलनी थी।  उसने कहा -"तेरा यह जल्दी कब होवैगा? कहीं तू जैन साहब को भी गोली तो नहीं दे रहा बेट्टा, जैसे मुझे दी थी कि ला रहा हूँ उपन्यास कम्पलीट करके, पर मेरी बात और थी, मैंने तेरी कोई पब्लिसिटी नहीं की थी, लेकिन जैन साहब तो तेरी पब्लिसिटी भी कर चुके हैं - 'लाश की दुल्हन' उपन्यास का नाम और विज्ञापन भी तूने ही बनाया था।  नाम भी ठीक ठाक है, बल्कि मैं तो कहूँ... बहुत शानदार नाम है - लिख डाल इस पर उपन्यास। "

"लिखूँगा यार..। " मैंने वेद से कहा।  


"तो फिर तेरी और से मैं जैन साहब को पक्का कर लूँ?" वेद ने पूछा।  


मैं अचानक खामोश हो गया।  


उस जरा सी देर की खामोशी पर सुशील जैन ने सहसा यह कहते हुए प्रहार कर दिया -"योगेश, तू उपन्यास लिखना तो स्टार्ट कर दे, पर एक शर्त मेरी भी है। "


"शर्त....। " मैं चौंका।  


वेद भाई भी चौंक पड़े और तुरन्त बोले -"अब ये शर्त की क्या भसूड़ी है जैन साहब?"


"कुछ नहीं, मामूली सी बात है।  योगेश मेरे पास तीन उपन्यास जमा कर देगा, तब मैं पहला उपन्यास छापूँगा। "


मैंने गहरी सांस ली और बहुत धीमे से बुदबुदाया -"न नौ मन तेल होगा, ना राधा नाचेगी। "


"क्या कहा?" एकदम ही ये दो शब्द वेद भाई और सुशील जैन के मुँह से लगभग एक साथ निकले थे।  


"नहीं, कुछ नहीं। " मैंने अपनी तस्वीर वाली मुस्कान फेंकते हुए कहा।

  

तो सुशील जैन बोले -"देखिये योगेश जी, आपके और सलेकचन्द जी के बीच क्या हुआ, क्यों अमर पाकेट बुक्स में आपका ‘पापी’ और ‘कलियुग’ के बाद तीसरा उपन्यास 'लोक-लाज’ नहीं छपा, इससे मुझे कोई मतलब नहीं है, लेकिन मैं नहीं चाहता कि हमारे आपके रिश्ते में भी वैसा ही कोई इतिहास दोहराया जाये, इसलिए तीन उपन्यास तो जरूरी हैं।  उसके बाद जब पहला उपन्यास छपेगा तो आपके पास बहुत वक़्त होगा, चौथे उपन्यास के लिए, उसमें दो चार दिन आप विलम्ब भी कर दोगे तो हमें परेशानी नहीं होगी। "


सुशील जैन की इस बात पर वेद प्रकाश शर्मा ने भी कहा -"योगेश, तेरे अमर पाकेट बुक्स के लफड़े के बारे में मुझे भी कुछ नहीं पता, पर यो समझ में आवै है कि जैन साहब की बात बिल्कुल ठीक है।  अब तू मेरी बात मान और कमर कस ले।  लिखना शुरू कर दे।  ठीक...। "


"ठीक....। " मैंने कहा।  


"तो ठीक है ना जैन साहब...।  यह तीन उपन्यास दे देगा, तब आप छापना शुरू कर देना।  अब जरा मैं इसका कमरा देख लूँ।  सुना है - रायल पाकेट बुक्स के मकान में ले रखा है। " 


और वेद भाई उठ खड़े हुए।  मैं भी उठ खड़ा हुआ।  


तभी सुशील जैन मीठी मुस्कान फेंकते हुए बोले -"जयन्ती प्रसाद सिंघल भी योगेश जी के जबरदस्त 'फैन' हैं, पता नहीं क्या जादू किया है, इनकी बुराई भी तारीफ की तरह करते हैं। "


"बुराई.....?" मैं और वेद दोनों ही ठिठक गये।  


"हाँ, एक बार मुझसे कह रहे थे - बहुत लापरवाह आदमी है... बहुत ज्यादा लापरवाह है, लेकिन इतने गुणी आदमी में दो चार ऐब तो होवै ही हैं। "


वेद की हँसी छूट गई।  मैं भी मुस्करा दिया। 


"अब लिखने में लग जा, फालतू 'टाइम वेस्ट' करना बन्द कर दे। " वेद ने दो कदम आगे बढ़ने के बाद मुझे समझाया। 


"मैं कहाँ फालतू 'टाइम वेस्ट' करता हूँ। " मैंने कहा तो वेद ने घूर कर मुझे देखा और बोला -"और यह कभी बिमल चटर्जी, कभी भारती साहब, कभी यशपाल वालिया, कभी कुमारप्रिय, कभी गाँधीनगर के लौंडे-लपाड़ों के साथ घूमते-फिरते रहने के चर्चे दिल्ली के नारंग पुस्तक भण्डार का चन्दर यूँ ही बदनाम करने को सुनावै है। "


"चन्दर मुझे बदनाम करता है?" मैंने चौंककर पूछा।  


"नहीं, वो तो तारीफ ही करता है, लेकिन कभी-कभी किसी के द्वारा की गई तारीफ भी बदनाम करने वाली होती है, यह भी तुझे समझना चाहिए।  चन्दर तो इस तरह कहता है कि योगेश मित्तल असली यारों का यार है।  उसे जिसके साथ चाहो, देख लो।  कभी बिमल चटर्जी, कभी कुमारप्रिय, कभी परशुराम शर्मा, कभी राज भारती, कभी वालिया, कभी लालाराम गुप्ता, कभी राजकुमार गुप्ता, कभी गौरीशंकर गुप्ता, कभी ज्ञान गपोड़ी के साथ। " वेद ने कहा -"तेरी इस तारीफ से यही समझ में आता है कि तेरी नज़र में टाइम की कोई कीमत है। " 


"ऐसा क्यों कहते हो यार...। " मैं चेहरे पर कृत्रिम उदासी लाकर बोला -"कई बार तो यह कम्बख्त योगेश मित्तल वेद प्रकाश शर्मा जी के साथ भी दरीबे में घूमता पाया गया है। "


वेद के चेहरे पर हँसी उभर आई, पर एकदम कड़क कर बोला -"फालतू मजाक मत न करै।  काम पर ध्यान दे।  सुशील जी ने तेरा विज्ञापन भी किया हुआ है। "


"विज्ञापन तो लक्ष्मी पाकेट बुक्स में मामा सतीश जैन भी एक उपन्यास का किया था। " मैंने कहा।  


"वो मिट्टी का ताजमहल.... नाम सुनकर ही लगे - प्रेम बाजपेयी का सालों पुराना कोई नावल होगा, जिसमें एक लड़का होगा, एक लड़की होगी, दोनों की दुख भरी कोई कहानी होगी।  वो तो योगेश, नाम ही एकदम पिटा हुआ है, इसीलिए मैंने उसका कोई जिक्र नहीं किया, पर यह नाम 'लाश की दुल्हन'.....नाम से ही साला सस्पेंस झलकता है।  उत्सुकता पैदा होती है - कोई लड़की कैसे बन सकती है - लाश की दुल्हन।  तू 'मिट्टी के ताजमहल' पर मिट्टी डाल और 'लाश की दुल्हन' शुरू कर दे। "


बातें करते हुए हम रायल पाकेट बुक्स के मकान तक आ गये थे तो वेद ने एकाएक चुप्पी साध ली।  मैं भी इस चुप्पी के समय में दो बातें बता दूँ - वेद ने गाँधी नगर के जिन लौंडे-लपाड़ों का जिक्र किया था, वह मेरे गाँधी नगर के दोस्त अरूण कुमार शर्मा और नरेश गोयल थे तथा बाद में जिस ज्ञान गपोड़ी का जिक्र किया था, वह गप्पें मारने में मशहूर गर्ग एंड कंपनी के ज्ञानेन्द्र प्रताप गर्ग का जिक्र था।  


"यहाँ कौन सा कमरा तूने किराये पर लिया है?" वेद ने पूछा तो अपनी जेब में से कमरे की चाबी निकालते-निकालते मैं सन्न रह गया।  


कमरा सामने था, मगर उस पर एक भारी भरकम और बड़ा सा ताला लटक रहा था, जबकि मैंने उस पर जो ताला लगाया था, वो एक छोटा और सस्ता सा ताला था।  


"क्या हुआ? अपना कमरा नहीं पहचान रहा?" वेद ने पूछा।  


"कमरा तो यही है - सामने वाला।  लेकिन इस पर मेरा ताला नहीं है। " मैंने कहा।  


(शेष फिर)

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गुरुवार, 16 सितंबर 2021

कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा के साथ की - 16

सितंबर 16, 2021 1

 



"वो तो मैं हूँ....पर आपको बहुत ज्यादा गुस्सा किस बात पर आ रहा है?" मैंने बेहद शान्ति से सवाल किया। 


"तुम यार, इसे जानते कितना हो?" सतीश जैन का स्वर अभी भी गर्म था। 


"इसे... किसे...?" समझते हुए भी मैंने पूछा। 


"इसी को...रामअवतार को....?"


"नहीं जानता...।" मैंने स्वीकार किया -"आपके यहाँ ही मिला हूँ।"


"अरे मैं नहीं जानता उसे..। उसके घर के लोगों को...। कैसा आदमी है? कैसा परिवार है? और तुम.... तुम्हें उसने एक बार कहा और तुम उसके यहाँ खाने पहुँच गये। यार ये कोई तुक है। अक्ल-वक्ल कुछ है तुममें या दिमाग से एकदम पैदल हो? जितने का तुमने खाना नहीं खाया होगा, उससे ज्यादा तो तुमने किराया खर्च कर दिया। कितना किराया खर्चा?"


"साठ रुपये....।" मैंने धीरे से कहा -"तीस जाने के...तीस आने के।"


"इससे कम में, तुम यहीं किसी रेस्टोरेंट में बैठकर उससे अच्छा खाना खा सकते थे, जैसा वहाँ खाया होगा।"


"हाँ, खाना बेशक ज्यादा अच्छा खा सकता था, लेकिन रेस्टोरेंट में वो माहौल... "


"तुम यार बिल्कुल बेवकूफ हो। ऐसे ही किसी ऐरे-गैरे के यहाँ खाना खाने कैसे जा सकते हो। तुम जासूसी उपन्यास लिखते हो, तुम्हें समझना चाहिए कि तुम्हारे साथ कुछ ऊंच-नीच भी घट सकता है।"


"टेन्शन मत लो यार...। कुछ हुआ तो नहीं। रामअवतार जी बहुत सिम्पल आदमी हैं।" मैंने सतीश जैन को समझाना चाहा, पर उनका मूड सही नहीं हुआ। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वह मेरे द्वारा रामअवतार जी के यहाँ खाना खाने से खफा हैं या मैंने उन्हें अपना कोट दे दिया इसलिये, पर सतीश जैन ने कुछ जाहिर नहीं किया। मुझसे ठीक से बात किये बिना ही वह आफिस की ओर पलट गये। मैं भी सतीश जैन के पीछे पीछे आफिस में दाखिल हुआ। 


सतीश जैन की आफिस टेबल के अपोजिट बिछी फोल्डिंग चेयर पर बैठते हुए मैंने यूँ ही सवाल किया -"कितने दिन का टूर है?"


"कम से कम दो हफ्ते तो लगेंगे ही।" सतीश जैन ने कहा, पर उनकी आवाज़ में अभी भी जो तल्खी थी, मुझे समझ में आ गया कि उनका मूड अभी भी सही नहीं है। 


"कितने स्टेशन कवर करने हैं?" मैंने फिर पूछा। 


"जितने ज्यादा से ज्यादा हो जायें।" सतीश जैन ने कहा। 


फिर हम दोनों के बीच चुप्पी रही, पर कुछ देर बाद सतीश जैन ने ही मुंह खोला -"अब हमारा हिसाब तो क्लीयर है ना?"


"हाँ....।" मैंने कहा। 


"अभी मेरठ ही रहोगे या दिल्ली जाना है?" सतीश जैन ने फिर पूछा। स्वर पहले जैसा रूखा था। 


मुझे लगा कि मुझे उठ जाना चाहिए और उठते हुए मैं बोला -"शाम तक यहीं हूँ... शाम को निकल जाऊंगा।"


"ठीक है, फिर.... शाम तक जिस जिस से मिलना हो, मिल लो। तुम्हारे तो बहुत सारे घर हैं मेरठ में...।"


"ठीक है, चलता हूँ।" मैं बोला। 


तभी जैसे सतीश जैन की व्यापारिक बुद्धि में कोई बात आई और वह एकाएक ही एकदम कोमल स्वर में बोले -"यार, मेरी बात का बुरा मत मानना। तुम हमारे लिए बहुत कीमती हो, इसलिए हमें तुम्हारी चिन्ता होती है। और कोई भी काम करो, सोच समझ कर किया करो। खुद समझ न आये तो सलाह ले लिया करो।"


मैं बोला कुछ नहीं। मुस्कुराते हुए सहमति में सिर हिलाते हुए लक्ष्मी पाकेट बुक्स के आफिस से बाहर निकल गया।


उसके बाद मैं सोचने लगा कि जीजी के यहाँ जाऊँ या एक चक्कर ईश्वरपुरी लगा लूँ। दिल चाहता था कि बड़ी बहन के यहाँ जाकर कुछ खा-पीकर सो जाऊँ, पर दिमाग ने कहा -'मुझे ईश्वरपुरी जाना चाहिए।'


मुझे याद आया कि मैंने रायल पाकेट बुक्स के मकान में एक कमरा किराये पर लिया हुआ है। उसका किराया तो मात्र पचास रुपये था, पर महीनों हो गये थे, मुझे ताला लगाकर दिल्ली गये और अभी तक लौटकर मैं वहाँ झांकने भी नहीं गया था। 


मैंने हिसाब लगाया कि किराया भी लगभग पांच सौ रुपये के आसपास हो रहा होगा। 


गनीमत है - किराया अदा करने के लिए रुपये थे मेरे पास, लेकिन मन में एक गिल्ट सा पैदा हो रहा था। 


ईश्वरपुरी का रिक्शा करके जाते हुए मैं यही सोच रहा था कि रायल पाकेट बुक्स के स्वामी जयंती प्रसाद जी मुझसे क्या कहेंगे और जवाब में मैं क्या कहूँगा। और यह भी मैं सोच रहा था कि मेरे पास जो रुपये हैं, वो सारे के सारे तो शायद उनके यहाँ के कमरे का किराया अदा करने में ही निकल जायेंगे या हो सकता है - कुछ कम ही पड़ जायें। और पैसे कम पड़े तो मुझे वापसी के किराये का भी कहीं से जुगाड़ करना पड़ेगा। 


यह समस्या मेरे सामने चाहे बहुत बड़ी थी, पर एक आदत तब भी मुझमें थी और अब भी है, वो यह कि बात कितनी ही बड़ी क्यों न हो, मैं खुद को कभी बहुत ज्यादा टेन्शन नहीं देता। मस्त रहता हूँ।


ईश्वरपुरी पहुँच सबसे पहले मैंने अपने कमरे पर ही जाना था, पर ऐसा न हो सका। 


आरम्भ में ही पड़ने वाले नूतन पाकेट बुक्स के आफिस में मुझे एसपी साहब और वेद प्रकाश शर्मा दिखाई दिये। 


दिल में आया, अन्दर घुसूँ और पूछूँ कि क्या हो रहा है, पर दिमाग ने तुरन्त रोक दिया कि नहीं, कुछ आपसी बातचीत हो रही होगी। शायद छपने और छापने की। मुझे अन्दर नहीं जाना चाहिए। देखकर भी अनदेखा कर, मैं आगे बढ़ गया, किन्तु अभी चन्द कदम दूर गंगा पाकेट बुक्स के आफिस से भी आगे नहीं बढ़ा था कि कानों में आवाज आई -"योगेश....।"


पलटकर देखा - नूतन पाकेट बुक्स के आफिस के बाहर वेद खड़े थे और सहसा वह मेरी तरफ बढ़ने लगे और मैं तो उनकी ओर बढ़ना शुरू कर ही चुका था।

 

एक मिनट बाद हमारे हाथ मिल चुके थे। 


"यहाँ कहाँ?" वेद ने पूछा। फिर खुद ही कहा -"गंगा में...?"


