प्रतिध्वनि

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कविता, कहानी, संस्मरण अक्सर लेखक के मन की आवाज की प्रतिध्वनि ही होती है जो उसके समाज रुपी दीवार से टकराकर कागज पर उकेरी जाती है। यह कोना उन्हीं प्रतिध्वनियों को दर्ज करने की जगह है।

सोमवार, 26 जुलाई 2021

कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा जी के साथ की - 10

जुलाई 26, 2021 0
कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा जी के साथ - 10

दिल्ली में जो लोग रहते हैं, कहीं भी घूम फिर आयें, चैन की साँस, मानों दिल्ली में ही मिलती है। 


वैसे तो यह हर शहर में रहने वाले, अपने शहर के लिए महसूस करते हों, पर दिल्ली वालों की बात कुछ और ही है। 

दिल्ली के साथ बहुत सी बातें जुड़ जाती हैं। जैसे - 

दिल्ली है दिल वालों की। 
अब दिल्ली दूर नहीं। 
दिल्ली दिल है हिन्दुस्तान का। 

और

दिल बड़ा है दिल्ली का, किसी भी गाँव, शहर, प्रान्त, देश का दिल्ली आता है तो दिल्ली का होकर रह जाता है। 
बहुत से आक्रांता आये दिल्ली और बार-बार आये। कुछ दिल्ली को लूटकर चले गये तो कुछ यहीं के हो गये। 

हम जब कलकत्ता (आज का कोलकाता) रहते थे, दुनिया का सबसे खूबसूरत शहर कलकत्ता ही लगता था। वहाँ बोटानिकल गार्डेन के विशाल बरगद की छाँव में हवाओं के झोंके मन प्रसन्न कर देते थे तो धर्मतल्ला और उसके आस-पास फुटबॉल क्लबों के मैदान एक जुनून सा पैदा कर देते थे और दक्षिणेश्वर, ताड़केश्वर, काली मंदिर, हुगली नदी, डायमंड हार्बर तथा कलकत्ते का कोना-कोना दिल से नहीं, रोम-रोम से जुड़ा लगता था और हम कलकत्ते से बाहर के अपने रिश्तेदारों को 'कलकत्ते' के बारे में यह सब बताते हुए बड़ा गर्व महसूस करते थे कि कलकत्ते में 'कलकत्ता' नाम का तो कोई रेलवे स्टेशन ही नहीं है। एक रेलवे स्टेशन है 'हावड़ा' और दूसरा रेलवे स्टेशन है -'सियालदह' और हवाई अड्डा है - 'दमदम।'

मतलब कलकत्ता में कलकत्ता नाम का कोई हवाई अड्डा भी नहीं है। 

और इस लिहाज़ से लोगों को समझाते कि कलकत्ता कितना अनोखा शहर है। 

पर कलकत्ता छूटा तो कलकत्ते की बातें भी छूट गईं और जब दिल्ली के हो गये तो दिल्ली की सुबह-शाम सुहानी लगने लगीं। 

बाहर से दिल्ली आने वाले, दिल्ली से अपरिचित मेहमानों को हम बताते कि दिल्ली में तीन स्टेशन हैं- शाहदरा, दिल्ली और नई दिल्ली। और अब तो हमने चौथा निज़ामुद्दीन भी जोड़ लिया है। पुराने समय में शाहदरा को हम दिल्ली का प्रवेश द्वार बताया करते थे। 

मेरठ से दिल्ली आया तो घर पहुँचने के लिए अन्तर्राज्यीय बस अड्डे से निकल कश्मीरी गेट बस टर्मिनल पर बस का इन्तजार करना भी बड़ा बोझिल काम लगता था, पर हर उकताहट झेल कर, अपने घर पहुँचने से अधिक आनन्द का क्षण दूसरा नहीं हो सकता।

घर पहुँच अपने परिवार के बीच हर पल किसी रोचक फिल्म को देखने के आनन्द जैसा था। 

हमारे घर तब एक प्रथा हम अपने बचपन से देखते आ रहे थे, वह यह कि रात का खाना पूरा परिवार एक साथ बैठकर खाया जाता था। मम्मी-पिताजी और सभी भाई बहनों के एक साथ बैठ कर खाना खाने का आनन्द बयान नहीं किया जा सकता ।

उस रात चैन की नींद सोने के बाद, अगले दिन सुबह ही जल्दी तैयार होकर मैं पटेलनगर पहुँचा और सरदार मनोहर सिंह से मिला तो यह जानकर बड़ी निराशा हुई कि खेल खिलाड़ी का तो मैटर भी प्रेस में नहीं गया। 
उन दिनों खेल खिलाड़ी पटेलनगर के पार शादी खामपुर स्थित रविन्दर पाल सिंह की प्रेस में छपा करती थी और स्थिति यह थी कि सरदार मनोहर सिंह आर्थिक तंगी के चलते पिछले दो अंकों की कम्पोजिंग - प्रिन्टिंग का बिल नहीं दे पाये थे और रविन्दर पाल सिंह का कहना था कि कम से कम एक इशू की पेमेन्ट तो कर दें, उसे भी वर्कर्स को तनख्वाह देनी है। और जगहों की पेमेन्ट भी लटकी हुई हैं। तनख्वाह नहीं दी तो वर्कर काम छोड़, कहीं और काम कर लेंगे। 

तो दोस्तों, उन दिनों ऐसा भी होता था, प्रेस के मालिकों का पूंजीपति होना जरूरी नहीं था। 

ऐसे आम मध्यमवर्गीय लोग भी कम्पोजिंग एजेन्सी और प्रिंटिंग प्रेस लगा देते थे, जिनकी गाड़ी प्रकाशकों की पेमेन्ट पर निर्भर रहती थी। 

मैंने सरदार मनोहर सिंह से पूछा कि रविन्दर पाल सिंह की पेमेन्ट क्यों नहीं हुई ? क्या मनीआर्डर नहीं आये? बुकसेलर्स ने पैसे नहीं भेजे?"

तो वह बोले - "वीपी मनीआर्डर तो आये हैं, पर कलकत्ता, बम्बई, इन्दौर, बड़े शहरों की पेमेन्ट अभी पाँच-छ: महीनों से नहीं आई है।"

तब मैंने पूछा - "वीपी मनीआर्डर की सारी पेमेन्ट क्या घर के खर्च में खत्म हो गई?"

"नहीं...। पर खर्च हो गई।" मनोहर सिंह ने कहा। 

"खर्च हो गई...? कैसे...? कहाँ...?" मैंने पूछा। 

तब मनोहर सिंह अचानक मुझसे बोले - "चल मेरे साथ...।"

"कहाँ...?" मैंने पूछा। 

"चल तो...।"

और हम खेल खिलाड़ी आफिस से नीचे उतर आये। सीढ़ियों की गैलरी में ही सरदार मनोहर सिंह की मोटर-साइकिल खड़ी थी। 

छोटे कद की वजह से मैं मोटर साइकिल पर आराम से नहीं बैठ पाता था, इसलिए मनोहर सिंह हमेशा मोटर साइकिल मेरी तरफ टेढ़ी करके मुझे बैठाते थे, फिर सीधी कर, खुद बैठ कर किक मारकर, स्टार्ट करते थे। 
उस दिन मोटर साइकिल स्टार्ट करके उन्होंने साउथ पटेलनगर की ओर दौड़ा दी। 

दोस्तों, हमारे लेखक मित्रों में कई का कहना यह रहा है कि प्रकाशक और लेखक में दोस्ती का क्या मतलब है? लेकिन मेरी अपने हर प्रकाशक से ही नहीं, जिनके लिए मैंने कभी नहीं लिखा, उनसे भी गहरी न सही, अपनेपन वाली दोस्ती रही है, ऐसी कि वे अपने सुख-दुख और व्यक्तिगत मामलों की बातें भी मुझसे कर लेते थे। यहाँ तक कि अपनी लवलाइफ के किस्से भी मुझसे शेयर कर लेते थे। वे मजेदार किस्से भी कभी प्रस्तुत करूँगा, लेकिन उनमें सम्बन्धित शख्स का नाम देना, जहाँ मुनासिब नहीं होगा, वहाँ काल्पनिक नामों से काम चलाना पड़ेगा। 
सरदार मनोहर सिंह ने मोटर साइकिल साउथ पटेलनगर में सीधी शेरसिंह की दुकान के सामने ले जाकर रोक दी। 
आगे बढ़ने से पहले शेरसिंह के बारे में बता दूँ। शेरसिंह सरदार मनोहर सिंह का बरसों पुराना यार था। ऐसा गहरा कि हफ्ते में दो तीन बार दोनों ही साथ में पीने पिलाने की महफ़िल सजाते रहते थे, पर वो शाम और रात की बात होती थी और उस समय तो सुबह के दस ही बजे थे। 