"नहीं, अपने कमरे पर जा रहा था।" मैंने कहा। 


"कमरे में...? यहाँ कमरा ले रखा है तूने?" 


"हाँ...।"


"कितना किराया है?"


"बिजली-पानी समेत पचास रुपये है। हालांकि पानी की मुझे ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि फ्रेश होने और नहाने के लिए मैं मामाजी के यहाँ चला जाता हूँ।"


"तू पागल है क्या बिल्कुल।" पूरी बात सुन, वेद ने छूटते ही कहा-"बेवकूफ, तेरे मामाओं का घर यहाँ है। हजार गज की कोठी है। उनके होते तुझे कमरा किराये पर लेने की क्या जरूरत आ पड़ी? फिर तेरी तो बड़ी बहन का घर भी मेरठ में है।"


"वो यार... अलग कमरे में...प्राइवेसी होने से कुछ ज्यादा तो लिखा जायेगा।" मैंने कुछ झिझकते हुए कहा। 


"इतना तो तूने फालतू न लिखा होगा, जितना किराये में बरबाद किया होगा और यहाँ पर तो ईश्वर पुरी में रहने वाला कोई भी जब चाहे सिर उठाये तेरा टाइम बरबाद करने आ जाता होगा, जबकि तेरे मामाओं के यहाँ या बहन के कोई भी तभी पहुँचेगा, जब कोई जरूरी काम होगा।"


वेद प्रकाश शर्मा की बात बिल्कुल सही थी। मेरी बोलती बन्द हो गई। 


"किसके यहाँ कमरा लिया है?" तभी वेद ने सवाल किया। 


"रायल पाकेट बुक्स वाले जयन्ती प्रसाद सिंघल जी के यहाँ...?"


"तो फिर उनका भी कुछ न कुछ काम जरूर किया होगा।"


"हाँ, पर उन्होंने उसके पैसे तुरन्त ही दे दिये।"


"कम दिये होंगे।"


"नहीं, बिल्कुल भी कम नहीं दिये।" मैंने कहा। 


"तो फिर तूने माँगे ही कम होंगे।"


वेद की इस बात ने मुझे निरुत्तर कर दिया। दरअसल मैं इतने ज्यादा मनमौजी स्वभाव का था कि कौन क्या ले रहा है, इसमें मेरी कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही। मार्केट रेट किस काम का क्या है, मुझे कुछ पता नहीं होता था। मैं तो बस, इतना जानता था कि मेरी जेब खाली नहीं रहनी चाहिए। जो मिले - आने दो। अब इस लिहाज़ से मैं बेवकूफ था तो था, इसमें कोई शक भी नहीं था।


"नूतन पाकेट बुक्स से कोई डील हो रही है....।" बात का रुख पलटने के ध्येय से मैंने प्रश्न किया। 

"क्यों एक पब्लिशर और राइटर साथ-साथ बैठ जायें तो इसका मतलब जरूरी है कि उनमें कोई डील हो रही है।"

"राइटर योगेश मित्तल जैसा हो तो कई बार टाइम पास हो रहा होता है, लेकिन वेद प्रकाश शर्मा हो तो डील का अन्देशा ही होता है।" मैंने कहा। 

वेद हंसा। 

"क्यों, वेद के सिर पर कोई सींग उगे हैं?"

"नहीं, मुकुट लगा है - हीरे का।" मैंने कहा। बात करते-करते सरकते हुए हम गंगा पाकेट बुक्स के आफिस के बिल्कुल सामने आ गये थे तो अचानक ही वेद ने कहा- "आ, तेरी बात करते हैं।" और मेरा हाथ थाम, मुझे लिए-लिए गंगा पाकेट बुक्स में दाखिल हो गये। 

गंगा पाकेट बुक्स के आफिस में उस समय सिर्फ सुशील जैन ही बास की चेयर पर विराजमान नज़र आ रहे थे। 


(शेष फिर)


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इकलौते पजामे का फटना | योगेश मित्तल | हास्य कविता

सितंबर 16, 2021 1

स्रोत: पिक्साबे

 


फटा पजामा देखके, मैडम गईं घबराय। 

बोलीं, कम्बख्तों के पिता, कहाँ फाड़ के लाय? 


कहाँ फाड़ के लाय, दूसरा नहीं पजामा। 

अब क्या चड्ढी में घूमोगे, बन के गामा? 


कह योगेश कविराय, हो गई मुश्किल भारी। 

पजामा क्या फटा, लग गई क्लास हमारी। 


कैसे फटा, कहाँ पर फाड़ा, किसने फाड़ा? 

बजा कानों में, प्रश्नों का, पुरजोर नगाड़ा।


क्या बतलायें फटने की दुख भरी कहानी। 

पतले से मोटे होने की है, ये कारस्तानी।


पहले पजामे में अक्सर दौड़ लगाते। 

अब मुश्किल है, जरा भी ढंग से, बैठ न पाते। 


एक एक करके, बदल गये हैं सारे कपड़े। 

मगर पजामा सालों से, हम एक ही पकड़े। 


आखिर कब तक - साथ निभाता एक पजामा। 

अब क्या पहनूँ - तुम्हीं बता दो मेरे रामा? 


- योगेश मित्तल

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मंगलवार, 14 सितंबर 2021

हिन्दी के दोषी | योगेश मित्तल | हिंदी कविता

सितंबर 14, 2021 0
हिन्दी के दोषी | योगेश मित्तल | हिन्दी कविता
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आज हिन्दी रो रही है, अपने मान के लिए।

दोषी कवि लेखक हैं इस अपमान के लिए। 


कवियों की मूर्खताओं से हिन्दी हुई बीमार। 

लेखकों ने भी किया है - हिन्दी को शर्मसार। 


मेरी को मिरी लिखते हिन्दी गजल में ये। 

तेरी को तिरी लिखते हिन्दी गजल में ये।


मैं भी अक्सर लिखता - गंवार को जाहिल। 

सुस्ती दिखाने वाले को लिखा मैंने काहिल।


मैं भी सभी सा दोषी हूँ - हिन्दी के लिए। 

हिन्दी की हो रही चिन्दी-चिन्दी के लिए। 


खुद को सभी बदल सकें तो धन्य होगी हिन्दी। 

दुनिया की हरेक भाषा से अनन्य होगी हिन्दी। 


योगेश मित्तल

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मंगलवार, 31 अगस्त 2021

सच्चाई मेरा नाम है | योगेश मित्तल | हिन्दी कविता

अगस्त 31, 2021 0
Image by Arek Socha from Pixabay


जिस तरफ भी मैं चलूँगा, 

तुम   मेरे    पीछे    चलोगे। 

रुक गये तो सोच लो तुम

खुद को खुद से ही छलोगे।


रास्ते    हों    टेढ़े  -  मेढ़े, 

फिर भी चलता जाऊँगा मैं। 

ऊबड़ खाबड़ राह पर भी, 

हँस  - निकलता जाऊँगा मैं।


गाँधी   जैसे   पाँव   मेरे, 

नेहरू    जैसा    ओज    है। 

जिद्द है  -  बढ़ते रहने की

बाकी   सब   तो  मौज   है।


मैं पथिक हूँ, यायावर हूँ, 

मस्त      बंजारा     हूँ      मैं। 

फांकता      हूँ       धूल

गलियों-गलियों का मारा हूँ मैं।


मैं  मुसाफिर  हूँ  सदी  का, 

आगे    बढ़ता    जाऊँगा   मैं। 

आँख  के  अन्धों  को  भी, 

अब   राह   दिखलाऊँगा   मैं। 


मेरे   पीछे   जो   चलेगा, 

रास्ता       मिल       जायेगा। 

खुश रहेगा, वो सदा और

फूल - सा    खिल    जायेगा। 


लोग   सच   कहते   मुझे, 

सच्चाई    मेरा     नाम     है। 

पाँव    तोड़ूँ    झूठ    के, 

बस,  ये  ही   मेरा  काम  है। 


योगेश मित्तल

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रविवार, 29 अगस्त 2021

बीवी का नौकर | हिन्दी कविता | योगेश मित्तल

अगस्त 29, 2021 2
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आलू लाना, अदरक लाना, 

और ले आना प्याज़। 

बीवी ने समझाये हमको, 

घर-गृहस्थी के काज़। 


घर से सीधा बाज़ार जाना, 

बाज़ार से घर आना। 

बीच राह में मिले, जो कोई, 

हरगिज़ नहीं बतियाना। 


पैसे गिन कर देना-लेना, 

नहीं  छोड़ना  एक  भी  पैसा। 

धनिया-मिर्ची मुफ्त माँगना, 

चाहें  दुकानदार  हो  कैसा।


एक किलो ले लेना टमाटर, 

सख्त सख्त और लाल लाल हों। 

सब्जी सारी ताजी लाना, 

सड़ा या बासी नहीं माल हो। 


बैंगन  लेना  लम्बे  मोटे, 

नीबू  रस  से  भरे  और छोटे। 

पैसे जब वापस लो, देखना, 

पकड़ा न दे कोई सिक्के खोटे। 


आधा किलो भिन्डी ले आना, 

शलजम मूली भूल ना जाना। 

दो तीन सस्ते फल भी देखना, 

और ले आना, मकई का दाना। 


एक गड्डी पालक की लेना, 

मेथी  ले  लेना  -  दो  गड्डी। 

मोल भाव भी जमकर करना, 

कहीं न रहना, जरा फिसड्डी। 


रस्ते में दिखे कोई पड़ोसन, 

झट से आगे तुम बढ़ जाना। 

भूले से भी बात न करना, 

दोबारा   न  पड़े  समझाना। 


जाओ फटाफट, जल्दी आना, 

एक  मिनट  भी  नहीं  गँवाना। 

घर  के  बहुत  काम  बाकी है, 

रुककर  कहीं  नहीं  सुस्ताना। 


करता सभी काम बीवी के, 

चाहें  हँसकर, चाहें  रोकर। 

इकलौती  बीवी  है  मेरी, 

मैं उसका  इकलौता नौकर। 


योगेश मित्तल

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शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा के साथ की - 15

अगस्त 20, 2021 2

 




"क्या काम कराना होगा?" पूछते हुए मेरे चेहरे पर वही मुहब्बत भरी मुस्कान उभर आई, जिसे आपने मेरे रजत राजवंशी नाम से छपे कुछ उपन्यासों की तस्वीरों तथा फेसबुक की तस्वीरों में देखा है। 


वेद भाई ने बड़े रहस्यमय अन्दाज़ में चेहरा आगे किया और धीरे से पूछा -"बता दूँ...?"