"यहाँ क्या मीट लेना है...?" मैंने मोटर साइकिल से उतरते उतरते पूछा तो मनोहर सिंह बहुत धीरे से बोले- "नहीं, तू चुप रह बस...।"

फिर मेरे साथ साथ मनोहर सिंह शेरसिंह की दुकान के बिल्कुल करीब पहुँचे। उस समय दुकान पर एक भी कस्टमर नहीं था। 

शेरसिंह ने मधुर मुस्कान के साथ हम दोनों का स्वागत किया और पंजाबी में सवाल किया - "चा मंगावां...।"
"नहीं यार, तू फटाफट नोट-सोट दे दे...। ये योगेश मेरठ गया हुआ था और खेल खिलाड़ी की वजह से अपने सारे काम छोड़ कर दिल्ली आया है और सुबह से मुझ पर गुस्सा हो रहा है। इसके पास टाइम तो होता नहीं, मेरे लिए स्पेशल टाइम निकाल कर मेरा काम करता है। इसके सामने ही वो प्रेस वाला आ गया और बिगड़ने लगा कि वर्कर्स को तनख्वाह देनी है।"

"यार सॉरी... सॉरी  यार...। की करां, इन्तजाम ही नहीं हुआ  नहीं तो मैं तेरे घर पहुँचा देता...।" शेरसिंह शर्मिन्दगी से सिर झुकाये हुए बोला। 

"देख शेरसिंह, तेरी जरूरत पर मैंने एक मिनट नहीं लगाया, तुझे अपने धन्धे की परवाह न कर पैसे दिये, अब तू मेरी इज्जत रख ले, देख, मेरा धन्धा ही बन्द हो गया तो भूखों मरूँगा...। और फिर कभी किसी की मदद भी क्या करूँगा।"

शेरसिंह ने एक उचटती निगाह मुझ पर डाली। फिर अपना गल्ला खोला। उसमें से कुछ सौ-सौ के नोट निकाले। फिर मुट्ठी में बन्द कर, मनोहर सिंह को आगे आने का इशारा किया। मनोहर सिंह आगे को झुके तो शेरसिंह ने मनोहर सिंह का हाथ थाम, उनके हाथ में वो नोट ठूँस दिये और फुसफुसाया - "हाली इतने ही हैं। हुण काम चला, फिर देखते हैं।"

"कितने हैं....?" सरदार मनोहर सिंह ने पूछा। 

"एक हज़ार...।" 

"यार  ये चिड़िया का चुग्गा किस काम आयेगा..? इससे तो मैं योगेश की तनख्वाह भी नहीं दे सकता। पिछले चार महीने की देनी है।" मनोहर सिंह ने नोट शेरसिंह के मुँह  पर फेंक दिये। 

"यार, नहीं हैं इस वक़्त...।" शेरसिंह भी एकदम गरम हो उठा- "कह रहा हूँ - दे दूँगा। अब नहीं हैं तो क्या अपनी जान दे दूँ...?"

"देख शेरसिंह...।" मनोहर सिंह नरम पड़ते हुए बोले - "अगर इससे काम चलता तो मैं चुपचाप लेकर चला जाता, पर इससे तो रविन्दर पाल का एक बिल भी पूरा नहीं पड़ेगा और जब तक एक बिल क्लीयर नहीं होता...वो आगे काम करने को तैयार नहीं है। देख, कुछ और जुगाड़ कर...।"

शेरसिंह ने एक क्षण सोचने का दिखावा किया। हाँ, मैं उसे दिखावा ही कहूँगा। सरदार मनोहर सिंह की परेशानी से वह जरा भी परेशान नज़र नहीं आ रहा था। कुछ क्षण यूँ ही दायें-बायें निगाह दौड़ाने के बाद उसने अपने कैश बाक्स में फिर हाथ डाला और सौ सौ के कुछ नोट निकाल कर, मनोहर सिंह द्वारा पहले फेंके गये रुपयों में मिलाये और उन्हें सरदार मनोहर सिंह की ओर बढ़ाते हुए रूखे स्वर में पंजाबी में बोला -"ले हुण, चुपचाप टुर जा, होर नहीं है मेरे कोल...।"

सरदार मनोहर सिंह ने रुपये लिए, गिने। कुल दो हज़ार थे। एक क्षण वह नोट देखते रहे, फिर नोट मेरी ओर बढ़ा दिये। 

"योगेश, जरा सम्भाल कर रख ले। " वह मुझसे बोले। 

मैंने नोट पैण्ट की अन्दरूनी जेब में रख लिये। 

एक बार फिर सरदार मनोहर सिंह ने मोटर साइकिल सम्भाली। मुझे बैठाया और दौड़ा दी। रास्ते में बोले - "देख यार, मैंने इसकी समय पर मदद की, पर मेरी जरूरत की इसे चिन्ता ही नहीं है।"

"तुमने शेरसिंह को पैसे दिये हैं?" मैंने पूछा। 

"हाँ यार...।"

"कितने...?"

"वो यार, इसका मकान बन रहा है तो मेरे सामने गिड़गड़ाने लगा...।"  सरदार मनोहर सिंह बताने लगे, लेकिन वह बात को लम्बा खींच रहे थे तो मैंने बात काट दी और सवाल किया - "कितने दिये हैं?"

"पन्द्रह हज़ार...।" सरदार मनोहर सिंह यूँ बोले, जैसे कोई अपराधी अपना गुनाह स्वीकार कर रहा हो। 

"कब दिये थे?" मैंने पूछा। 

"तीन महीने हो गये। तब बोला था - पन्द्रह दिन में देता हूँ...। पर कब से माँग रहा हूँ, रोज़ लारा दिये जा रहा है। आज शायद तेरी शर्म कर ली...। मैं इसीलिए तुझे साथ लेकर आया था।"

बातों बातों में मोटर साइकिल साउथ पटेलनगर से वेस्ट पटेल नगर पहुँच गई तो सरदार मनोहर सिंह ने अचानक मोटर साइकिल एक रेहड़ी वाले के सम्मुख रोक दी । रेहड़ी में आलू लदे थे। रेहड़ी वाला एक नाटे कद का मोटा व्यक्ति था, जिसका पेट आगे को निकला हुआ था। वह पर्पल से रंग का मैला-कुचैला कुर्ता पायजामा पहने था। 

"ओये बोटे...।" सरदार मनोहर सिंह रेहड़ी में से एक आलू उठा, रेहड़ी वाले को मारते हुए बोले - "ला, पैसे दे फटाफट...।"

"यार, अभी तो सुबह से बोहनी ही नहीं हुई...।" सब्जी वाला बोटा नाम का व्यक्ति रूंआसे स्वर में बोला। 

"आज बोहनी नहीं हुई तो उल्लू के पट्ठे, कल तो कमाया होगा। परसों तो कमाया होगा। उससे पहले तो कमाया होगा।"

"कहाँ यार...। बहुत मन्दा है। कुछ बच ही नहीं रहा।" बोटा अपनी पतली सी आवाज में बोला। 

अन्ततः बोटे से कुछ नहीं मिला और सरदार मनोहर सिंह ने मोटर साइकिल आगे बढ़ा दी। 

"इसे कितने रुपये दे रखे हैं?" मैंने पूछा। 

"ढाई हजार...।" सरदार मनोहर सिंह  धीरे से बोले। 

"कब...?"

"महीना हो गया...।"

"और कितनों को उधार दिया हुआ है?"

"हैं...तीन-चार और...।"

"ऐसे ही ढाई-ढाई हज़ार तो दिये होंगे...?"

"नहीं, एक दो को ज्यादा भी दिये हैं।"

"घर में, भाभी जी को पता है यह सब...?"

"नहीं यार, तू कुछ बोल भी मत देइयो, वरना बवाल हो जायेगा।"

"बवाल तो मचना ही चाहिए...।" मैंने कहा- "दुनिया की मैगज़ीन आफसेट प्रेस पर छप रही हैं और हम अभी तक लैटर प्रेस पर अटके हैं। और लैटर प्रेस में भी कई बार हमें दो-दो महीने का संयुक्तांक निकालना पड़ा है और आप लोगों को उधार दिये जा रहे हो।" मैं एकदम गर्म हो गया। 

"यार, सब साथ में खाने-पीने वाले लोग हैं।" सरदार मनोहर सिंह शर्मिन्दगी वाले भाव में बोले। 

"अरे तो इन सब लोगों के साथ दारू की महफ़िल जुटाने का भी मतलब क्या है? आपको अकेले पीने की आदत नहीं है तो कैसे भी लोगों के साथ बैठ जाते हो, पर ऐसे में खर्च कौन करता है। ये लोग तो रोज-रोज बोतल मँगाने से रहे।" मैं फिर से गर्म होकर बोला। 

"अब यार, पता नहीं था कि ये मेरे साथ ऐसा करेंगे। अच्छा, आगे से ऐसा नहीं करूँगा। ऐसे लोगों के साथ बैठकर नहीं पियूँगा। तू गुस्सा मत हो।"

उसके बाद हमने वहाँ अन्य कई सब्जी वालों की रेड़ियों को तलाश किया, पर अन्य जिन लोगों से सरदार मनोहर सिंह ने दो से पाँच  हज़ार दे रखे थे, कोई वहाँ नहीं दिखा और खास बात यह थी कि मनोहर सिंह को उनमें से किसी के घर का भी पता नहीं था तथा अन्य रेहड़ी वालों में से कोई भी पता बताने को तैयार नहीं था।
 
तो दोस्तों, खेल खिलाड़ी पत्रिका, जो कभी बीस पच्चीस हज़ार मज़े में बिक जाती थी। उसकी प्रसार संख्या कम होते-होते आखिरकार एकदम बन्द हो जाने के अनेक कारणों में से एक कारण सरदार मनोहर सिंह का दरियादिल होना और दूसरा रोज चार लोगों के साथ बैठकर इंग्लिश दारू पीने की आदत थी।

खैर, उस दिन बाद में खेल खिलाड़ी के आफिस से हम कम्पोजिंग के लिए दिया जाने वाला मैटर लेकर रविन्दर पाल सिंह की प्रेस पहुँचे। जैसे तैसे उसे मनाकर मैटर उसे दिया। 

उसके बाद रोज चक्कर लगाकर मैंने हफ्ते भर में मैगज़ीन का सारा काम अपनी तरफ से ओके कर दिया। 
इस बीच के हफ्ते में पत्रिका की कलकत्ते, बम्बई, इन्दौर की मोटी पेमेन्ट आ जाने से खेल खिलाड़ी का काम कम्पलीट करवाने में बहुत दिक्कत नहीं आई। 

हफ्ते बाद मैंने सरदार मनोहर सिंह से इज़ाज़त ले, फिर से सुबह-सुबह मेरठ की बस पकड़ी। 

मेरठ में मैं आम तौर पर सबसे पहले जहाँ मेरठ के लिए बस रोकी जाती है, उसी चुंगी नाके पर उतरा करता था। वहाँ से ईश्वरपुरी का रास्ता पैदल जाने पर भी दस पन्द्रह मिनट का था, लेकिन जब से तुलसी पाकेट बुक्स का आफिस ईश्वरपुरी से डी.एन. कालेज के सामने आया था, मैं डी.एन. कालेज के सामने ही उतरने लगा था। 
उस दिन भी डी.एन. कालेज के सामने ही उतरा। 

तुलसी पाकेट बुक्स के ऑफिस पहुँचा तो वहाँ सिर्फ सुरेश चन्द्र जैन ही उपस्थित थे। उनके साथ गपशप करके, चाय-वाय पीकर जब मैं निकला तो दिमाग तीन तरफा हो रहा था। 

एक ईश्वरपुरी जाकर गंगा पाकेट बुक्स में सुशील जैन से मिलूँ। 

दूसरा - देवीनगर जाकर अपनी बड़ी बहन से भी मिल लूँ और लक्ष्मी पाकेट बुक्स में सतीश जैन से भी मिल लूँ। 

तीसरा शास्त्री नगर पहुँच वेद भाई से मुलाकात करूँ । आखिर दिल में आया शास्त्रीनगर ही चला जाए और मैंने शास्त्रीनगर का रिक्शा पकड़ा, जब मैं जब मैं शास्त्रीनगर पहुँचा, बारह बजने में भी कुछ समय था । 

वेद भाई उस समय ऑफिस में ही थे । टेबल के इस ओर आगंतुकों के लिए बिछी कई कुर्सियों में से सिर्फ एक कोने की कुर्सी ही इज़्ज़त अफ़ज़ाई का शुक्रिया अदा कर रही थी, क्योंकि उस पर धुरंधर लेखक व साहित्यकार अनगिनत लेखकों के गुरू जनाब आबिद रिज़वी विराजमान थे । 

मैंने वेद भाई को 'विश' किया इनसे हाथ मिलाया। फिर रिज़वी साहब के चरणस्पर्श करने के लिए झुका ही था कि रिज़वी साहब ने उठकर मुझे गले लगा लिया । 

"कब आये दिल्ली से....?" आबिद रिज़वी साहब ने पूछा तो मैंने बताया -

"लगभग डेढ़ घंटा हुआ होगा ?"

"और कहाँ - कहाँ हो आये ...?"

"बस, तुलसी में गया था और तुलसी में आया हूँ ।" मैंने कहा ।

"सुरेश जी ने कोई काम दिया क्या ?" इस बार वेद भाई ने पूछा ।

"काम की तो कोई बात ही नहीं हुई ।" मैंने कहा।

"तो वहाँ क्या अपनी शक्ल दिखाने गया था ?" वेद भाई ने तंज़ कसा।

"नहीं यार, पहले तुम भी वहीं होते थे, इसलिए आदत पड़ गयी । इसलिए डी एन कॉलेज ही उतर गया था । और जब उतर ही गया था तो चाय-वाय तो पीनी ही थी ।" मैंने हँसते हुए कहा ।

"मतलब अब तू चाय और वाय दोनों में से कुछ भी तो पीवैगा नहीं ।" वेद भाई ने इतना ही कहा था कि रिज़वी साहब उठ खड़े हुए और वेद भाई से बोले -"अच्छा, आपलोग नोंक-झोंक करते रहिये। हम चलते हैं।"

आबिद रिज़वी साहब वहाँ जिस काम से मौजूद थे, वह शायद मेरे वहाँ पहुँचने से पहले ही निपट गया था । रिज़वी साहब के जाने के बाद वेद ने विल्स नेवी कट का पैकेट निकाला, एक सिगरेट निकाल कर सुलगाई और पैकेट मेरी तरफ उछाल दिया -"ले, तू भी अपना दिल जला ।"

मैंने मुस्कुराकर एक सिगरेट निकाली और माचिस के लिए हाथ बढ़ाया। वेद भाई ने माचिस भी मेरी तरफ उछाल दी । मैंने सिगरेट मुँह में लगाकर माचिस उठाई और तीली जला, एक लम्बा कश खींचते हुए सिगरेट सुलगाई ।
दोस्तों, मैं बचपन से दमे का मरीज़ हूँ और सिगरेट, शराब मेरे जैसों के लिए लगभग ज़हर जैसी कहलाती हैं । फिर भी कुमारप्रिय की दोस्ती में मैंने सिगरेट की ऐसी बुरी लत पाली कि चेनस्मोकर हो गया था ।  

लम्बे बालों, लम्बी दाढ़ी और लम्बे कद के काले भुजंग आर्टिस्ट टी एन रॉय यानि त्रिभुवन नारायण रॉय के मज़ाक में पियक्कड़ हो गया, लेकिन अपनी बुरी आदतों का दोष मैं किसी और को नहीं दे सकता, क्योंकि मेरे मन के किसी कोने में फँसी एक फाँस ने मुझे ने ही मुझे बहुत सारी बुरी आदतों का शिकार बनाया । पर वह किस्सा फिर कभी.....बस, आप याद दिलाते रहिएगा कि कौन-कौन से किस्से मैंने अधूरे छोड़ रखे हैं । उन्हें अलग से एक हैडिंग देकर पेश करूँगा।