"हाँ...हाँ...बताओ।" मैं भी कुछ मज़े लेने वाले मूड में आ गया था। 


"तो सुन...मामा... एस. पी. साहब से नूतन पाकेट बुक्स में छपे कुछ पुराने-सुराने उपन्यास विक्रांत और विजय सीरीज़ के फ्री में लाया होगा, उन्हीं को कवर-सवर फाड़ के योगेश मित्तल के सामने फेंकेगा, ताकि योगेश मित्तल को पता न चले, यह उपन्यास पहले कहाँ छपे हैं, फिर योगेश मित्तल से कहेगा कि यार, इसमें आधा-आधा फार्म शुरू और आखिर में बढ़ा दो और हर चैप्टर की शुरू और आखिर के तीन-तीन चार-चार लाइन चेन्ज कर दो।"


"हो सकता है, तुम्हारी बात सही हो, पर सतीश जैन एस. पी. साहब से ही पुराने उपन्यास क्यों लेगा?" मैंने पूछा। 


"किसी और से भी ले सकै है, प्रभात पाकेट बुक्स से भी ले सकै है। तिलक चन्द जी के भी पाँव पकड़ सकै है, पर एस पी साहब का नाम मैंने इसलिए लिया है, क्योंकि मेरा ख्याल है - एस. पी. साहब से 'मामा' की कुछ ज्यादा ही पटती है।"


"पटती है?" मैं हँसा। 


वेद प्रकाश शर्मा के चेहरे पर भी हँसी आ गई, एकदम ही वह बोले - "तू कहीं गलत तो नहीं समझ रहा  मैंने कहा - पटती है। 'फटती है' - नहीं कहा है।"


"नहीं, मैं गलत नहीं समझा।" मैंने 'पटती है' ही समझा है। तुम तो जानते ही हो, मैं आमिष   शब्दों का प्रयोग नहीं करता। उपन्यासों में बेशक किसी लफंट-लम्पट-मवाली के मुँह से नानवेजिटेरियन शब्द बुलवा दूँ, व्यक्तिगत जीवन में खुद कभी इस्तेमाल नहीं करता।"


"अच्छी बात है।" वेद भाई ने कहा, फिर संजीदगी से बोले -"योगेश इन बेकार के कामों में क्या रखा है? क्यों करता है यह सब काम? पब्लिशर पीठ पर हाथ फेर कर कहते हैं -योगेश, यह काम तुझसे बढ़िया कोई नहीं कर सकता और तू पिन्नक में आ जाता है और फटाफट कहता है - अच्छा भाईसाहब, देता हूँ मैं करके। तू क्या समझता है। मेरठ में राइटरों की कमी है या मेरठ के राइटर ये सब काम नहीं कर सकते। सब कर सकते हैं। तुझसे अच्छा भी कर सकते हैं, पर मेरठ का कोई राइटर इतना फालतू नहीं बैठा कि इन सब टटपुँजिये कामों में हाथ डाले।"


मेरा मुँह छोटा सा हो गया। वेद प्रकाश शर्मा का कथन शत-प्रतिशत सही था। उपन्यास बढ़ाने-घटाने और एडीटिंग के मामले में बड़े-छोटे सभी प्रकाशक कभी न कभी मुझसे यही बात कह चुके थे कि इन कामों में योगेश का मुकाबला नहीं। योगेश मास्टरमाइन्ड है। और मुझे भी अपने प्रबल आत्मविश्वास के कारण हमेशा यह बात सच ही लगती थी, क्योंकि कई बार ऐसा भी हुआ था कि कई प्रकाशकों ने कुछ उपन्यासों में पहले किसी और से काम करवाया, किन्तु मज़ा नहीं आया तो दोबारा मुझसे करवाया। मनोज पाकेट बुक्स में तो एक बार राज कुमार गुप्ता जी ने छ: सात उपन्यासों में किसी और लेखक से एडीटिंग और मैटर बनवाने का काम करवाया। उस लेखक को भी पारिश्रमिक दिया, मगर फिर उसका सारा काम रद्द कर, फिर दोबारा से मुझसे सारा काम करवाया और मुझे भी मेरा पारिश्रमिक दिया, किन्तु वेद प्रकाश शर्मा ने उस समय मुझसे जो बात कही, थप्पड़ की तरह मेरे दिल पर लगी थी। 


एकटक मेरा चेहरा देख रहे वेद भाई को पता नहीं कैसे मेरे दिल का हाल मालूम हो गया और वह एकदम कह उठे- "लगै, मेरी बात तूने दिल पर ले ली है।"


"नहीं-नहीं, ऐसा कुछ नहीं है।" मैं फीकेपन से बोला तो वेद भाई मुस्कुराये -"कुछ कैसे नहीं है, बस, रोने की कसर है तेरे चेहरे पर। पर भाई मेरे, मैंने यह नहीं कहा कि तू खराब काम करता है, तेरे काम का तो कोई मुकाबला ही नहीं है, पर यह डेढ़ टके की तारीफ के चक्कर में तू सौ की मजदूरी वाला काम छोड़ रहा है, यह कोई अक्लमंदी नहीं है। अब यह सोचकर मत रोने लग जाइयो कि वेद ने तुझे बेवकूफ कहा।"


मुझे हँसी आ गई। 


"हाँ, अब ठीक है। तू सीरियस मत हुआ कर, हँसता हुआ ही अच्छा लगै है। सीरियस में तो लगै - अभी रोने वाला है।"


मैं फिर से हँसा, इस बार कुछ जोर से। मुझे हँसता देख वेद भाई भी खुश हो गये। 


वैसे वेद भाई ने मेरे बारे में जो कुछ कहा था, कुछ भी गलत नहीं है। मै बचपन से ही जरूरत से ज्यादा इमोशनल हूँ और अपनी यह कमी दूर तो करना चाहता हूँ, पर बहुत प्रयास करके भी मैं आज तक यह कमी दूर नहीं कर पाया हूँ। पिछले दिनों रात को टीवी पर एक सीरियल चल रहा था - 'गुम है किसी के प्यार में' , उस दिन मेरी बेटी ससुराल से घर आई हुई थी। मैं सीरियल में कुछ ऐसा मग्न था कि मुझे पता ही नहीं चला कि मेरी आँखों से आँसू बह रहे हैं। पता तब चला, जब मेरी बेटी अचानक मोबाइल से मेरी तस्वीर खींचने लगी, बड़ी मुश्किल से मुँह दायें-बायें छिपा, रिक्वेस्ट करके उसे फोटो खींचने से तो रोक दिया, मगर को बेटी ने व्हाट्सएप के हमारे पारिवारिक फैमिली ग्रुप में लिखकर डाल ही दिया - 'पापा इज़ क्राइंग।'


बहरहाल, अब उम्र का जो पड़ाव है, लगता नहीं कि किसी प्रकार खुद को बदल पाऊँगा। हाँ, बदलने की कोशिश, फिर भी मैं करता रहूँगा।


उस दिन वेद प्रकाश शर्मा से और भी बहुत सी बातें हुईं। कुछ याद हैं, कुछ याद नहीं, पर उन सब व्यक्तिगत बातों का जिक्र यहाँ गैरजरूरी और बोर करने वाला हो सकता है, इसलिए आगे चलते हैं। 


वेद से विदा लेकर मैंने देवीनगर के लिए रिक्शा किया। लक्ष्मी पाकेट बुक्स का आफिस वहीं फ्रन्ट रोड पर था और वहीं साथ की गली के एक मकान के फर्स्ट फ्लोर पर मेरी बहन किरायेदार थीं। 


जब देवीनगर पहुँचा तो लक्ष्मी पाकेट बुक्स का आफिस तो खुला था, पर आफिस में मालिक साहब सतीश जैन नदारद थे। एक कोने पर छोटी सी टेबल पर उस आफिस के एकमात्र क्लर्क पतले-दुबले छोटे कद के, किन्तु मुझसे कुछ उठते हुए कद के, रामअवतार जी  मौजूद थे।


मुझे देखते ही वह अपनी कुर्सी से खड़े हो गये और आगे बढ़कर तपाक से मेरा स्वागत किया और हाथ बढ़ाया। मैंने भी तपाक से हाथ मिलाया तो वह बड़े ही खुश होकर गदगद अन्दाज़ में बोले -"सर, हम आपको बहुत याद करते हैं।"


"हैं...।" मैं एकदम चौंका और गम्भीरता से बोला -"पर मैंने तो आपसे कभी कोई उधार नहीं लिया।"


अब वह चकराये। बोले -"हम उधारी की बात कहाँ बोले हैं। हम तो बोले हैं - हम आपको बहुत याद करते हैं।"


"हाँ, पर इन्सान उसी को बहुत याद करता है, जिससे पैसा-वैसा लेना हो, जिसे उधार दिया हो।"


"नहीं-नहीं, हम उस लिए आपको याद नहीं करते हैं। हमारी घरवाली बोलती है किसी दिन भाईसाहब को खाने पर बुलाइये न, इसीलिए....कल रविवार है, कल हमारे घर....।"


यह मेरे लिए जबरदस्त झटका था। मैंने रामअवतार जी की बात काटते हुए उनसे कहा -"भाईसाहब, मैं तो आपकी घरवाली को जानता भी नहीं। वो मुझे खाने पर क्यों बुला रही हैं? अगर राखी-वाखी बांधकर भाई बनाना हो तो उन्हें बता दीजियेगा कि मेरी बहुत सारी बहनें हैं और किसी भी बहन को कभी मुझसे कुछ मिलता नहीं है, सब जानती हैं कि यह बहुत कड़का भाई है और समय-समय पर मेरी मदद ही करती रहती हैं।"


"हैं - हैं - हैं...।" रामअवतार जी अजीब से ढंग से हंसे। फिर बोले - "नहीं, वो ऐसा है कि हम उनको आपके बारे में बताये थे कि आप बहुत बड़े राइटर हैं तो वो बोलीं - उनको खाने पर बुलाइये न...। हम कभी किसी राइटर को नहीं देखें हैं।"


"क्या...?" रामअवतार जी की सीधी सादी सादगी भरी बात पर मेरा दिल ठहाका लगाने का हुआ, पर मूड मजाक का बन गया -"आपकी घरवाली ने जंगल देखा है कभी?"


"नहीं..। वो तो हम भी नहीं देखे। यहीं कंकरखेड़ा में पैदा हुए, वहीं रहते आये हैं। मेरठ से बाहर नहीं गये कभी।" वह बोले। 


मुझे बड़ा अजीब सा महसूस हुआ कि आज हमारे भारत में ऐसे भी लोग हैं, जिन्होंने अपने शहर गली, मोहल्ले से अधिक कुछ भी नहीं देखा। इस लिहाज़ से तो आजकल के बहुत से स्कूलों का मैनेजमेन्ट बच्चों को महीने में एक बार कहीं बाहर घुमाने ले जाते हैं, बहुत अच्छा है, पर उस समय बात आगे बढ़ाते हुए मैंने कहा -"चिड़ियाघर तो देखा होगा?"


"नहीं...यहाँ कहाँ पर है?" रामअवतार जी  ने मुझ पर ही सवाल उछाल दिया तो मैंने गहरी साँस ली और बोला -"किसी रोज घरवाली को दिल्ली ले जाओ, वहाँ चिड़ियाघर में शेर और हिरण दिखाओ। बस, वैसे ही होते हैं राइटर। कोई कोई शेर जैसे और कोई-कोई हिरण जैसे।"


"नहीं न सर। कल सण्डे है। कल सुबह का खाना हमारे साथ खाइये न। आपकी बड़ी कृपा होगी।" और रामअवतार जी मेरे पैरों पर झुकने लगे। मैंने एकदम बीच में ही उन्हें रोक दिया तो वह रूआँसेसे होकर बोले -"हम शिड्युल कास्ट हैं, इसलिए मना कर रहे हैं ना?"


यह मेरे लिए नया रहस्योद्घाटन था। मुझे नहीं पता था - रामअवतार जी शिड्युल कास्ट हैं, पर अब मुझे मेरी गैरत धिक्कारने लगी कि एक शख्स इतने प्रेम से मुझे भोजन का निमंत्रण दे रहा है और मैं उससे मज़ाक कर रहा हूँ, बल्कि मज़ाक उड़ा रहा हूँ। कितना नीच हूँ मैं। 


और मैं इमोशनल हो गया तथा मैंने रामअवतार जी की पीठ थपथपाकर उनसे कहा - "कंकरखेड़ा तो मैं रहा हुआ हूँ, आप एक कागज पर अपना पता लिखकर दे दीजिये, मैं कल लंच आपके यहाँ ही करूँगा, पर एक रिक्वेस्ट है। चावल-दही मैं खाता नहीं। सिम्पल रोटी-दाल के अलावा कुछ भी नहीं खाऊँगा। यह ध्यान रखियेगा।"


"जी, अच्छा।" रामअवतार जी फटाफट अपनी कुर्सी की ओर बढ़ गये और फिर किसी पुराने बेकार प्रूफ का एक कागज़ निकाला और उसकी अनप्रिन्टेड बैक साइड में अपना पता लिखने लगे। तभी मुझे याद आया - सतीश जैन वहाँ नहीं हैं और मैंने अभी तक रामअवतार जी से जैन साहब के बारे में कुछ भी नहीं पूछा है तो तभी मैंने यह प्रश्न भी उगल दिया -"आज जैन साहब नहीं आये अभी तक...?"


"आये हैं ना....? यहीं पास में शेव बनाने गये हैं।" रामअवतार जी कागज़ पर अपना पता लिखते-लिखते बोले । 
मैं वहीं बिछी कुर्सी पर बैठ गया।


थोड़ी देर बाद सतीश जैन आये तो मैंने उन्हें ऊपर से नीचे देखा। पर मेरे कुछ कहने से पहले ही वह बोले -"कितनी देर हुई आये...?"

"दो-तीन घण्टे तो....." मैंने 'तो' को खींचते हुए कहा -"नहीं हुए।"

"मुझे मालूम है। मुझे आधे घण्टे से ज्यादा नहीं लगा, शेव बनवाने में...।"

"शेव घर पर नहीं बनाते?" मैंने पूछा। 

"ऐसा ही है।" सतीश जैन हँसे। फिर बोले -"कभी कभी घर पर भी बना लेता हूँ।"

"या कभी-कभी बाहर भी बनवा लेता हूँ - जब ज्यादा चिकना होने का मन करता है।" मैंने कहा। 

"जो चाहे, समझ लो।" सतीश जैन अपनी सीट पर बिराजने से पहले मेरी ओर हाथ बढ़ाते हुए बोले। 

मैंने हाथ मिलाया तो मेरा हाथ हिलाते हिलाते वह सीट पर पसर गये। फिर हाथ छोड़ा, जेब से एक चकाचक सफेद रुमाल निकाला और रुमाल मुंह पर फेर टेबल पर ही रख दिया। 

"यार, इतनी गर्मी तो नहीं है कि पसीना पोंछने की जरूरत आ पड़े।" मैंने कहा। 

"नहीं, वो क्या है... उसने क्रीम कुछ ज्यादा लगा दी।" सतीश जैन ने रुमाल मुँह पर फेरने का कारण हज्जाम पर डाल दिया। 

मैं कहना तो चाहता था कि तुम्हीं ने कहा होगा, ज्यादा चिकना करने के लिए। किन्तु शब्द रोक लिये और यह अच्छा ही किया। सतीश जैन तुरन्त मतलब की बात पर आ गये। दराज़ से उन्होंने दो खाकी से लिफाफे निकाले। उनमें कुछ था। 

पहले एक लिफाफे में हाथ डाला। उसमें से एक प्रिन्टेड उपन्यास निकाला और बोले - "यार, यह एक थ्रिलर उपन्यास है। इसमें स्टार्टिंग और एण्ड में चार-चार, छ:-छ: पेज बढ़ा देना और बीच में भी हर चैप्टर की स्टार्टिंग में पांच- छ: लाईन बढ़ा देना।” 

“चैप्टर के एण्ड की भी लाइनें बढ़ानी या चेन्ज करनी हैं?" मैंने पूछा। 

"नहीं, फिर काम बहुत ज्यादा बढ़ जायेगा। यही काफी है।" सतीश जैन ने कहा। फिर दूसरे लिफाफे से एक और उपन्यास निकाला। बिल्कुल उसी हालत में - जैसी में पहला उपन्यास था और जैसा कि वेद प्रकाश शर्मा ने वर्णन किया था। किताबों के कवर फटे हुए थे। शुरुआती चार पेज भी नहीं थे। आखिर में भी विज्ञापन वाले पेज नहीं थे। 
एक बात और कई बार प्रकाशक किताब के हर फार्म के आखिरी पेज अर्थात सोलहवें, बत्तीसवें, अड़तालीसवें पर नीचे किताब और लेखक का नाम शार्ट में देते थे। सतीश जैन कभी ऐसी किताब एडिट करवाते या उसमें काम करवाते तो अच्छी तरह प्रिन्ट मैटर पर कलम इस तरह चला देते थे कि कुछ भी पढ़ना असम्भव होता था। 
और... 