ख़ास बात यह है कि बुरी आदतों के इस बुरे आदमी को थोड़ा बहुत बदला भी तो उसी लंगोटिया दोस्त ने, जो बचपन से साथ था । दमे के एक जबरदस्त अटैक की वजह से एक बार ऐसा बीमार पड़ा कि सिगरेट-शराब सब छूट गयीं । फिर उसके बाद ठीक होने पर, सिर्फ कुछ ही दोस्त ऐसे रह गए थे, जिनके साथ कभी-कभी मैं सुट्टा मार ही लिया करता था । वो गिनती के ही थे । एस सी बेदी, यशपाल वालिया और वेद प्रकाश शर्मा । राजभारती साहब के साथ मेरा समय अधिक बीतता था, पर उनके साथ सुट्टेबाजी इतनी ही होती थी कि उन्हीं के सिगरेट में से एक-दो कश मार लिए ।

उस दिन हम दोनों कुछ देर कश मारते रहे। कश मारते-मारते वेद भाई अचानक उठे और बोले -"योगेश, तू बैठ...मैं अभी आया ।"

ऑफिस में मैं अकेला बैठा रह गया । वेद के जाने के बाद कश मारने का भी मूड नहीं हुआ, फिर भी धीरे-धीरे कश मारता रहा ।

वेद को गए पाँच-छह मिनट हो गए तो मुझे बोरियत होने लगी । सोचने लगा - "कहाँ चला गया मेरा यार...?"

(शेष फिर)

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शनिवार, 24 जुलाई 2021

कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा जी के साथ की - 9

जुलाई 24, 2021 0

"मेरा स्टैण्ड अब भी वही है, जो पहले था।" वेद भाई ने कहा - "मैं अब भी ट्रेडमार्क के सख्त खिलाफ हूँ, मगर ऐसा कोई लेखक नज़र तो आवै, जिसे पढ़ते ही लगे कि बस, इसे चांस मिलना जरूरी है। यह जरूर तहलका मचायेगा।"


"यार, किसी को चांस मिलेगा, तभी न वह तहलका मचायेगा।" मैंने कहा। 


"तो ठीक है, मैं तुझे दे रहा हूँ चांस। बोल - लिखेगा?"


"मेरी बात और है।" मैंने कहा - "मैं बहुत ज्यादा सेक्रीफाइस करने की स्थिति में नहीं हूँ।"


"सेक्रीफाइस किस बात का... कौन सेक्रीफाइस करने के लिए कह रहा है?" वेद ने कहा - "तू बता, क्या लेगा - एक उपन्यास के?"


"कम से कम एक हज़ार तो मिलना ही चाहिए...।" मैंने झिझकते-झिझकते कहा। 


"मैं दो हज़ार दूंगा...। बोल, कब दे रहा है उपन्यास...?"


मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम। वेद से ऐसी किसी बात की मैंने कल्पना तक नहीं की थी। 


"चुप क्यों है...। बता कब दे रहा है उपन्यास...। मुझे हर महीने एक चाहिए...। और तेरी पहली किताब तब छापूँगा, जब तेरे तीन उपन्यास मेरे पास हो जायेंगे।"


"फिर तो अभी काफी लम्बा इन्तजार करना पड़ेगा।" मैं गम्भीर होकर बोला-"आज तो मैं दिल्ली जाने की सोच रहा हूँ। खेल-खिलाड़ी का काम लटका होगा, जाते ही कम्पलीट करना होगा और कुछ और प्रकाशक भी अपनी पत्रिकाओं का काम मुझसे ही करवाते हैं।"


"ठीक है। यह फैसला तो तूने करना है कि कब किसका क्या काम करना है। पर याद रहे, मैं तुझे चांस दे रहा हूँ, पर यह चांस हरएक को नहीं दे सकता।"


"क्यों भला...?" मैंने पूछा। 


"देख योगेश, लिखने वाले बहुत हैं, पर लिख क्या रहे हैं, यह जानने से पहले यह समझ कि लिख कैसे रहे हैं।"


"कैसे लिख रहे हैं..?" मैंने पूछा।


"तुझे पता नहीं...?" वेद भाई ने सिर को दायें-बायें जुम्बिश देते हुए पूछा। 


"नहीं यार....। कौन क्या लिख रहा है..? कैसे लिख रहा है? यह या तो पब्लिशर्स जान सकते हैं या यहाँ के लोकल लोग...। मैं तो परदेसी हूँ...। आज यहाँ, कल दिल्ली...।"


"बेटा, तू सबसे ज्यादा शातिर है। तुझे सब पता है। पर तू मेरे मुँह से ही सुनना चाहता है तो सुन...। मेरठ में आधे से ज्यादा लेखक ऐसे हैं, जो बिमल चटर्जी, परशुराम शर्मा और विक्रांत सीरीज़ के उपन्यास सामने रखकर लिख रहे हैं। इधर का सीन उधर, उधर का सीन इधर कर रहे हैं। जो थोड़े बहुत यह नहीं कर रहे, अंग्रेजी से खुलकर टीप रहे हैं। जरा सोच, इनका टीपा-टीपी की वजह से पब्लिशर पर कोई मुकदमा हो गया तो कहाँ मरेगा पब्लिशर...? और मुझ पर ऐसी स्थिति आ गई तो मैं अपना नावल लिखूँगा या मुकदमा लड़ता फिरूँगा। न, मैं तो ऐसे नकलची लेखकों पर कतई भरोसा नहीं कर सकता, हाँ, कोई ऐसा आये कि लगे, जो लिखा है, मौलिक है तो उसकी वेद प्रकाश शर्मा से ज्यादा पब्लिसिटी करके छापूँगा। इन कहीं का ईंट - कहीं का रोड़ा जोड़ने वालों का तो मैं बिल्कुल भरोसा नहीं कर सकता। ना ही इन्हें नाम से छाप सकूँ हूँ।"


"चलो, मुझ पर तो भरोसा है ना?" मैंने मन ही मन खुश होते हुए कहा, लेकिन जवाब में वेद भाई ने जो कहा, मेरे पुर्जे-पुर्जे हिल गये। 


"ना, बिल्कुल नहीं...।" वेद भाई ने कहा - "तुझ पर तो रत्ती भर भी विश्वास नहीं, जो विश्वास होता तो मैं भी कहता, योगेश, लिखना शुरू कर, दो-दो पेज लिखकर, दिये जा...। प्रेस में रोज मैटर पहुँचता रहना चाहिए।"


"क्या मतलब...?" मैं चौंका। 


"बेटा, यह मेरठ है, यहाँ कब क्या होता है - वेद प्रकाश शर्मा को सब पता होता है। तूने कब-कब क्या-क्या किसके लिए किया, सब मालूम है मुझे। यहाँ कोई पत्ता भी हिलता है तो वेद के कान में खुद बता देता है कि वेद भाई, मैं हिल रहा हूँ और तूने तो हद ही कर दी। किस-किस के नॉवेल  लिखे और कितने लिखे?"