मेरे द्वारा काम करने के बाद वो पुराना उपन्यास इतना नया हो जाता था कि जिस किसी ने भी पहले पढ़ भी रखा हो, उसे पढ़ा-पढ़ा सा बेशक लगे, पर उसे आसानी से पता नहीं चल सकता था कि यह उपन्यास कहाँ पढ़ा है। इसका कारण यह भी था, मुझसे काम करवाने के बाद सतीश जैन अक्सर अन्दर के कुछ पात्रों के नाम स्वयं बदल देते थे या किसी से बदलवा देते थे और पुराना घिसा पिटा उपन्यास नया हो जाता था। 

एक तरह से यह पाठकों से चीटिंग थी और इस चीटिंग में प्रकाशक का साथ देने वाला शख्स आपका अपना योगेश मित्तल था, जिसे कि प्रकाशक सबसे ईमानदार और सच्चा लेखक मानते थे और कहते भी थे। 

पर तब मुझे कभी भी ऐसा नहीं लगा कि यह मैं कुछ गलत कर रहा हूँ। मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए। 

मेरी सोच बस, यह थी कि मैं लेखक हूँ और मुझे लिखने का जो भी काम मिल रहा है, करना चाहिए और फिर मुझे अपनी बीमारी की वजह से हर समय पैसों की जरूरत रहती थी। दवाएँ और डाक्टरी इलाज, उस समय की कमाई के हिसाब से बहुत महँगा पड़ता था। मेरा सोचना यह भी होता था कि मैं यदि घर खर्च के लिए घर के लोगों की बहुत मदद न भी करवाऊँ, कम से कम अपनी बीमारी, अपने इलाज के खर्च का बोझ तो घर पर न डालूँ।
 
सतीश जैन ने दूसरा जो उपन्यास मुझे दिया, वह विक्रान्त सीरीज़ का ही था। 

मैंने दोनों लिफाफे थामते हुए पूछा - "कब तक चाहिये?"

"इस बार कोई जल्दी नहीं है।" सतीश जैन बोले -"बेशक आप दिल्ली ले जाओ। जब चक्कर लगे, तब दे जाना। स्पेशली आने की जरूरत नहीं है।"

यह मेरे लिए घोर अचरज़ की बात थी। सतीश जैन के लिए मैं जब से काम कर रहा था, ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था।

"ठीक है, फिर मैं अभी चलूँ।" मैंने उठने का उपक्रम करते हुए कहा, लेकिन उठा नहीं। 

"आज चाय नहीं पीनी....?" सतीश जैन ने पूछा। 

"अरे हाँ...।" मैं सोच ही रहा था कि कुछ भूल रहा हूँ। मँगा लो...मँगा लो।" 

"रामअवतार जी।" सतीश जैन ने रामअवतार जी से कहा और वह तत्काल उठ गये। 

"तीन चाय...।" सतीश जैन बोले। 

रामअवतार जी चाय का आर्डर देने चले गये तो सतीश जैन ने पूछा -"कुछ खायेगा भी?" 

" रामअवतार जी को भेजने के बाद पूछ रहे हो।"

"क्या हुआ। वो फिर चले जायेंगे।" 

सतीश जैन ने कहा। फिर अचानक ही न जाने क्या हुआ, चेहरे पर मुस्कान लाकर बोले -"यार, वो हमारा बीस रुपये का पिछला हिसाब बाकी है, वो कैश दे रहे हो या काम में एडजस्ट करने हैं।"

"कौन से बीस रुपये...?" मैं जानते बूझते अनजान बन गया। 

"यार, वो... पीछे... रिक्शे के किराये के लिए तुमने लिये थे?" इस बार सतीश जैन ने साफ़-साफ़ खुलकर कह ही दिया। , पर मैं भी लापरवाह और मस्त था, अनजान-अनभिज्ञ बनते हुए बोला -"कब यार, मैंने तो कोई रुपये नहीं लिये। आपने मेरे हाथ में दिये थे क्या?"

"नहीं, तुम्हारे हाथ में तो नहीं दिये, पर तुम्हारा ही रिक्शा था।" 

"मेरा रिक्शा...। क्या कह रहे हो जैन साहब...? मेरठ तो क्या दिल्ली में भी मेरा कोई रिक्शा नहीं है।"

"वो...यार...मेरा मतलब है, तुम जिस रिक्शे पर आये थे, उसका किराया मैंने दिया था।"

"क्यों दिया था, मैंने माँगे थे क्या पैसे?"

"नहीं, तुमने माँगे तो नहीं थे, पर तुम्हारे पास पचास का नोट था, इसलिये...।"

"जैन साहब, पचास का नोट कोई हज़ार का नोट नहीं था, रिक्शेवाला खुला कर देता। मुझे तीस रुपये वापस कर देता, पर आपने मेरी शक्ल देखकर, खुश होकर खुद ही रिक्शेवाले को बीस रुपये दिये थे, फिर आप माँगना भूल भी गये थे। अब महीनों बाद, माँगना तो क्या, आपको उसका जिक्र भी नहीं करना चाहिए।"

"यार, ये कोई बात नहीं हुई। हिसाब तो हिसाब है।"

तभी रामअवतार जी चाय लेकर आ गये, पर चाय वह दो ही लाये थे, जो ‘दो चाय वाले छींके’ में कांच के गिलासों में लटक रही थीं। 

"तीन नहीं लाये?" सतीश जैन ने पूछा। 

"नहीं, हम नहीं पियेंगे।" रामअवतार जी बोले।

"समोसे तो खा लोगे?" मैंने पूछा। 

वो जवाब देते हुए हिचकिचाने लगे। मैंने जेब से बीस का नोट निकालकर, उनकी ओर बढ़ाया तो उन्होंने हिचकिचाते हुए सतीश जैन की ओर देखा तो मैं बोल उठा -"पकड़ो - पकड़ो, ये जैन साहब के ही पैसे हैं।"
पता नहीं सतीश जैन ने कोई इशारा किया या मेरी बात का असर था, रामअवतार जी ने पैसे पकड़ लिये, तब मैं बोला -"छ: समोसे ले आना और बाकी जो बचे उसकी जलेबी। आज जैन साहब शेव बनाने की खुशी में पार्टी दे रहे हैं।"


रामअवतार जी मुस्करा दिये, पर सतीश जैन ठहाका मार कर हँसने लगे। 


"अब मैंने तुम्हारे कोई बीस रुपये नहीं देने...।" मैंने रामअवतार जी के पलट कर जाने से पहले ही सतीश जैन से कहा तो सतीश जैन का सिर अजीब से अन्दाज़ में दायें बायें घूमा और वह बोले -"तुम यार, बहुत चालू चीज़ हो।"


"आपसे कम...।" मैंने कहा -"रिक्शेवाले को दिये पैसे भी आखिर मेरी जेब से निकलवा ही लिये।"


फिर मुझे भी हँसी आ गई। हँसी रुकी तो मैंने पूछा -"यह पहला चांस है, जब आप कोई जल्दी नहीं मचा रहे हो। वरना आप काम भी घोड़े पर सवार होकर करवाते हो।"


"वो यार, अगले शनिवार को मैं दो हफ्ते के लिए टूर पर जा रहा हूँ।"


"टूर पर....। किसलिये?"


"यार, ये बुकसेलर तब तक पैसा नहीं भेजते, जब तक टूर न लगाओ।"


"तो ये कहो कि नोटों की उगाही के लिए टूर पर जा रहे हो।"


"यही बात है, मगर टूर लगाने पर भी सब अच्छे बुक्स एजेन्ट तो पैसे दे देते हैं। कुछ हरामी नहीं भी देते, बहाना कर देते हैं, पर ज्यादातर दे देते हैं।"


"आप किसी एजेन्ट को नहीं भेजते, खुद ही जाते हो टूर पर...।"

"खुद मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता भाई...। जाना पड़ता है। व्यापार करना है तो बाहर खुद जाना ही पड़ेगा। निकलना ही पडेगा।"

"पर मनोज पाकेट बुक्स और विजय पाकेट बुक्स वाले तो बाहर अपने टूरिंग एजेन्ट को ही भेजते हैं। वही उगाही करके लाता है।"

"वो बड़े प्रकाशक हैं। उनका काम इतना फैला है कि उनके लिए जाना सम्भव नहीं होता, हमें तो खुद जाना पड़ता है। फिर भी कभी-कभी हम भी किसी एजेन्ट को भेज देते हैं, पर रेगुलर इन्हें भेजना बिजनेस के लिए भी ठीक नहीं होता।"

"वो क्यों?"

"कई बार ये एजेन्ट बुकसेलर से सांठ-गाँठ कर लेते हैं। दिखाते हैं किताब बारिश में खराब हो गई, फिर सैकड़े में बेच दी। पब्लिशर ने सौ किताब भेजीं, बताते हैं बण्डल भीग गया। साठ किताबें खराब हो गईं। फिर एजेन्ट कहता है। खराब किताब वापस भेजना तो और नुक्सान का काम होता। भेजने का खर्च भी पड़ता और किताब रद्दी हो जातीं, इसलिए वहीं सैकड़े के भाव बेच दी।"

"नहीं यार, मुझे नहीं लगता, एजेन्ट ऐसा करते होंगे। और बुकसेलर भी ऐसा करते होंगे।"

"योगेश जी, बड़े लफड़े हैं। एक बार पब्लिशर बन जाओ, तब पता चलेगा - आटे दाल का भाव। कई बार बारिश के दिनों में हम ठीक ठाक माल भेजते हैं और दो दिन बाद पता चलता है, जिन- जिन स्टेशनों पर माल भेजा था - बाढ़ आ गई। स्टेशन पर पड़ा सारा माल बरबाद हो गया। तब हालत ऐसी हो जाती है कि घरवालों के सामने रोते भी नहीं बनता। रात को नींद भी नहीं आती। रेलवे से क्लेम करने में भी पूरा पैसा नहीं मिलता और क्लेम पास होने में भी अक्सर इतना समय लग जाता है कि पब्लिशर का भट्टा न बैठता हो तो बैठ जाए। और एजेन्ट... एजेन्ट ने आपको कितना लूटा है, पता तब चलता है, जब आप बहुत मोटा लुट चुके होते हो और मज़े की बात है, एजेन्ट के पास आपके हर सवाल का जवाब होता है। आप जानते हो कि वो आपको बेवकूफ बना रहा है, बना चुका है, लेकिन आप उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकते।"

किताबी दुनिया का यह सच मैंने पहली बार सतीश जैन के मुँह से सुना था।

मैं यह नहीं कहूँगा कि सतीश जैन ने जो कहा, सौ परसेन्ट सही था, ना ही यह कहूँगा कि सौ परसेन्ट गलत था, लेकिन पाकेट बुक्स व्यवसाय में टूरिंग एजेन्ट की भी एक विशेष भूमिका हमेशा से रही है। टूरिंग एजेन्ट अच्छे और ईमानदार भी हुए हैं और ऐसे भी हुए हैं, जिन्होंने प्रकाशकों को रुला दिया। 

प्रकाशक जब भी कोई नया सैट निकालते थे, बुकसेलर्स को एक सर्कुलर भेजते थे, जिसमें नये सैट का विवरण होता था और पुस्तक विक्रेता को उस सर्कुलर में अपना आर्डर भरकर लिफाफे में रखकर भेजना होता था। बहुत से पुस्तक विक्रेता ऐसा भी करते भी थे, पर कई पुस्तक विक्रेता तब भी लिफाफे में आर्डर न भेजकर पोस्ट कार्ड में आर्डर भेजते थे, जब पोस्ट कार्ड पांच पैसे का होता था और लिफाफा पन्द्रह पैसे का और तब भी जब पोस्टकार्ड पन्द्रह पैसे का हुआ और लिफाफा पैंतीस या पचास पैसे का। 

पर फिर भी यदि पाँच सौ सर्कुलर भेजे जाते तो सौ-सवा सौ से अधिक आर्डर नहीं आते थे, बहुत से स्टेशनों से कोई आर्डर आता ही नहीं था, जबकि प्रकाशक जानते थे कि वहाँ हिन्दी उपन्यासों की खपत है, पर वहाँ का आर्डर नहीं आया है। ऐसे ही शहरों, स्टेशनों से आर्डर लाने का काम टूरिंग एजेन्ट करते थे और प्रकाशक उन्हें यह दायित्व भी सौंपते थे कि वह जहाँ-जहाँ पिछली पेमेंट रुकी हुई है, वहाँ से पिछली पेमेंट भी लेते आएं।    

मेरे दोस्तों, यह तो आप सब मेरे पिछले एपिसोडों में पढ़ ही चुके हैं कि पाकेट बुक्स व्यवसाय में उन दिनों रेल पार्सल द्वारा भेजा जाने वाला अधिकांश माल उधार जाता था या वीपी से बिल्टी भेजी जाती थी, मगर आज यह भी जान लीजिये कि अधिकांश शहरों में पुस्तक विक्रेताओं की रेलवे कर्मचारियों से साँठ-गाँठ रहती थी, पुस्तक विक्रेता बिना बिल्टी के ही रेलवे से बण्डल छुड़ा लेते थे और माल आराम से बेचते रहते थे, जबकि उन्होंने वीपी से आई बिल्टी पोस्टमैन से ली ही नहीं होती थी। पर यहाँ भी बुकसेलर्स की साँठ-गाँठ चलती थी और यह साँठ-गाँठ पोस्ट आफिस के पोस्टमैनों के साथ होती थी। नियमानुसार तो पोस्टमैन कोई भी वीपी ज्यादा दिनों तक रोक नहीं सकते थे, वीपी जिस पार्टी को भेजी जाती है, यदि वह वीपी रिसीव नहीं करती, पैसे देकर वीपी नहीं छुड़ाती तो वीपी को भेजने वाली पार्टी को वापस भेज दिया जाता था, लेकिन डाक कर्मचारियों से साँठ-गाँठ रखने वाले पुस्तक विक्रेता, रेलवे से माल बिना बिल्टी के छुड़ाकर बेचने के बीस-पच्चीस दिन या महीने बाद बिल्टी की वीपी छुड़ाते थे, इसके लिए पोस्टमैन क्या धांधली करते थे, यह पोस्टआफिस में काम करने वाले कर्मचारी ही बता सकते हैं, पर धांधली होती थी, बदमाशियाँ होती थीं, मेरी यह बात सौ परसेन्ट सही है। 

सतीश जैन से उस रोज जो कुछ जाना, वही सब भारती पाकेट बुक्स के लालाराम गुप्ता के द्वारा भी सत्यापित हुआ और मनोज पाकेट बुक्स, राज पाकेट बुक्स, विजय पाकेट बुक्स से भी अक्सर चर्चाओं में सही जाना। 

जो लोग यह कहते हैं कि असली मेहनत तो लेखक करता है, लेकिन उसकी मेहनत को लूट कर, उसका शोषण करके प्रकाशक कोठियाँ खड़ी करते रहे, वे यह भूल जाते हैं कि प्रकाशक बहुत मोटी पूंजी लगाते थे और कई बार तो ब्याज पर उधार लेकर, कई बार पत्नी के जेवर तक गिरवी रखकर भी प्रकाशकों ने पैसे लगाये। और इस धन्धे में बहुत से प्रकाशक बरबाद भी हुए व सड़क पर आ गये। उन बरबाद हुए प्रकाशकों के बारे में कोई नहीं जानता और ऐसे प्रकाशकों का दर्द मैं भी नहीं बता सकता, अगर फेसबुक पर कहीं वो मेरा लिखा पढ़ रहे हों तो वही सामने आकर बता सकते हैं। 

हाँ, मैं दावे के साथ यह कह सकता हूँ कि मनोज पाकेट बुक्स आरम्भ करने के लिए गुप्ता भाइयों राजकुमार गुप्ता, गौरीशंकर गुप्ता और विनय कुमार गुप्ता में से मंझले भाई गौरीशंकर गुप्ता ने अपने मित्रों से ब्याज पर एक मोटी रकम उधार ली थी और उसके बाद राजकुमार गुप्ता और गौरीशंकर गुप्ता ने दिन रात मेहनत की। जी हाँ, दिन रात...। कई बार वह सर्दियों में भी रजाई में सोने की जगह आगे के सैट के उपन्यासों की तैयारी कर रहे होते थे। अक्सर बाहर माल भेजने के लिए खुद भी बण्डल पैक करते रहते थे। मैंने उनके वो दिन देखे हैं। उन्हें डाक के और रेलवे के बण्डल बनाते देखा है। यही काम गंगा पॉकेट बुक्स के सुशील जैन, भारती पॉकेट बुक्स के लालाराम गुप्ता, ओरियंटल और लक्ष्मी पॉकेट बुक्स  के सतीश जैन को भी देखा है। गौरी पॉकेट बुक्स के अरविन्द जैन को भी पूजा पॉकेट बुक्स के समय पैकिंग का काम खुद करते देखा है।       

मैंने राजकुमार गुप्ता के साथ कौड़िया पुल से शक्तिनगर तक बस में भी सफर किया है और एक बार दस बीस पैसे, जो भी किराया होता था, मैंने जेब से दिया, क्योंकि राज कुमार गुप्ता की जेब में कुछ रुपये तो थे, चिल्लर नहीं थी। 
मैं गौरी पाकेट बुक्स में सुपरहिट प्रकाशक बने अरविन्द जैन के उन पलों का साझीदार हूँ, जब पूजा पाकेट बुक्स में वह पैसे-पैसे के लिए तंग रहते थे और वह अक्सर गंगा पाकेट बुक्स के सुशील जैन और नूतन पाकेट बुक्स के एस पी साहब अर्थात सुमत प्रसाद जैन से 'चचा, जरा दो सौ रुपये देना' कहकर उधार माँगा करते थे, लेकिन अरविन्द और उसकी पत्नी के त्याग और जीवट की यह कहानी शायद उनके रिश्तेदारों को भी पता न हो कि गौरी पाकेट बुक्स खोलने के लिए अरविन्द जैन की पत्नी ने अपने मायके और ससुराल के सारे जेवर अपने पति के हवाले कर दिये थे कि तुम हिम्मत करो, मैं तुम्हारे साथ हूँ और अरविन्द जैन ने वो जेवर किसी ऐसे शख्स के यहाँ गिरवी रखे, जो ईश्वरपुरी के प्रकाशकों को कोई भनक भी न पड़ने दे और इज़्ज़त भी बनी रहे, पर अब यह बातें बताकर मैं उनकी इज़्ज़त घटा नहीं रहा हूँ, मुझे विश्वास है। उनके त्याग और हिम्मत की यह सच्चाई लोगों के लिए प्रेरणादायक होनी चाहिए।


मुझे यह सब इसलिये पता है, क्योंकि वह नवरात्रि का समय था। अरविन्द जैन की पत्नी सम्भवतः नवरात्रि के व्रत करती थीं। उस दिन अरविन्द जैन के यहाँ अष्टमी या नवमी की पूजा थी। पक्का खाना बना था। अरविन्द ईश्वरपुरी में ही किसी ऊपरी मंजिल पर किराये पर रहते थे, उस रोज जबरन मुझे अपने घर ले गये। उस दिन पूजा के बाद पक्का खाना हमने साथ-साथ खाया। 

उस दिन अरविन्द ने अपनी परेशानियाँ, अपनी मजबूरियाँ और हालातों की मुझसे खुलकर चर्चा की और नयी पाकेट बुक्स खोलने के लिए मुझसे सलाह माँगी। उसने कई नये नाम सोच रखे थे, लेकिन उसकी पत्नी 'गौरी' नाम के प्रति ज्यादा उत्सुक थीं। मैंने इसीलिए गौरी पाकेट बुक्स नाम रखने का सुझाव दिया था और केशव पंडित नाम भी मेरे सामने फाइनल हुआ था, पर यह कहानी फिर कभी...। अभी इसकी चर्चा इसलिये कि लेखकों की गरीबी का दोष और ज़िम्मेदार कम से कम मैं शत-प्रतिशत प्रकाशकों को नहीं मानता। 

जरा सोचिये, यदि कर्ज लेकर मनोज पाकेट बुक्स की स्थापना करने वाले राजकुमार गुप्ता और गौरीशंकर गुप्ता जीतोड़ मेहनत न करते और फेल हो जाते तो...? 

जरा सोचिये... अगर पत्नी के जेवर गिरवी रखकर गौरी पाकेट बुक्स की नींव रखने वाले अरविन्द जैन एक बार फिर नाकामयाब हो जाते तो...? पूजा पाकेट बुक्स में वह परेशान हाल और बुरी हालत में थे ही....। 

खैर, उस दिन समोसे और जलेबी का लुत्फ़ उठाने के बाद जब मैं चलने के लिये उठा तो सतीश जैन ने पहली बार मेरा कोट देखा और हठात् ही कह उठे - "यह किसका कोट पहन आया?"

"खराब लग रहा है क्या?" मैंने पूछा। 

"नहीं, अच्छा लग रहा है, पर बाजू कुछ लम्बी है, इसे छोटी करवा लो।" सतीश जैन ने कहा। 

मैंने सिर हिलाया। बोला कुछ नहीं, पर -'ऐसा ही करूँगा' मैंने मन ही मन सोचा। 

सतीश जैन के यहाँ से दोनों उपन्यासों के लिफाफे सम्भालने के बाद मैं निकलने ही वाला था कि रामअवतार जी ने याद दिलाया - "भाई साहब, कल का प्रोग्राम मत भूलियेगा। हम इन्तजार करेंगे।"

"कैसा प्रोग्राम...?" सतीश जैन ने बोला। 

"हमने भाईसाहब को भोजन का निमंत्रण दिया है।" रामअवतार जी धीरे से बोले। 

"ओह...।" सतीश जैन के मुँह से धीमा सा 'ओह' निकला, पर इससे आगे उन्होंने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की।

लक्ष्मी पाकेट बुक्स से बाहर निकल मैं पास की गली में घुस गया, उसी गली में छठा-सातवाँ घर रहा होगा, जिसमें मेरी बहन किरायेदार थीं। बहन के यहाँ पहुँचा तो वहाँ भी जीजी के मुँह का पहला वाक्य था -"यह कोट किसका पहन आया?"

"मेरा ही है।" मैंने कहा। 

"देख के नहीं खरीदा था, कितना खराब लग रहा है।" जीजी ने कहा। 

"बहुत ज्यादा खराब लग रहा है?" मैंने उदास होकर पूछा। 

"नहीं, बहुत ज्यादा तो नहीं, पर बाजू ज्यादा लम्बी हैं। थोड़ी छोटी हो जायेंगी तो बुरा नहीं लगेगा।" जीजी ने कहा। 

"आप कर दोगी छोटा...?" मैंने पूछा। 

"कोशिश करूँगी, पर आज तो नहीं, कल....।" 

"ठीक है....।" मैंने कहा और कोट उतारकर, वहीं एक ओर डालकर, वहीं एक पलंग पर लेट सतीश जैन से लिए दोनों उपन्यासों में से एक पर नज़र डालने लगा।  

सतीश जैन ने अवश्य मुझे टाइम की छूट दी थी, पर ऐसे काम के लिए दोबारा मेरठ चक्कर लगाना, मेरी नज़र में हिमाकत थी और मैंने दोनों उपन्यासों का काम कम्पलीट करके ही दिल्ली जाने का विचार कर लिया था। 

उस दिन मैं वहीं जीजी के यहाँ ही रहा। एक उपन्यास का काम कम्पलीट कर दिया और दूसरे में काम शुरू कर दिया, किन्तु दूसरे उपन्यास का काम अगले दिन भी जारी रहा।

अगले दिन मुझे याद था कि उस दिन, रविवार के दिन मैंने लंच रामअवतार जी के यहाँ करना है, इसलिए जीजी को खाना बनाने को मना कर दिया था। 

ग्यारह बजे काम बंद कर मैं स्वयं को कंकरखेड़ा जाने के लिए तैयार करने लगा। उस दिन ठण्ड कुछ ज्यादा थी। गर्म बनियान पहनने के बाद मैंने दो स्वेटर भी पहन लिए थे। उसके बाद मुझे कुछ पहनने की जरूरत नहीं थी, पर न जाने मन क्या आया कोट भी पहन लिया। कोट पहनकर ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ा हुआ था, मुझे लगा - कोट में मेरी पर्सनालिटी कुछ ज्यादा अच्छी लग रही है।

यूँ तो मैं अपने व्यक्तित्व के निखार पर ज़रा भी ध्यान देने वाला नहीं हूँ। मनोज पॉकेट बुक्स में जब मैं पहली बार अरुण कुमार शर्मा द्वारा ले जाया गया था तो मैं नीले-सफ़ेद रंग का रात को पहना जाने वाला पाजामा पहने था और ऊपर हरे रंग की पूरी बाज़ू की शर्ट थी तथा पैरों में हवाई चप्पल, पर उस दिन न पहनते-पहनते भी मैंने कोट पहन ही लिया, फिर निकल पड़ा दावत खाने।

मेरी पत्नी का नाम विवाह से पहले राजकुमारी माहेश्वरी था, अब वह राज मित्तल है । उसके आने के बाद मुझे दुनियादारी और सामान्य शिष्टाचार कुछ-कुछ समझ में आने लगा है, वरना शादी से पहले तो मैं वज़्र मूर्ख था और उस दिन मेरे दिल-दिमाग में इतनी सी बात भी नहीं आई कि किसी के यहाँ खाना खाने जा रहा हूँ तो उसके यहाँ के लिए कुछ फल या मीठा लेता जाऊं। मैं बिलकुल खाली हाथ ही रामअवतार जी के यहाँ पहुँचा।         

कंकरखेड़ा के लिए मैंने रिक्शा तय किया और रिक्शेवाले को दाएं-बाएं घुमाते हुए आखिरकार रामअवतार जी के घर के सामने ही रिक्शा रुकवाया, ढूंढने में परेशानी इसलिए नहीं हुई, क्योंकि रामअवतार जी घर के बाहर ही एक लेडीज शाल ओढ़े हुए चहलकदमी कर रहे थे। 

मुझे देखते ही वह मेरी तरफ लपके और हाथ मिलाते-मिलाते मुझसे लिपट गए और रूंधे स्वर में बोले -"हमको भरोसा नहीं था कि आप आ ही जाओगे।"

"क्यों भरोसा क्यों नहीं था ?" मैंने पूछा।

"वो हम शेड्यूल कास्ट हैं ना।" 

उनसे अलग हो, मैंने सिर पर हाथ मारा -"भाई मेरे, इक्कीसवीं सदी का ज़माना है, लोग चाँद पर जा रहे हैं और आप यह शेड्यूल कास्ट-शेड्यूल कास्ट कर रहे हो। भाई, दोबारा मेरे सामने यह शेड्यूल कास्ट का राग मत अलापना।"

"जी अच्छा।" रामअवतार जी बोले और सामने ही दिख रहे खुले दरवाजे से मुझे अपने घर के अंदर ले गए ।

घर क्या था-एक कमरा था। उसी में एक कोने में रसोई थी । वहाँ  रामअवतार जी की पत्नी पीतल के भगोने में स्टोव पर कुछ चढ़ाये हुए थीं और अंगीठी पर तवा चढ़ा हुआ था। लगता था - बस, मेरा ही इंतज़ार था। उनकी ओर से तैयारी पूरी थी। दूसरे कोने में एक मैला-कुचैला गद्दा बिछा था, जिस पर पूरी बाज़ू के स्वेटर पहने पाँच-सात साल के दो छोटे बच्चे एकदम शांत बैठे हुए थे। एक लड़का था, एक लड़की। लड़की बड़ी थी।     

दरवाजे के पास ही एक फोल्डिंग चेयर खुली हुई बिछी थी। उसके सामने ही एक चौड़ा स्टूल रखा था।
 
"बैठिये सर..।" रामअवतार जी कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए बोले। मैं कुर्सी पर बैठ गया, पर मैंने एक बात नोट की कि यहाँ मुझे रामअवतार जी ने ‘सर’ कहकर सम्बोधित किया था, जबकि पहले मैंने उनके मुँह से हमेशा भाईसाहब सुना था, हालांकि वह उम्र में मुझसे बड़े थे।

मैं कुर्सी पर बैठा ही था कि अंगीठी और स्टोव के सामने बैठी महिला पल्लू संभालते हुए, घूंघट करते हुए जल्दी से उठीं और इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, उन्होंने मेरे निकट आ, तेज़ी से मेरे पैर छू लिए।  