"यार, मजबूरी थी।" मैंने कहा। 


"काहे की मजबूरी। भले आदमी, दो-दो पेज करके कहीं नावल लिखे जावैं हैं। तुझे मना करना नहीं आता। पब्लिशर ने डण्डा दे दिया तो उसका गुलाम हो गया तू?" वेद मुझे बड़े भाई की तरह डपट रहा था, हालाँकि उम्र में वह मुझसे दो महीने छोटा था। 


"चल, इस बात को छोड़कर तो मुझ पर भरोसा है ना...?" मैने कहा। 


"पागल हुआ है। मुझे पागल कुत्ता काट ले तो भी तुझ पर भरोसा न करूँ। इसीलिए तो तुझ पर शर्त लादी है कि जब तेरे तीन उपन्यास मेरे पास हो जायेंगे, तब तेरा पहला उपन्यास छापूँगा।"


मैंने गहरी साँस ली। 


मेरी ईमानदारी और सच्चाई पर हर पब्लिशर भरोसा करता था, यह मैं खुद कई बार विभिन्न प्रकाशकों के मुँह  से सुन चुका था, लेकिन वेद भाई ने मेरा सारा भरम तोड़ दिया था और वही बात कह दी थी, जो सबसे पहले रायल पाकेट बुक्स के स्वामी चन्द्रकिरण जैन के पिताश्री ने कही थी कि बेटा मना करना भी सीख, जोकि तब तक तो क्या, शायद मैं अब तक नहीं सीख पाया। 


बातें करते करते रिक्शा शास्त्रीनगर पहुँच गया। उस दिन मुझे लग रहा था कि शायद वेद को मुझसे कोई खास बात करनी थी, लेकिन बातचीत का रुख मैंने गलत तरफ मोड़ दिया, जिससे हमारे बीच असली बात नहीं हो पाई। 


बाद में भी वेद से ढेरों बातें हुईं, लेकिन उनमें ज्यादातर तब के लेखन और लेखकों पर ही थीं। कौन-कौन क्या-क्या लिख रहा है और उस में कितना दम है। बस, हम इसी बात पर चर्चा करते रहे। मज़े की बात है, हम जिन उपन्यासकारों को औसत और नकलची मानते रहे, बाद में कई प्रकाशकों ने उन्हें नाम से भी छापा और वे अपना अलग से पाठक वर्ग बनाने में भी सफल हुए, लेकिन बिमल चटर्जी, परशुराम शर्मा, कुमार कश्यप अथवा वेद प्रकाश शर्मा जैसा तहलका, उनमें से कोई भी नहीं मचा सका और वेद भाई का तो साफ कहना था कि कोई आये कुछ अलग हटकर मौलिक लेखन के साथ तो उसे न केवल, मैं नाम से छापूँगा, बल्कि वेद प्रकाश शर्मा से ज्यादा उसकी पब्लिसिटी करूँगा। 


शास्त्रीनगर में पहले चाय का दौर चला, फिर दोपहर का लंच भी मैंने और वेद भाई ने साथ साथ ही किया। उसके बाद मैं रुखसत हुआ तो रुख देवीनगर का था। सोचा, जीजी के यहाँ भी एक चक्कर लगा लूँ और लक्ष्मी पाकेट बुक्स में सतीश जैन उर्फ मामा जी की जेब भी ढीली करवा लूँ। 


पहले मैं लक्ष्मी पाकेट बुक्स पहुँचा।


सतीश जैन आफिस में ही थे। मुझे देखते ही बोले - "यार, बड़ी उम्र है, मैं तुम्हें ही याद कर रहा था।"


"नोटों की गड्डी तैयार है ना...।" मैंने कहा - "फटाफट निकालो और रुख़सत करो मुझे....। मुझे आज ही आज में दिल्ली पहुँचना है। मेरा खेल-खिलाड़ी का सारा काम लटका हुआ होगा।"


"अरे छोड़ो यार, तुम दिल्ली नहीं जाओगे तो क्या खेल खिलाड़ी नहीं छपेगी।" सतीश जैन ने कहा। 


"छपेगी तो जरूर, पर मेरी वजह से कुछ दिनों की देरी अवश्य हो जायेगी और यही मैं नहीं चाहता कि सरदार मनोहर सिंह को मेरी वजह से कोई परेशानी हो और वह भारती साहब से शिकायत करें।"


"अच्छा ठीक है। एक छोटा सा काम और कर दो, फिर दिल्ली चले जाना।" कहते हुए सतीश जैन ने एक छपा हुआ टाइटिल मेरे सामने रख दिया। और बोले - "एक यह नावल और लिख दो यार। यह बहुत जरूरी है... इसके बिना तो मेरा सैट जा ही नहीं सकता। सबसे इम्पोर्टेन्ट नावल है यह।"


मैंने टाइटिल देखा। 


टाइटिल पर लेखक का नाम था - 'व्ही. व्हानवी'.....। जी हाँ, हिन्दी में नाम बिल्कुल इसी ढंग से लिखा हुआ था, जैसे मैंने आपके सामने लिखा है। उन दिनों लेखक का नाम व्ही. व्हानवी रखकर लक्ष्मी पाकेट बुक्स से उपन्यास निकालने जंगबहादुर जी ने ही आरम्भ किये थे, किन्तु बाद में जाने क्यों अपनी पूरी फर्म लक्ष्मी पाकेट बुक्स ही उन्होंने सतीश जैन उर्फ मामा को सौंप दी थी। शायद वह किसी और मोटे धंधे में चले गये थे और एकमुश्त रकम लेकर उन्होंने लक्ष्मी पाकेट बुक्स का सर्वेसर्वा सतीश जैन को बना दिया था। 


व्ही. व्हानवी में सैक्स बेस्ड सामाजिक उपन्यास प्रकाशित किये जाते थे। बिल्कुल वैसे ही जैसे कभी "मस्तराम" के उपन्यास होते थे। 


दोस्तों, मैं उस समय एक ऐसा शख्स था, जिसके हाथ जब जो लग जाता था,  पढ़ डालता था। अच्छा-बुरा सोचने में वक़्त बरबाद नहीं करता था। अत: "मस्तराम" के भी बहुत उपन्यास मैंने पढ़े थे और आपको खास बात बताऊँ - उन दिनों मस्तराम के जो उपन्यास अश्लील कहे जाते थे और चोरी छिपे बेचे जाते थे, ब्लैक में भी बेचे जाते थे, आज अगर आपके सामने पड़ जायें तो आप कहेंगे कि क्या बकवास है। इससे ज्यादा अश्लीलता तो आज साहित्यिक उपन्यासों में भी मिल जाती है और यूट्यूब पर तो भरमार है। हाँ, मस्तराम के उपन्यास अधिकांशतः सामाजिक मर्यादा छिन्न-भिन्न करते अवैध रिश्तों के हुआ करते थे। जैसे देवर-भाभी का प्रेम, जीजा-साली का प्रेम, मामी-भांजे का, चाची और भतीजे का.....मतलब... हिन्दू समाज में जो रिश्ते पवित्र मर्यादा की माँग करते हैं, मस्तराम के उपन्यासों में उन्हीं की रासलीला दिखाई जाती थी। 


उन दिनों यह सब बहुत अटपटा लगता था, पर अगर आप अखबारों की सुर्खियाँ बरसों से पढ़ते आ रहे हैं तो आपने पाया होगा कि आज के समाज में यह पाप बहुतायत में है और न केवल गरीबों में, पैसे वालों में भी और कवियों, लेखकों, चित्रकारों, अभिनेताओं में भी ऐसे बहुत से जीव जगह जगह पनप रहे हैं। बहुत सारी सत्य कथाओं की पत्रिकाओं में भी आप ऐसे बहुत से किस्से पढ़ चुके होंगे। 


हाँ, तब मस्तराम में ऐसी अश्लीलता परोसने वालों पर पुलिस का छापा पड़ जाता था, लेकिन कोई केस कभी कोर्ट तक पहुँचा हो, मुझे याद नहीं। याद हैं तो यह कि तब लेखक और प्रकाशक की ही नहीं, मुद्रक की भी शामत आ जाती थी। 


मुद्रक यानि वह प्रेस - जिसमें मस्तराम की किताब छपी होती थी, इसलिए बाद में चालाक प्रकाशक किताब में लेखक, प्रकाशक और मुद्रक सभी के नाम फर्जी देने लगे थे और किताबें जहाँ भी भेजी जातीं, By post यानि डाक द्वारा नहीं भेजी जाती थीं । प्रकाशक रेलवे से माल भिन्न भिन्न रेलवे स्टेशन पर भेज देते, फिर बिल्टी लेकर खुद ही हर स्टेशन पर पहुँचते और नोट लेकर बिल्टी थमा देते थे। 


मस्तराम की किताबों का हर शहर का होलसेलर फटाफट किताबों को पटरियों पर दुकान लगाने वालों के हवाले करता और नियमित ग्राहक अक्सर ब्लैक में भी मस्तराम की किताबें खरीदा करते थे। मतलब यह कि नम्बर दो की इन किताबों का सारा धन्धा कैश हुआ करता था, जबकि नामी-गरामी लेखकों को छापने वाले प्रकाशकों का माल, दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता, इन्दौर, लखनऊ, इलाहाबाद, पटना आदि सभी बड़े शहरों में उधार पर जाता था। बुकसेलर किताबें बेचने के दो दो महीने बाद पेमेन्ट भेजा करते थे। 


बहुत बाद में इस स्थिति को सुधारने में सबसे ज्यादा दिलेरी मनोज पाकेट बुक्स और राज पाकेट बुक्स ने दिखाई। वे पुस्तक विक्रेताओं से एडवांस तक लेने लगे थे। पर यह किस्सा फिर कभी... 


अभी हम बात कर रहे थे - लक्ष्मी पाकेट बुक्स के उपन्यासकार वी. व्हानवी की, जिसमें छपने वाली कहानियाँ मस्तराम में छपने वाली कहानियों जैसी ही होती थीं। 


सतीश जैन ने मेरे सामने जो टाइटिल रखा था। उसमें उपन्यास का नाम था - भांग की पकौड़ी। 


क्या नाम था - भांग की पकौड़ी। 


उम्रदराज पुराने पाठकों, कुछ याद आया आपको। नहीं याद आया तो मैं याद करा देता हूँ... 


भांग की पकौड़ी....। जी हाँ, भांग की पकौड़ी....। 


मुझे यकीन है - इस नाम से पुराने जमाने के शौकीन मिज़ाज़ों को जरूर कुछ याद आ रहा होगा, जिन्हें याद नहीं आ रहा हो, उन्हें याद दिला दूँ, किसी ज़माने में मस्तराम के नाम से किसी पब्लिशर नेे एक उपन्यास बुक्स मार्केट में फेंका था - भांग की पकौड़ी...। 


उपन्यास इतना प्रसिद्ध और चर्चित हुआ कि जवान और बुड्ढे ठरकी दीवानों ने दो रुपये का वह उपन्यास, पचास-पचास रुपये में खरीदा। 


यह मैं नहीं कह रहा हूँ, लोहे के पुराने जमुना पुल के बाद, गाँधीनगर से पहले पड़ने वाले कैलाशनगर के अन्दरूनी क्षेत्र में पटरी लगाने वाले 'तिवारी जी' नाम से मशहूर बुकसेलर का कहना था। वह कहते थे कि ज़िन्दगी में माल कमाया तो एक ही बार, वो भी मस्तराम की भांग की पकौड़ी से। होलसेल में डेढ़ रुपये का खरीद कर लाते थे। बोरे में छिपाकर रखते थे। कोई माँगता था तो चुपके से, छुपा के, निकाल कर पचास रुपये में देते थे। 


सतीश जैन ने लक्ष्मी पाकेट बुक्स के अपने नये सैट में जिन किताबों के नाम दिये थे, उनमें व्ही. व्हानवी के उपन्यास का नाम 'भांग की पकौड़ी' जानबूझकर मस्तराम के फेमस उपन्यास भांग की पकौड़ी की लोकप्रियता कि लाभ उठाने के लिए रखा था और मुझसे इल्तिज़ा की जा रही थी कि व्ही. व्हानवी का वह उपन्यास मैं लिखूँ।


"नहीं, यह उपन्यास मैं नहीं लिखूँगा...आप मेरा हिसाब कर दो। मुझे दिल्ली जाना है।" मैंने दो टूक स्वर में कहा तो सतीश जैन बोले - "अभी तो यार, पैसे ही नहीं हैं। दो तीन दिन में करता हूँ हिसाब। तब तक यह उपन्यास लिख डालो यार। देखो, तुम्हारे भरोसे, मैंने किसी से बात तक नहीं की है।"


"नम्बर एक - मुझे आज ही दिल्ली जाना है। नम्बर दो - पैसे भी चाहिए। नम्बर तीन - मैं वाहियात सैक्स और अश्लीलता वाले उपन्यास नहीं लिखता।" मैं थोड़ा गुस्से वाला मुँह बनाकर बोला तो सतीश जैन बड़े प्यार से बोले -"तो यार, तुम्हें वाहियात सैक्स लिखने को कौन बोल रहा है। मत लिखो - तुम अश्लील उपन्यास। तुम्हारा दिल चाहे जैसा लिखो, जैसा चंचल और बेगम कानपुरी के लिए लिखा है, वैसा लिख दो। तुम्हारे ऊपर हमारी कोई बन्दिश नहीं है। हमें पता है - तुम कुछ भी लिखोगे, उसमें कोई अच्छी सी कहानी तो होगी ही।"


"पर अभी मैं मेरठ में नहीं रुक सकता। मुझे दिल्ली जाना ही जाना है।" मैंने कहा। 


"तो यार, हो आओ दिल्ली। खेल खिलाड़ी का काम निपटा आओ। दिल्ली में जब टाइम मिले - उपन्यास स्टार्ट कर देना। बाद में यहाँ आकर कम्पलीट कर देना। तब तक पैसों का भी जुगाड़ हो जायेगा। अभी तुम यह दो सौ रुपये रख लो। बाकी हिसाब फिर कर लेंगे।"


मैंने एक गहरी साँस ली। 


वक़्त बरबाद करने का कोई फायदा नहीं था। लक्ष्मी पाकेट बुक्स से उठकर मैं कुछ देर के लिए पास ही की गली में स्थित अपनी बहन प्रतिमा जैन के यहाँ गया। अपने भांजों अनुराग और रोहित तथा भांजी सोनिया के साथ दस-पन्द्रह मिनट बिताये। जीजी के यहाँ चाय पी और उन्हें बता दिया कि आज दिल्ली जा रहा हूँ। 


"फिर कब आऊँगा...?" के जवाब में मैंने कोई निश्चित उत्तर नहीं दिया। बस, यह कहा कि जल्दी ही आऊँगा, अभी यहाँ से पूरी पेमेन्ट भी नहीं मिली है।"


फिर जीजी के यहाँ से निकल, मैंने ईश्वरपुरी का रिक्शा किया और कुछ समय पश्चात् गंगा पाकेट बुक्स के ऑफिस में था। सुशील जैन मुझे देखते ही खिल गये और मुस्कुराते हुए बोले - "लगता है, मेरठ में तेरे चाहने वाले बहुत हो गये हैं। आज सुबह से इन्तजार कर रहा हूँ। अब आया है।"


"जानबूझकर देर से आया हूँ। सुबह सुबह आता तो आप कोई बहाना भी बना देते, पर अब तो खूब मनीआर्डर-सनीआर्डर इकट्ठे कर के बैठे हो, गरीब लेखक को नोट-सोट दो, मुझे जल्दी से जल्दी दिल्ली जाना है।"


"नोट तो तू बेशक ले ले...। पर दिल्ली जाने की बात मत कर...। तेरे से एक और किताब लिखवानी है।"


"अभी तो यह सम्भव नहीं है। जमीन उलटे- आसमान पलटे, मेरा दिल्ली जाना नहीं रुक सकता।" मैंने चेहरा काफी हद तक गम्भीर बना कर कहा। 


"ठीक है, पर जाने से पहले तुझे एक प्रामिस करना होगा कि लौटते ही हमारी एक किताब पूरी और करेगा।" सुशील जैन बोले। 

"ठीक है, कर दूँगा...।" मैंने कहा। 


"ऐसे नहीं, हाथ मिलाकर, जेन्टलमैन प्रामिस कर...।" 


मैंने सुशील जैन से हाथ मिलाकर प्रामिस किया। सुशील जैन ने मुझे "अधजली लाश" की पेमेन्ट दे दी। 


मैं उठने लगा तो वह बोले - "जरा रुक...।"


"क्या हुआ...?" मैंने पूछा। 

"रास्ते में पढ़ने के लिए और दिल्ली में लोगों को पढ़वाने के लिए किताबें तो लेता जा।"


मैं रुक गया। 


सुशील जैन ने मेरे लिए दस-बारह किताबों का एक बण्डल बनवा दिया। बण्डल लेकर मैं चलने लगा तो वह बोले -"अरे रुक...।"


"अब क्या है..?"