"अरे । यह क्या ?" उन्हें आशीर्वाद देने के स्थान पर मैं हड़बड़ाया -"मैं आपसे छोटा हूँ।"

"छोटे हैं तो का हुआ, आप बहुत बड़े लाइटर हैं।" भोजपुरी लहजे में जब उन महिला ने कहा तो मेरा दिमाग सनक गया। उनके मुँह से 'लाइटर' शब्द सुनते ही मुझे लगा -'कहीं रामअवतार जी का मेहमान बनकर मैंने गलती तो नहीं कर दी।'

पर 'लाइटर' शब्द पर रामअवतार जी ने भी गौर कर लिया था और तुरन्त पत्नी की गलती सुधारते हुए बोले -"लाइटर नहीं, राइटर। राइटर हैं ये। बहुत बड़े लेखक हैं ।"

रामअवतार जी की पत्नी ने घूंघट में कनखियों से गुस्से में पति की ओर देखा -"आप ही तो लाइटर-लाइटर बताये थे।"

मेरा दिल बड़े जोर से हँसने का हुआ, पर मैंने अपने होंठ कसकर भींच लिए। 

तभी एक चौदह-पंद्रह वर्षीय लड़का बाहर से अंदर आया तो रामअवतार जी की पत्नी चिल्लाईं -"अरे अभी तो लाइटर साहब आएं हैं। थोड़ी देर में पहुँचा देंगे।"

"ये क्या पहुँचाने की बात हो रही है ?" मैंने पूछा तो राम अवतार जी तो सकुचाये, पर उनकी पत्नी सरलता से कह उठीं -"यह स्टूल-कुर्सी इन्हीं का है, दो घंटे के लिए माँगे थे, ये इतनी जल्दी लेने आ गए।"

यह समझने के बाद कि रामअवतार जी ने कुर्सी और स्टूल मेरे लिए पड़ोस से उधार माँगे थे, मैं तुरन्त कुर्सी से उतर गया और मैले-कुचैले गद्दे पर बैठे दोनों बच्चों के साथ बैठ गया और बोला -"स्टूल और कुर्सी वापस कर आइये। मैं यहाँ ज्यादा आराम से हूँ ।" 

रामअवतार जी ने कुर्सी पर बैठने के लिए बहुत अनुनय-विनय किया, किन्तु मैं तो गद्दे पर जम चुका था। अंततः रामअवतार जी अपनी पत्नी के कहने पर स्टूल और कुर्सी पड़ोसी के यहाँ वापस कर आये। 

थोड़ी देर बाद ही रामअवतार जी की सीधी-सादी सुघड़ गृहिणी पत्नी ने मेरे लिए भोजन की थाली लगा दी। रामअवतार जी को मेरे साथ बैठने में संकोच हो रहा था, पर जब मैंने उनकी पत्नी से कहा -"भाभी जी, भैया के लिए भी थाली लगाइये, वरना मैं खाना नहीं खाऊँगा" तो उन्होंने राम अवतार जी के लिए भी थाली लगा दी।
 

मैंने अपनी थाली में राम अवतार जी के बच्चों को भी खींच लिया। उन्हें अपने हाथ से कौर बनाकर खिलाने लगा तो पहले तो वह शरमाये, सकुचाये, फिर पहले लड़के ने मेरे हाथ से अपने मुँह में कौर ले लिया, फिर लड़की भी आगे बढ़ आई। 

उस समय दोनों बच्चों के चेहरों पर जो खुशी उभरी थी, आज बरसों बाद भी उसे याद कर दिल अजीब सी प्रसन्नता महसूस करता है, हालांकि उस समय मेरे लिए यह ख़ास बात नहीं थी। मैं बहनों के यहाँ खाना खाता तो भांजे- भांजी को साथ बैठा लेता था। मामा जी के यहां भी अक्सर भाई-बहनों को साथ बैठा लेता था ।

मेरे पिताजी ने एक उसूल बना रखा था, रात का खाना सारा परिवार एक साथ बैठकर खाता था। पिताजी का कहना था - साथ बैठकर खाने से प्यार बढ़ता है । मुझे लगता है - पिताजी के इसी संस्कार ने मुझे हर जगह ढेर सारा प्यार दिलाया है ।   

खाने में अरहर की दाल और देशी घी में चुपड़ी रोटी थीं। साथ में टमाटर-प्याज सलाद के तौर पर कटे हुए थे और मिठाई के रूप में बेसन का हलवा था। सब कुछ घर का बना हुआ। और सबसे आखिर में रामअवतार जी की पत्नी ने पापड पेश किया। खाना खाकर चलने लगा तो अचानक रामअवतार जी की पत्नी बोलीं -"एक बात कहें, आप बुरा तो नहीं मानेंगे।"
"नहीं भाभीजी, आप दो या तीन बात कहिये, मैं उनका भी बुरा नहीं मानूँगा।" मैंने कहा।

"ये आपके कोट की बाज़ू थोड़ी लम्बी है। इसे छोटा करवा लीजिये।"

उस समय मुझे क्या हुआ, मुझे पता नहीं। बस, अचानक ही कोट उतारा और रामअवतार जी से बोला -"ज़रा आप पहनकर तो दिखाइए।" 

"अरे नहीं ।" रामअवतार जी एकदम पीछे हट गए।

"तुम्हें भाभी की कसम..।" मैंने कहा ।

"अरे यह क्या कर रहे हैं आप । पाप चढ़ाएंगे क्या ?" रामअवतार जी की पत्नी बोलीं।

"पाप तो भाई की बात न मानने पर चढ़ेगा भाभी जी । मैं भाई भी हूँ और मेहमान भी । डबल-डबल पाप चढ़ेगा ।"

और ना-नुकुर करते-करते भी आखिर रामअवतार जी ने कोट पहना। संयोग की बात कोट उन पर बिलकुल फिट आया और जंच भी गया।  

"यह कोट अब आप ही रखो।" मैंने कहा -"जब-जब पहनोगे तो मेरी याद तो आयेगी ।"

रामअवतार जी की आँखों में आँसू आ गए। अब की बार वह फिर मुझसे 'भाईसाहब' कहकर सम्बोधित हुए और बोले -"भाई साहब, ऐसा कोट तो..."

मैंने उन्हें बीच में ही रोक दिया और पीठ थपथपाई। चलते हुए मैंने उनके दोनों बच्चों को भी दो-दो रुपये थमा दिए। ऐसी आदत तो नहीं थी मेरी। पर उस समय मेरे मन में शायद मेरा वास नहीं था।  

लेकिन अपनी करतूत का असली इनाम मुझे पहले जीजी के घर मिला। मुझे बिना कोट के आया देख जीजी ने कहा -"तू तो कोट पहन के गया था, कोट कहाँ छोड़ आया ?"

पता था - डांट पड़ेगी, इसलिए पहले तो मैं इधर-उधर बात घुमाता रहा, लेकिन आखिरकार जीजी को सच बता ही दिया, फिर जो लेक्चर सुनना पड़ा -"बड़ा धन्ना सेठ हो रहा है। करोड़पति हो रहा है। मैंने कोट के रंग का धागा और सूई निकालकर रखी है और जनाब दानवीर कर्ण बनकर किसी ऐरे-गैरे को कोट लुटा आये"

अगले दिन मैं लक्ष्मी पॉकेट बुक्स में उनके दोनों उपन्यास कम्पलीट करके देने गया तो देखा रामअवतार जी नौकरी पर मेरा दिया कोट पहनकर आये हैं। 

सतीश जैन उस दिन बार-बार उन्हें घूर-घूरकर देख रहे थे।

मैं पहुँचा तो मुझे दोनों उपन्यासों का पारिश्रमिक देने के बाद मुझसे बोले -"ज़रा, दो मिनट बाहर तो चलना ।"
मुझे लेकर वह सड़क पर आ गए और चेहरे पर बला की गंभीरता लाते हुए बोले -"ये रामअवतार जी जो कोट पहने हैं, वो तुम्हारा वाला ही है ना ?"

"हाँ यार, वो मुझ पर जम नहीं रहा था, इसलिए...."

बात पूरी नहीं कर सका मैं । सतीश जैन भभक उठे -"यार, तुम आदमी एकदम पागल हो।"

(शेष फिर)

कई बार हमारे मन में पहले से कोई अच्छी या बुरी बात नहीं होती, अचानक ही हम जो नहीं चाहते, वो भी कर बैठते हैं, शायद वही करवाने वाली शक्ति भगवान होती हो। मेरे साथ बहुत बार ऐसा हुआ कि मैंने जो कभी सोचा भी नहीं, करना भी नहीं चाहा, वही कर बैठा। 

इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ था। 

जय श्रीकृष्ण।

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बुधवार, 18 अगस्त 2021

कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा के साथ की - 14

अगस्त 18, 2021 0

 

कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा के साथ की - 14



"ऐसी क्या मुसीबत आ गई कि मुझे बुलाने के लिए आपको मेरठ आना पड़ा?" मैंने राजेन्द्र भूषण जैन से पूछा तो वह बोले -"मुझे क्या पता, मुझसे तो गौरीशंकर जी ने रिक्वेस्ट की थी कि जैन साहब, योगेश मेरठ में कहीं होगा, उसके घर पर पता करवाया था, दिल्ली में तो वह है नहीं। आप मेरठ जाकर उसे पकड़ कर लाओ, जो भी खर्चा होगा, आपको हम देंगे।"

"काम नहीं बताया उन्होंने।" मैंने पूछा। 

"मैंने पूछा नहीं, उन्होंने बताया नहीं। पिछली बार राज कुमार गुप्ता जी ने भेजा था, तब भी हमने कोई सवाल नहीं किया था।" राजेन्द्र भूषण बोले। 

मैं सोचने लगा। क्या करूँ? दिल्ली जाऊँ या नहीं?

मेरठ की मेरी यादों में, दिल्ली से मुझे बुलाने के लिए प्रकाशकों द्वारा किसी को मेरठ भेजने की घटनाएँ तीन बार हुई है। दो बार मनोज पाकेट बुक्स से - एक बार राजकुमार गुप्ता द्वारा तथा एक बार गौरीशंकर गुप्ता द्वारा राजेन्द्र भूषण जैन को मेरठ भेजा गया और एक बार विजय पाकेट बुक्स का मैसेज लेकर टूरिंग एजेन्ट इन्द्र मेरठ आये थे।

मुझे सोच में डूबा देख, राजेन्द्र भूषण जैन बोले -"तो चल रहा है ना मेरे साथ दिल्ली?"

"अभी ये कहीं नहीं जायेगा।" तभी मेरी बड़ी बहन प्रतिमा जैन की कड़क आवाज गूंजी-"और आप भी कहीं नहीं जाओगे।"

"वो बात यह है भाभीजी, मैं सरला को बोल कर नहीं आया कि आज मेरठ रुकूँगा।" राजेन्द्र भूषण बोले। 

"कोई बात नहीं, आज रात यहीं रुक जाओ। सुबह चले जाना।" प्रतिमा जीजी बोलीं -"सरला समझ जायेगी कि भैया-भाभी ने रोक लिया।"

सरला, राजेन्द्र भूषण जैन की पत्नी का नाम था। उनके कोई सन्तान नहीं थी। रात को अकेले में सरला जीजी को डर लगता था, इसलिए राजेन्द्र भूषण जैन मेरठ में ही रुकने के लिए तैयार नहीं हुए तो मैंने भी उनके साथ ही दिल्ली निकलने का प्रोग्राम बना लिया। 

उन दिनों मेरठ से आने-जाने वाली सभी बसें शाहदरा होकर निकलती थीं। राजेन्द्र भूषण जैन शाहदरा उतर गये, वहाँ से उनका विश्वास नगर स्थित घर काफी करीब पड़ता था। उन दिनों वह पराग प्रकाशन के प्रकाशक-लेखक श्रीकृष्ण जी के घर के निकट ही रहते थे। जब भी कभी मेरा शाहदरे की ओर गुजरना होता, मैं विश्वास नगर अवश्य जाता था और सरला जीजी के हाथ का बना दोपहर का खाना खाकर ही आगे बढ़ता था, पर मेरठ से लौटते हुए रात हो रही थी, इसलिए मैं राजेन्द्र भूषण जैन के साथ न उतर कर, कश्मीरी गेट ही उतरा। वहाँ से घर गया। 

अगले दिन मैं सुबह नौ बजे ही मैं घर से निकल गया। 

घर से निकलने के बाद मेरा पहला पड़ाव पटेलनगर था। पटेलनगर में पहले राजभारती जी के घर गया। मुझे देखते ही भारती साहब खुश हो गये और बातों के क्रम में सबसे पहले उन्होंने एक खुशखबरी सुनाई कि उन्होंने एक नयी मैगज़ीन के लिए जो नाम 'अपराध कथाएँ' सबमिट कर रखा था, वह मिल गया है। और मुझे बताया कि उसमें सम्पादक "योगेश मित्तल" होगा। पर इस लम्बे वाकये की लम्बी कहानी फिर कभी.... 

उस दिन भारती साहब के यहाँ से निकलने के बाद मैंने उनके साथ के ही घर में दस्तक दी। वह फ्लैट "खेल खिलाड़ी" के सर्वेसर्वा सरदार मनोहर सिंह का था। मेरे दस्तक देने पर सरदार मनोहर सिंह की बड़ी लड़की दरवाजे पर आई और मुझे देखते ही "अंकल जी नमस्ते" बोली।
 
"पापा हैं?" मैंने पूछा तो अन्दर से मनोहर सिंह की तेज़ व दबंग आवाज आई -"आ जा भई, अन्दर आ जा...।"

मैंने अन्दर प्रवेश किया तो मनोहर सिंह ने अन्दर किचेन में काम कर रही पत्नी को आवाज दी। भाभी जी सामने आईं तो मनोहर सिंह पंजाबी में बोले -"वो कोट तो लेकर आ, जो हम योगेश के लिए लाये थे।"

बातों बातों में पता चला कि कुछ दिन पहले मनोहर सिंह व उनकी पत्नी बच्चों के लिए आफ सीजन सेल में कुछ गर्म कपड़ों की खरीदारी के लिए मार्केट गये थे तो भाभी जी ने मनोहर सिंह से कहा -"योगेश जी के पास कोई गर्म कोट नहीं है। सर्दी आने वाली हैं - एक कोट योगेश जी के लिए भी ले लो।"

और एक कोट साइज़ के अनुमान से मेरे लिए ले लिया गया। 

"पहन के दिखाओ।" कोट मेरे हवाले करते हुए भाभीजी ने कहा। 

कोट मेरे साइज़ से कुछ थोड़ा सा बड़ा था। देखकर मनोहर सिंह दुखी हो गये, बोले -"अब तो ये वापस भी नहीं होगा, बदला भी नहीं जायेगा। लाये हुए काफी दिन हो गये। तू काफी दिन से आया नहीं।"

इस पर भाभीजी बोलीं- "क्या? जरा-सा ही तो लम्बा है। और लम्बाई तो खराब नहीं लग रही। हाँ, बाजू की लम्बाई जरूर कुछ बुरी लग रही है तो बाजू को योगेश जी अन्दर को मोड़कर, पहन लेंगे या अपनी बोट्टी से या मम्मी से अन्दर मुड़वा कर टांके लगवा लेंगे। अरे फैशन थोड़े ही करना है, सर्दी से ही तो बचना है।"

और यही फैसला हुआ कि मैं या तो बाजू अन्दर को मोड़कर पहन लूंगा या अन्दर मुड़वा लूंगा। उस समय तक मेरी शादी हो चुकी थी और हमारा परिवार विकास पुरी में रहने लगा था। 

भाभीजी ने कोट अखबार में लपेट एक बड़े थैले में डालकर मुझे दे दिया। उसके बाद मनोहर सिंह ने भी मुझे एक खुशखबरी सुनाई कि "उन्होंने बच्चों की जिस मैगज़ीन "नन्हा नटखट" के नाम के लिए एप्लाई किया था, वह मिल गया है और अब नन्हा नटखट की सारी तैयारी करनी है। मतलब सारी तैयारी मुझे ही करनी है। 

वहाँ से कोट लिए हुए ही मैं शक्तिनगर के लिए निकला। उन दिनों शक्तिनगर की ओर जाने वाली 108 नम्बर बस शादीपुर डिपो से भी बनकर चलती थी। शादीपुर डिपो तक मैं पैदल ही गया। वहाँ से बस भी जल्दी ही मिल गई। मैं शक्तिनगर में अग्रवाल मार्ग स्थित मनोज पाकेट बुक्स के आफिस पहुँचा तो पता चला कि गौरीशंकर गुप्ता जी रूपनगर आफिस में हैं। 

उन दिनों गौरीशंकर गुप्ता, अग्रवाल मार्ग स्थित गुप्ता भाइयों के घर के बेसमेंट में स्थित मनोज पाकेट बुक्स के आफिस में न बैठकर, रूपनगर की कोठी में बैठने लगे थे।

रूपनगर की कोठी में कन्स्ट्रक्टेड एरिया के अलावा बाहर खूबसूरत लॉन भी था। सर्दी के दिनों में सुबह की धूप में वहाँ ईजीचेयर डालकर बैठने का मज़ा ही और था, लेकिन उस दिन गौरीशंकर गुप्ता रूपनगर के निचले फ्लोर पर बने छोटे से आफिस में थे। मुझे देखते ही उस रोज वह जिस तरह खुश हुए, मुझे लगा - मामला कुछ बहुत ही खास है। फिर उनका पहला ही डायलॉग था -"आ भई, बहुत परेशान कर रखा है तूने।"

"ऐसा क्या कर दिया मैंने?" मैंने पूछा। 

"यार, तू कहाँ-कहाँ पैर फँसाये रखता है।" गौरीशंकर गुप्ता बोले- "तू एक जगह टिक जा, और कहीं नहीं, बस, मेरे यहाँ आ जा, बोल महीने में कितने पैसे चाहिए? मैं दूँगा। बस, मैं जो काम तुझे दूँ, वही करना होगा और... "

"और क्या...?" मैंने पूछा।

"सुबह नौ बजे से शाम छ: बजे तक तू मुझे आफिस में दिखना चाहिए।"

"यही नहीं हो सकता।" मैंने कहा। 

"क्यों नहीं हो सकता। मेरे यहाँ तुझे कोई डिस्टरबेन्स नहीं होगा, तुझे अलग केबिन बनवा कर दूँगा मैं। एक लड़का तेरा ध्यान रखेगा, जब कहेगा, चाय मिलेगी। खाना कहेगा, खाना भी तुझे घर का बना खिलायेंगे।"

"वो सब तो ठीक है भाई साहब, पर नौकरी करना मेरे लिए सम्भव नहीं है। एक बार राज बाबू के यहाँ की थी, लेकिन मज़ा नहीं आया।"

"तू इसे नौकरी क्यों समझ रहा है।  तू अपने केबिन में मालिक बनकर बैठ...।"

"आपने कहा है कि सुबह नौ बजे से शाम छ: बजे तक आप मुझे अपने आफिस में देखना चाहते हैं। टाइम का पंक्चुअल तो मैं राज बाबू के यहाँ भी कभी नहीं रहा।"

"तो होना चाहिए न तुझे टाइम का पंक्चुअल।"

"मैं चाहूँ भी तो नहीं हो सकता।" मैंने कहा । 

"क्यों नहीं हो सकता। योगेश, ये बात रहने दे। आदमी चाहे तो क्या नहीं कर सकता। और टाइम की पंक्चुअलटी के बिना न तो तू नोट कमा सकता है, ना ही नाम कमा सकता है। और कुछ महीने तक तू मेरे साथ ढंग से चल, मैं तेरे नावल तेरे नाम से भी छापूँगा और तुझे इण्डिया का नम्बर वन राइटर बना दूँगा।"

मुझे हँसी आ गई। 

"हँसा क्यों? मैंने क्या जोक मारा है?" गौरीशंकर गुप्ता कुछ नाराज़ हो उठे। 

"नहीं भाई साहब, मैं आपकी बात पर नहीं, अपने आप पर हँसा हूँ। पिछले दिनों एक के बाद एक कई प्रकाशकों ने मुझे नाम से छापने का आफर दिया है, लेकिन अभी मेरे पास किसी के लिए लिखने का भी वक़्त नहीं है।"

"तो क्यों नहीं है वक़्त? वक़्त निकाल और मेरे यहाँ काम करने में तुझे क्या परेशानी है। अच्छा चल, तू नौ बजे तक नहीं आ सकता तो दस बजे तक तो आ सकता है ना?"

"मैं तो आठ बजे तक भी आ सकता हूँ भाई साहब, लेकिन मुझे अपनी किस्मत पर भरोसा नहीं। दरअसल जब भी मैं कोई पक्का निर्णय करता हूँ - अचानक मेरे साथ कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है कि मैं अपने निर्णय पर अडिग नहीं रह पाता।" मैं बहुत गम्भीर हो गया था। 

"बात क्या है, मुझे बता।" गौरीशंकर गुप्ता ने बड़े अपनेपन से मुझसे कहा और फिर मैंने अपनी जिन्दगी में पहली और आखिरी बार किसी प्रकाशक को वो लम्बी दास्तान सुनाई, जो आप सबके सामने फिर कभी अपने एक एपिसोड "मैं मशहूर क्यों नहीं हुआ" मैं लिखूँगा। 

सुनकर गौरीशंकर गुप्ता भी इमोशनल हो गये और एकदम खड़े होकर मेरे करीब आये और मेरी पीठ थपथपाते हुए बोले -"चल, छोड़। ये बता। इस थैले में क्या है?"

"एक गर्म कोट है।"

"गर्म कोट...। हाँ, ठीक है, सर्दी आने वाली हैं। खरीद कर लाया है।"

"नहीं, खेल खिलाड़ी वाले सरदार मनोहर सिंह और उनकी पत्नी अपने बच्चों के लिए सर्दियों के गर्म कपड़े लाने के लिए निकले थे तो मेरे लिए भी ले आये।"

"एक बात तो है - तू जिस-जिसके साथ काम करता है, उसका दिल जीत लेता है।"

"क्या भाई साहब, मैं तो जैसे आपसे बोलता हूँ, इसी तरह सबसे हँसता-बोलता हूँ। सबके साथ एक जैसा व्यवहार है मेरा।"

"तभी तो कह रहा हूँ। अब देख, जब मैं और राज बाबू साथ-साथ बैठते थे, तब भी हमारे यहाँ अक्सर तेरे बारे में बहुत बातें होती थीं और अब विनय बाबू से तेरे बारे में बात होती रहती है और एक बात कहूँ..."

"जी....कहिये।"

"अपने मन को मजबूत कर, बहुत लम्बी उम्र होगी तेरी। मैं तो भगवान से प्रार्थना करूँगा कि मेरी उम्र भी तुझे लग जाये। यार, तू बहुत जरूरी आदमी है हम सबके पब्लिकेशन के लिए।" गौरीशंकर गुप्ता मेरे जीवन में एकमात्र शख्स रहे हैं, जिन्होंने मेरे लिए शुभकामना प्रकट करते हुए इतनी बड़ी बात कही थी कि मेरी उम्र भी तुझे लग जाये। जीवन में फिर कभी ऐसे शब्द कभी भी किसी बहुत ज्यादा अपने या अपने रिश्तेदारों से भी आज तक नहीं सुने। 
बातें होती रहीं। गौरीशंकर गुप्ता जी ने चाय और साथ में बिस्कुट नमकीन भी मँगा ली, लेकिन इतनी देर की बातों में अब तक कोई ऐसी बात नहीं हुई, जिससे मुझे पता चलता कि मुझे मेरठ से बुलवाने का खास कारण क्या था? 

पर मैं भी अपने मुँह से कोई सवाल नहीं करना चाहता था,  इसलिए जब चाय का आखिरी सिप लेकर मैंने कप रखा तो गौरीशंकर गुप्ता से कहा-"अच्छा, अब चलूँ भाई साहब?"

"अबे, अभी कैसे जायेगा। अभी तो तेरी मेरी कोई बात हुई ही नहीं है, जिस काम के लिए जैन साहब को मेरठ भेजकर तुझे दिल्ली बुलवाया है, वो बात तो अभी तक हुई ही नहीं।"

"अच्छा, मैं तो यही सोच रहा था कि आपने साथ में चाय पीने के लिए बुलवाया था और चाय तो पी ली।"

गौरीशंकर गुप्ता ठहाका मारकर जोर से हँसे। फिर हँसी रुकने पर बोले - "यार, मेरे पास बहुत सारी स्क्रिप्ट इकट्ठी हो रही हैं। शायद सौ डेढ़ सौ से भी ज्यादा होंगी।"

"किस तरह की स्क्रिप्ट...?" मैंने पूछा। 

"जासूसी भी हैं और सामाजिक भी हैं।"

"पर इतनी सारी स्क्रिप्ट कैसे इकट्ठी हो गयीं?" मैं अचरज से बोला।

"अरे यार, रोज कोई न कोई नया लेखक आ जाता है। मैं लाख कहूँ कि भई मुझे नहीं चाहिए, पर कई रोने लगते हैं, गिड़गड़ाने लगते हैं कि स्क्रिप्ट के बदले कुछ भी देने के लिए कहते हैं। तो क्या करें - दूसरे की मजबूरी देख कर तरस आ जाता है। जिन्हें नाम से छपने की जिद्द होती है, वो तो अपनी कहानी उठा कर चल देते हैं, लेकिन जिन्हें पैसा चाहिए होता है, पैर तक पकड़ लेते हैं। अब ऐसे राइटरों से पीछा छुड़ाने के लिए सरसरी तौर पर स्क्रिप्ट देखकर आइडिया लगा लेते हैं कि कितने तक दिये जा सकते हैं और दे-दिवाकर उसे विदा कर देते हैं। अब वो ही स्क्रिप्ट जी का जंजाल बनी हुई हैं, न तो फेंकते बनती हैं, ना ही छापते बनती हैं। अब तू दो-दो चार- चार स्क्रिप्ट ले जा और पढ़कर बता कौन सी as it is छापी जा सकती है, कौन सी एडिटिंग के बाद छप सकती है और कौन सी कूड़े में फेंकनी है।"

"भाई साहब, मेरे पास टाइम कहाँ है स्क्रिप्ट पढ़ कर पास फेल करने का?" मैंने पीछा छुड़ाने की गर्ज से तत्काल कहा तो गौरी भाई भी तत्काल ही बोले -"अरे यार, मैं तुझसे फ्री में नहीं पढ़वाऊँगा - मैं तुझे पढ़ने के भी पैसे दूँगा। सौ रुपये 'पर स्क्रिप्ट'.... ठीक है?"

"नहीं भाई साहब। कई बार स्क्रिप्ट इतनी बेकार होती हैं कि पढ़ने का मन ही नहीं होता।' मैं टालने के मूड में था, पर जैसा कि हमेशा हर जगह होता आया था, मुझे 'ना' करना ही नहीं आता था। ढंग से 'ना' करना मेरे लिए कभी सम्भव ही नहीं हुआ। 

गौरीशंकर गुप्ता मेरी बात के जवाब में कह उठे -"अरे तो यही तो तुझे करना है, जो बेकार स्क्रिप्ट हो, उसे एक तरफ फेंक और उसके पहले पेज पर ही 'काटा' ( X ) लगा कि बेकार है, तेरे लिए तो यह काम बहुत आसान है। मुझे मालूम है - तू एक-एक घण्टे में फैसला कर लेगा। तू विनय भाई जी से पूछ ले, उनसे भी मैंने तेरी बहुत तारीफ की है कि उपन्यासों के बारे में रीडिंग, करेक्शन, एडीटिंग योगेश मित्तल से बढ़िया कोई नहीं कर सकता, ये काम तो मैं उसी से करवाऊँगा। तू नहीं करेगा तो सोच विनय भाई की नज़र में मेरी क्या बात रह जायेगी।"

"नहीं भाई साहब, मेरी तबियत भी ठीक नहीं रहती। आपको बताया ही है।" गौरी भाई के सभी दांव बूमरैंग की तरह उलटते हुए मैं बोला। ऐसा करते हुए मेरे दिमाग में रायल पाकेट बुक्स वाले जैन साहब और वेद प्रकाश शर्मा की बातें भी गूँज रही थीं कि मुझे लोगों को 'मना करना' 'ना करना' सीखना चाहिए, पर गौरीशंकर गुप्ता वो शख्स थे, जिन्होंने मेरी राइटिंग पर ध्यान दे, मुझे अरुण कुमार शर्मा से कहकर मनोज पाकेट बुक्स में तब बुलवा लिया था, जब प्रकाशन जगत के गिनती के लोग ही मुझे पहचानते थे और अब तो यह हाल था कि मेरठ में सीक्रेट सर्विस प्रकाशन कार्यालय के संस्थापकों में से एक आदरणीय तिलकचन्द जैन कई बार कह देते थे- जो योगेश मित्तल को नहीं जानता, वो कोई पब्लिशर तो हो ही नहीं सकता। बेशक जैन साहब यह मुझे खुश करने के लिए बोलते हों, पर उस समय यह सच्चाई भी थी कि फिक्शन छापने वाले तकरीबन सभी प्रकाशक मुझे नाम और शक्ल से पहचानते थे। 