सुशील जैन ने मुझे दो किताबें दीं, जो किसी और प्रकाशन की थीं और बोले - "ये किताबें तू रास्ते में पढ़ता हुआ जाइयो और लौटकर मुझे इनके बारे में सही-सही रिपोर्ट देइयो।"


मैंने उन दोनों किताबों को देखा। उनके नाम पढ़े। उनमें से एक थी- 


"जीजा-साली के प्रेम पत्र"


और दूसरी किताब थी -


"देवर भाभी के प्रेम पत्र"


यह किताबें सुशील जैन ने बण्डल में इसीलिए नहीं बंधवाई थीं, ताकि रास्ते में मैं उन्हें पढ़ता हुआ जाऊँ। 


पर क्यों....? 


उस समय मैंने यह बिल्कुल भी नहीं सोचा था। 


अपने कमरे पर जाकर मैंने अपना थैला उठाया। उसमें किताबें और किताबों का बण्डल डाला और चन्द्रकिरण जैन के पिताजी को बताया कि मैं दिल्ली जा रहा हूँ। वहाँ खेल खिलाड़ी पत्रिका का काम निपटाकर आऊँगा। 


उसके बाद मैंने रोडवेज बस अड्डे के लिए रिक्शा पकड़ लिया। 


(शेष फिर) 


‼️योगेश मित्तल‼️


दोस्तों, आपके दिमाग में बहुत से सवाल उमड़ेंगे, पर सवाल मत पूछियेगा, क्योंकि आपके हर सवाल का जवाब आने वाली किश्तों में अवश्य मिलेगा। 


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गुरुवार, 22 जुलाई 2021

कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा जी के साथ की - 8

जुलाई 22, 2021 0

 


रायल पाकेट बुक्स की बाहरी बैठक को अपना ठिकाना बनाने के बाद मुझे सबसे पहले उन्हीं का काम पूरा करना चाहिए था, पर उन्होंने काम पूरा करने के लिए एक हफ्ते का वक़्त दिया था, इसलिये मैं निश्चिन्त तो था, पर दिमाग में यही था कि सबसे पहले अपने लैण्डलार्ड का काम ही पूरा किया जाये, लेकिन सुबह दस बजे के करीब गंगा पाकेट बुक्स के स्वामी सुशील जैन मेरे कमरे पर आ पहुँचे। 


मैंने रायल पाकेट बुक्स की उन किताबों में से एक किताब सामने रखी हुई थी और उसे पढ़ रहा था, कहानी बढ़ाने का काम बिना पढ़े तो हो ही नहीं सकता था। हालाँकि मुझे दो बार ऐसा दुर्लभ कार्य भी करना पड़ा था, जब विमल पाकेट बुक्स, में प्रकाशित होने वाले उपन्यास "कलंकिनी" के अन्तिम सोलह पेज कहानी पढ़े बिना ही लिखने पड़े थे और एक बार हरीश पाकेट बुक्स (राज पाकेट बुक्स की एक अन्य संस्था) में प्रकाशित हो रहे एस. सी. बेदी के एक उपन्यास का अन्त उपन्यास पढ़े बिना लिखना पड़ा था। पर वो किस्सा फिर कभी...। 


मेरठ के प्रकाशकों में तो लक्ष्मी पाकेट बुक्स के स्वामी सतीश जैन उर्फ मामा ने मैटर बढ़ाने-घटाने में मुझे बेस्ट होने तक का तमगा दे दिया था और उन्हीं की यह कारस्तानी या करिश्मा था कि ईश्वरपुरी के प्रकाशकों में भी मेरी चर्चा फैल गई थी। 


फिर मेरे बारे में एक यह बात भी सतीश जैन ने फैला दी थी कि योगेश मित्तल से तो जो चाहे काम करवा लो, न पैसे के लिए हुज्जत करता है, ना ही मना करता है और यह मशहूरी गंगा पाकेट बुक्स के स्वामी सुशील जैन तक भी पहुँच चुकी थी। 


रायल पाकेट बुक्स का किरायेदार होने के सबसे पहले ही दिन सुबह सुबह सुशील जैन मेरे कमरे पर आ पहुँचे, तब तक मैंने किसी भी प्रकाशक को अपने वहाँ रहने के बारे में बताया तक नहीं था, इसलिये सुशील जैन को देख, एकदम हक्का-बक्का हो उठा। 


"आप यहाँ कैसे....? यहाँ के बारे में तो मैंने अभी किसी से कोई चर्चा भी नहीं की।" मैंने अचरज से कहा तो बड़ी मीठी मुस्कान छिड़कते हुए सुशील जैन बोले - "दिल्ली का कोई लेखक मेरठ में हो और हमें पता न चले, यह तो हो ही नहीं सकता। हमारे जासूस कदम-कदम पर फैले हुए हैं। फिर यह तो ईश्वरपुरी से ईश्वरपुरी का मामला है। हमारी नाक के नीचे रहकर भी तू हमारी नज़रों से छिप जायेगा, ऐसा तो तुझे सोचना भी नहीं चाहिए।" 


अपनी बात कहते-कहते सुशील जैन मेरे पलंग पर मेरे करीब बैठ गये। 


मैंने रायल पाकेट बुक्स की किताब साइड में रख दी और बोला -"खैर, गरीब की कुटिया में कैसे पदार्पण किया?"


"गरीब की कुटिया, कैसी गरीब की कुटिया, यह तो हमारे बड़े भाई का घर है। तू यहाँ नहीं था, तब भी हमारा आना-जाना था।" सुशील जैन बोले। फिर मेरी बाजू थाम बोले - "आ जा, तुझे चाय पिलाता हूँ। तेरे बस की तो कुछ है नहीं कि पानी को भी पूछ ले।"


और यह सुशील जैन ने सही कहा था। उस समय मेरे पास पानी पीने के लिए एक गिलास तक नहीं था। 


मैं उठकर सुशील जैन के साथ बाहर आ गया। कमरे में ताला लगाने जैसी कोई जरूरत नहीं थी। घर का बाहरी कमरा होने के बावजूद उन दिनों ईश्वरपुरी में सब सुरक्षित था, फिर मेरे कमरे में ऐसा कुछ नहीं था कि कोई कुछ चुरा ले। 


सुशील जैन मुझे मुश्किल से सौ कदम की दूरी पर स्थित गंगा पाकेट बुक्स के आफिस में ले गये और बोले - "तूने तो अभी नाश्ता भी नहीं किया होगा?" फिर मेरे जवाब से पहले ही अपने एक वर्कर को आदेश दिया -"जा फटाफट राजू की दुकान से एक प्लेट बेड़मी ले आ।"


आफिस में सुशील जी के बड़े सुपुत्र दीपक जैन भी मौजूद थे। सुशील जी ने उन्हें इशारा किया - घर में ही चाय बनवाने के लिए।


दीपक जैन आफिस के बैक डोर से पीछे गये। चाय के लिए उन्होंने घर पर ही कह दिया और पुनः आफिस आ गये। 


मेरठ में सुबह के समय उन दिनों हर हलवाई के यहाँ जलेबी और आलू की सब्जी तथा पूरी बनती थी। वो खास किस्म की पूरी ही बेड़मी कहलाती थी। शायद आज भी मेरठ में ऐसा ही खान-पान हो। 


बाज़ार से बेड़मी आ गई। घर से चाय भी आ गई। नाश्ता आरम्भ करने से पहले मैंने पूछा - "क्या बात है...कोई खास काम है क्या?"


"खास काम होगा तो नाश्ता नहीं करेगा...?" सुशील जैन बोले। चुटीले अन्दाज़ में और बेहद नर्म मिज़ाज में चुभती हुई बातें कहने में सुशील जैन, अपने सभी जैन भाइयों से मीलों आगे थे। 


नाश्ते पर हाथ साफ करते हुए मैं बोला-"मैं तो टाइम बचाने के लिए पूछ रहा था। पेट पूजा करते-करते काम की भी बात हो जाती तो अच्छा था।"


"नहीं, पहले पेट पूजा, फिर काम दूजा।" सुशील जैन बोले। 


नाश्ता सिर्फ मेरे लिए मँगाया गया था, इसलिए मैं ही कर रहा था। औपचारिकता के लिए मैं कुछ पूछता, उससे पहले ही सुशील जैन ने कह दिया-"यह तेरे लिए है। चाय जरूर साथ में पियेंगे।"


और चाय हम दोनों ने साथ-साथ पी। 


चाय का दौर खत्म होने पर सुशील जैन बोले - "अब काम की बात हो जाये।"


"बिल्कुल।" मैंने कहा -"बकरा हलाल होने के लिए तैयार है।"


"ऐसी बात मत कर यार...। तू क्या समझता है, वैसे ही तू आयेगा तो हम तुझे कुछ नहीं खिलायेंगे।" सुशील जैन कृत्रिम नाराजगी दिखाते हुए बोले तो मैं भी हँस दिया-"मज़ाक कर रहा हूँ।"


कुछ देर खामोशी रही। न वह कुछ बोले। ना ही मैं कुछ बोला। फिर उन्होंने ही मौन भंग किया, बोले - "यार, तेरे से दो काम हैं।"


*क्या...?"