पर गौरीशंकर गुप्ता जी पर मेरा तबियत का बहाना भी नहीं चला, वह मुझे समझाते हुए बोले -
"अरे तो ये काम तो तबियत खराब में भी हो सकता है। तबियत खराब में तू वेद प्रकाश काम्बोज और सुरेन्द्र मोहन पाठक के उपन्यास नहीं पढ़ता क्या? बस, वो न पढ़ कर, तू ये स्क्रिप्ट पढ़, इसमें तुझे पैसे भी मिलेंगे। अच्छा चल, एक स्क्रिप्ट पढ़ने के तुझे डेढ सौ रुपये दूँगा और जिस स्क्रिप्ट में एडिटिंग और ठीक ठाक करने का काम होगा, वो तुझसे ही करवाऊँगा, उसके अलग से पैसे दूँगा। अब तो 'हाँ' कर दे।"

और मैंने 'हाँ' कर दी तो गौरीशंकर गुप्ता गम्भीर होकर बोले -"देख योगेश, यह काम मैं किसी और से भी करा सकता था, पर जैन साहब को मेरठ भेजकर इसीलिए बुलवाया कि मुझे मालूम है - तू जिस स्क्रिप्ट पर हाथ रख देगा, उसे दस-बीस हज़ार से लाख-दो लाख बेचना भी मेरे लिए मुश्किल नहीं होगा। औरों की क्या कहूँ... बहुतों की तो हिन्दी भी ठीक नहीं है।"

उस दिन गौरीशंकर गुप्ता जी ने मुझे चार स्क्रिप्ट दीं। देना तो वो ज्यादा चाहते थे, किन्तु कागज़ का भार भी कम नहीं होता। इसलिए स्क्रिप्ट ले जाने में, मुझे ज्यादा परेशानी न हो, इसलिए छ: रखते-रखते चार पर आ गये। 

फिर दिल्ली में मैं बहुत व्यस्त हो गया। मेरठ जाने का ख्याल भी आता तो मैं उसे दुत्कार देता था। 

सरदार मनोहर सिंह की नन्हा नटखट की तैयारी के लिए बार-बार कामिक्स बनाने में उस्ताद बन चुके हरविन्दर माँकड़ और परविन्दर मिचरा के अलावा उन दिनों हरीश बहल, मधु मुस्कान में कार्टून बनाने वाले हरीश सूदन और सरिता, गृहशोभा आदि में 'बेदी' नाम से कार्टून पेज बनाने वाले जितेन्द्र बेदी जी तथा अन्य कई लोगों से भी मिला। लेकिन काम आये अपने हरविन्दर माँकड़, परविन्दर मिचरा तथा दिल्ली से बाहर के आर्टिस्ट, जिनमें बिहार में छपरा का राजू नाम का एक आर्टिस्ट भी था। 

अपराध कथाएँ भी शुरू हो गई थी और उसके शुरुआती अंक के लिए राजभारती जी ने कम्प्यूटर टाइपिंग करवाने का फैसला किया। कम्प्यूटर टाइपिंग उस समय आम न थी, शुरुआत ही थी और पश्चिमी दिल्ली में पालम गाँव के एरिया में कृष्ण मुरारी गर्ग नाम के युवक ने तीन-चार कम्प्यूटर लगाकर, कम्प्यूटर टाइपिंग करने और सिखाने का एक अच्छा सेन्टर खोला था। उस समय वहाँ आस-पास तो क्या, दूर-दूर तक कम्प्यूटर कहीं नहीं था। अपराध कथाएँ तैयार करवाने के लिए मुझे रोज पालम जाना पड़ता था।
 
उन दिनों कम्प्यूटर में ब्लैक एंड व्हाइट मानीटर होते थे। जो लोग कम्प्यूटर के बारे में जानते हैं, उन्हें मालूम ही होगा कि आरम्भ में कम्प्यूटर के जो माडल आये थे, उनमें सबसे पहला टू एट सिक्स, फिर थ्री एट सिक्स, उसके बाद फोर एट सिक्स आये थे। मैंने जो पहला कम्प्यूटर खरीदा था, वो एक फोर एट सिक्स सेकेण्ड हैण्ड खरीदा था। उसकी हार्ड डिस्क फोर एम बी थी और शुरुआत में रैम सिर्फ आठ केबी थी, जिसे बाद में मैंने बढ़वा कर, सोलह केबी करवा लिया था। 

और हाँ, शुरुआत में आने वाले 'नये टू एट सिक्स' की कीमत उस समय लगभग साठ हज़ार पड़ती थी। इस लिहाज़ से आज जरा सोचिये कि कम्प्यूटर के मामले में हम कितने सुखी हैं। 

तब लिखते - पढ़ते - सम्पादन व प्रूफरीडिंग करते, छ: महीने कैसे गुजर गये पता ही नहीं चला। इन छ: महीनों में एक खास बात यह भी हुई कि राजभारती जी के छोटे भाई महेन्द्र सिंह के बड़े बेटे रिम्पी ने भी अपने यहाँ कम्प्यूटर लगा लिया और अपराध कथाएँ का काम कृष्ण मुरारी गर्ग के यहाँ से रिम्पी के यहाँ होने लगा। उसके बाद उत्तमनगर में भी रामगोपाल नाम के एक शख्स ने भी अपने यहाँ कई कम्प्यूटर लगा लिये।
 
हम कुछ कहानियाँ रामगोपाल के यहाँ भी टाइप करवाने लगे, क्योंकि रिम्पी ने सिर्फ एक कम्प्यूटर लगाया था और उसे और भी बहुत से काम होते थे, इसलिए उसके यहाँ काम की गति बेहद धीमी थी। 

छ: सात महीने बाद अचानक एक पोस्ट कार्ड मेरे घर के पते पर आया, उसमें लिखा था - "योगेश जी, शीघ्र अति शीघ्र मेरठ आकर मिलो। - सतीश जैन।"

पत्र में लक्ष्मी पाकेट बुक्स की मोहर भी लगी थी। 

मेरठ से किसी ने मुझे याद किया, यह एहसास मेरे दिल में खलबली मचाने के लिए काफी था। उन दिनों खेल खिलाड़ी, विश्व क्रिकेट, नन्हा नटखट और अपराध कथाएँ सभी का काम कम्पलीट था और मनोज पाकेट बुक्स के यहाँ के उपन्यासों का पढ़ना और करेक्शन, एडीटिंग भी बन्द थी। 

मैं राजभारती जी से मिला और उनसे कहा -"मैं कुछ दिनों के लिए मेरठ जाना चाहता हूँ।"

"कुछ दिन ठहर कर चले तो मैं भी साथ चलूँगा।" भारती साहब बोले -"अग्निपुत्र सीरीज़ का नावल कम्पलीट हो जायेगा।"

आम तौर पर मैं हमेशा भारती साहब की बात मान लिया करता था, पर सतीश जैन का पोस्ट कार्ड आया है, यह 
ख्याल मेरे दिमाग में घूम रहा था तो बोला- "यार लक्ष्मी पाकेट बुक्स का अर्जेन्ट मिलने का लैटर आया है।"

"ठीक है, फिर तो फटाफट जा और वहीं रुके तो मंगल-बुध को धीरज पाकेट बुक्स में ग्यारह- बारह बजे तक चक्कर मार लेइयो, मैं वहीं मिलूँगा।"

इसके बाद मैं सरदार मनोहर सिंह से भी मिला और उन्हें भी मेरठ जाने के बारे में कहा तो वह बोले -"ठीक है, जा, पर वहीं जमकर मत बैठ जाइयो।"

वह शुक्रवार का दिन था। सर्दियाँ शुरू हो गईं थीं, इसलिए स्वेटर के ऊपर मैंने मनोहर सिंह का दिया गर्म कोट भी पहन लिया। पत्नी ने हालांकि मना किया कि इसकी बाजू कुछ लम्बी है, मुड़वा लो, तब पहनना, पर मैंने कहा -"अरे ठण्ड से बचाव रखना है, बाजू मोड़ लूँगा।"

पत्नी ने फिर कुछ नहीं कहा, क्योंकि मेरे घर में सभी भली भाँति जानते थे कि ठण्ड में अक्सर मेरी तबियत खराब हो जाया करती है। दमा जोर पकड़ लेता है। 

लेकिन मेरठ की बस के सफर में ही मुझे पता चल गया कि कोट की बाजू अन्दर को मोड़ लेने का सिस्टम ज्यादा देर काम नहीं करता, हर बार मोड़ने के थोड़ी देर बाद ही बाजू फिर से खुलकर लम्बी हो जाती थी। 

शाम साढे़ पांच बजे के करीब मैं मेरठ पहुँचा तो सोचा कि लक्ष्मी पाकेट बुक्स का आफिस तो बन्द होने को होगा, इसलिए पहले वेद भाई के यहाँ चलते हैं। 

रिक्शे द्वारा शास्त्रीनगर वेद प्रकाश शर्मा के घर पहुँचा तो वेद भाई ड्राइंग रूम में मुझसे मिले और मिलते ही सबसे पहले मुझसे कहा- "ये कोट क्या छोटे भाई का पहन आया है?"

वेद भाई जानते थे, मेरा छोटा भाई राकेश मुझसे लम्बा है। 

"नहीं-नहीं, मेरा ही है, वो खेल खिलाड़ी वाले सरदार मनोहर सिंह ने मेरे लिए खरीदा था, पर उनके पास नाप नहीं था, आइडिये से लिया था, आइडिया थोड़ा सा गलत बैठ गया।"

"तो इसकी बाजू थोड़ी सी अन्दर को मुड़वा ले, ऐसे तो माँगे का लगे है।"

"हाँ ऐसा ही करूँगा।" मैंने कहा। 

"और बता, अब कहाँ-कहाँ लिख रहा है?"

मैंने वेद को बताया कि पिछले छ: महीने तो भारती पाकेट बुक्स और मनोज पाकेट बुक्स के लिये ही लिखा है और यह भी बताया कि भारती साहब ने एक नई मैगज़ीन निकाली है -'अपराध कथाएँ' और मनोहर सिंह भी 'खेल खिलाड़ी' के साथ-साथ 'विश्व क्रिकेट' और 'नन्हा नटखट' छाप रहे हैं। सबका काम मैं ही देख रहा हूँ। 

सुनकर वेद प्रकाश शर्मा ने मुझसे कहा -"एक बात बता, तेरे दिमाग का कोई स्क्रू ढीला-वीला तो नहीं है।"

"क्या मतलब?" मैंने पूछा। 

"ये बड़े-बड़े अखबारों के सम्पादकों को पब्लिक जानती-पहचानती है क्या?" 

मैं तत्काल कुछ नहीं कह पाया। 

वेद भाई ने फिर कहा-"बेवकूफ आदमी, तेरे हाथ में जो हुनर है, उसका तो तू सत्यानाश कर रहा है। ये सम्पादकी-वम्पादकी में तू जितना टाइम खराब करै है, उतने में दो नहीं तो एक बढ़िया सा नावल तो आसानी से कम्पलीट कर सकै है। गलत तो नहीं कहा मैंने?"

"नहीं, कहा तो ठीक है, पर... "

"पर-वर क्या कर रहा है। ये जो भी मैगज़ीन निकल रही हैं, चल रही हैं, कितने दिन चलेंगी? बिना विज्ञापन के ये सब जल्दी बन्द हो जायेंगी और विज्ञापन इन्हें मिलेंगे नहीं। तू क्यों अपना टाइम खराब कर रहा है। कह दे राजभारती से भी और मनोहर सिंह से भी कि तू ये प्रूफरीडिंग, एडीटिंग नहीं करेगा, इसके लिए किसी और को ढूँढ लें।"

"यार, यह मुश्किल है। पर मैं यह सब काम करते हुए भी लिख तो रहा हूँ।"

"क्या लिख रहा है? मनोज पाकेट बुक्स के लिए बाल पाकेट बुक्स और बाकी लोगों के लिए विक्रान्त सीरीज़। इससे क्या तेरा मुकद्दर बन जायेगा?"

इस बीच सेन्टर टेबल पर चाय और बिस्कुट-नमकीन पकौड़े आ गये। पकौड़े शायद भाभी जी ही बना रही थीं। 

चाय के घूँट भरते-भरते वेद भाई ने कहा -"योगेश, ये सम्पादकी तेरे लिए बेकार है। इससे कोई फ्यूचर नहीं सैट होने का। फ्यूचर तो भाई उपन्यास लिखने से ही बनेगा। वो भी कहीं न कहीं सेक्रीफाइस करके अपने नाम से छपने पर।"

"ये बात तो है।" मैं धीरे से बोला। दरअसल वेद उस समय लेखक या दोस्त नहीं प्रतीत हो रहा था। उसका व्यवहार एक बड़े भाई जैसा था, हालांकि वह उम्र में मुझसे बड़ा नहीं था। 

"अच्छा बता, तूने गंगा पाकेट बुक्स को वो उपन्यास दिया, जिसकी उन्होंने पब्लिसिटी की थी। लक्ष्मी पाकेट बुक्स को वो नावल दिया, जिसकी उन्होंने पब्लिसिटी की थी?"

"यार, मैं छ: सात महीने बाद तो मेरठ आया हूँ।" मैंने कहा। 

"बहुत अच्छा किया, पर वो नावल कम्पलीट करके लाया? नहीं न? तो फिर यहाँ क्या घास खोदने आया है?"

"नहीं, वो लक्ष्मी पाकेट बुक्स से सतीश जैन जी का लैटर आया था।" मैं जेब से सतीश जैन का वह लैटर निकालने लगा, जो मैं साथ लेकर आया था। 

वेद शायद समझ गया। तुरन्त बोला - "रहने दे... रहने दे। मुझे लैटर मत दिखा। मुझे मालूम है - मामा ने लिखा होगा।"

लक्ष्मी पाकेट बुक्स के स्वामी सतीश जैन समूचे मेरठ में मामा नाम से ही सम्बोधित किये जाते थे। 

जेब से मेरा हाथ खाली बाहर निकला तो वेद भाई ने फिर कहा -"और मामा ने तुझसे क्या काम कराना होगा, कहे तो अभी बता दूँ।"

(शेष फिर) 

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