"पहले एक काम कर, हमारे पास दो टाइटिल छपे पड़े हैं। उसमें जिससे किताब लिखवानी थी, पट्ठे का पता ही नहीं है। चिठ्ठी डाल-डाल कर थक गये।" 


"फिर...?" मैंने पूछा। 


"फिर क्या...? सैट तो टाइम से निकालना है।" कहते हुए सुशील जैन ने एक टाइटिल निकाल कर मेरे सामने रख दिया। 


वह टाइटिल उपन्यासकार "कैप्टेन दिलीप" के उपन्यास "अधजली लाश" का था। 

"यह टाइटिल है - अधजली लाश। तू इस पर फटाफट एक नावल लिख दे और हो सके तो पार्ट का लिख, सेकेण्ड पार्ट में स्टोरी कम्पलीट कर देइयो।" सुशील जी ने कहा। 


"और दूसरा काम....?" मैंने पूछा। 


"दूसरा काम बाद में...। पहले यह निपटा दे।"


"बता तो दो...।" मैंने कहा। 


"नहीं, अभी नहीं। पहले यह काम कर।"


मैं कुछ और जोर देता, तभी गंगा पाकेट बुक्स के आफिस में एक लम्बा सा नौजवान प्रविष्ट हुआ और मुझे देखते ही बोला - "हद हो गई योगेश जी। आप यहाँ हो और मैं आपको कहाँ-कहाँ ढूँढ कर आ रहा हूँ।"


"कहाँ-कहाँ ढूँढ कर आ रहे हो?" मैंने पूछा। 


वह विपिन जैन था। 


ज्योति पाकेट बुक्स का स्वामी। उसकी संस्था के लिए मैं बहुत पहले विक्रांत सीरीज़ के कई उपन्यास लिख चुका था। जब उसने बिमल चटर्जी से "चोट सीरीज़" लिखवाई थी। मुझे भी साथ-साथ काम दिया था। 


मैंने पूछा -"कहाँ-कहाँ ढूँढ कर आ रहे हो?" तो उसने तत्काल पूछा - "भाई साहब से बात हो चुकी हो तो दो मिनट मेरे साथ चलोगे?"


'भाई साहब' से उसका मतलब सुशील जैन से था, लेकिन मेरे जवाब देने से पहले ही सुशील जैन बोले - "हाँ, हो गई। ले जा।"


फिर तुरन्त ही मुझसे  बोले -"देख योगेश, मेरा नावल आज ही चालू कर दे और रोज एक फार्म का मैटर देता जा।"


"रोज़ एक फार्म का मुश्किल है।" मैंने कहा तो सुशील जैन बोले -"ठीक है, आधा फार्म सही। आठ पेज रोज तो दे देगा।"


"हाँ, दे दूंगा।" मैंने कहा और विपिन जैन के साथ निकल गया।


विपिन जैन उन दिनों, डिजाइन प्रोसेसिंग और ब्लॉक मेकिंग का काम भी कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने एक मकान का बाहरी कमरा किराये पर ले रखा था, वहीं उन्होंने अपना डार्करूम बना रखा था और वहीं आफिस बना रखा था। 


वहाँ एक बड़ी प्रोसेसिंग टेबल भी थी, जिसके पीछे एक लकड़ी की हत्थीदार कुर्सी थी। प्रोसेसिंग टेबल ही आफिस टेबल का भी काम करती थी। उस पर सबसे ऊपर एक शीशा लगा था, शीशे के नीचे एक ट्यूबलाइट जलती थी। ट्यूबलाइट आन करते ही टेबल पर उजाला फैल जाता था। 


विपिन जैन ने कुर्सी पर बैठते ही टेबल के शीशे के नीचे की ट्यूबलाइट आन कर दी। तब तक आफिस में काम करने वाली लड़की मंजू ने एक फोल्डिंग चेयर खोलकर, मेरे बैठने के लिए बिछा दी। 


मंजू दरअसल मकानमालकिन की ही दो लड़कियों अंजू और मंजू में से एक थी। विपिन जैन ने दोनों लड़कियों को भी प्रोसेसिंग का काम सिखाकर अपनी मदद के लिए रखा हुआ था, जिससे मकानमालकिन के परिवार को किराये के रूप में हासिल होने वाली रकम के अतिरिक्त धनराशि प्राप्त हो जाती थी। 


और उन दिनों तकरीबन मेरठ के सभी प्रकाशकों के यहाँ आगन्तुकों के बैठने के लिए फोल्डिंग चेयर्स ही होती थीं। उनका फायदा यह था कि कोई या कई लोग आये तो बिछा दीं, बाद में उठाकर, किसी कोने में दीवार के साथ, एक के बाद एक करके खड़ी कर दीं। 


मेरे बैठने के बाद विपिन जैन बोले - "योगेश जी, आजकल बाल पाकेट बुक्स की मार्केट कैसी है?"


"चकाचक है...फर्स्टक्लास है ।" मैंने कहा - "मनोज वालों ने पॉकेट बुक्स स्टार्ट ही बाल पॉकेट बुक्स से की थी । हाँ, आरम्भ में टाइटिल कवर पर वे 'प्रेम बाजपेयी' का नाम और अंदर 'संकलन : प्रेम बाजपेयी'  देते थे । अब दोनों जगह सिर्फ 'मनोज' देने लग गए हैं और एस. सी. बेदी की आजकल क्या हवा है, यह तो आप जानते ही हो ।"    


"योगेश जी, हमने भी एस. सी. बेदी को छापने का प्रोग्राम बनाया है।" विपिन जैन ने कहा। 


"छाप ही नहीं सकते।" मैंने कहा। उन दिनों मुझे पब्लिकेशन लाइन की हर बात की, पल-पल की खबर रहती थी। इसका कारण था - मैं जहाँ भी बैठ जाता, लोग मुझसे बातें करने के लिए कोई न कोई बात छेड़ देते थे और किसी पब्लिशर के यहाँ बैठ गया तो वह पहले वह मुझसे मेरे हालचाल पूछता, फिर अपनी ही नहीं, अपने आसपास की खबरें भी मुझे सुना देता। 


"क्यों, छाप क्यों नहीं सकते?" विपिन जैन ने पूछा। 


"बेदी साहब को मैं खुद राज पाकेट बुक्स में ले गया था, वहाँ राज बाबू से उनका हरीश पाकेट बुक्स के लिए एग्रीमेंट हुआ है कि भविष्य में एस. सी. बेदी नाम से उनके राजन-इकबाल सीरीज़ के नये बाल उपन्यास सिर्फ हरीश पाकेट बुक्स से प्रकाशित किये जायेंगे और शायद पुराने उपन्यासों के भी काफी कापीराइट राजकुमार गुप्ता जी ने खरीद लिये हैं।" मैंने विपिन जैन को बताया तो वह बोले - "तो योगेश जी, राजन इकबाल सीरीज़ तो हम छाप ही नहीं रहे हैं। हमारी बेदी साहब से एक नई सीरीज़ - धरम - करम सीरीज़ की बात हुई है।"


"पर बेदी साहब को राज बाबू ने इतना 'बिज़ी' कर दिया है कि उन्हें आपके लिए बाल उपन्यास लिखने की फुरसत ही नहीं मिलेगी।"


"मालूम है योगेश जी, इसीलिए तो बेदी साहब ने हमें फिलहाल चौबीस उपन्यासों के कापीराइट लिखकर दे दिये हैं। हम वो उपन्यास किसी और से लिखवा कर एस. सी. बेदी जी के नाम से छाप सकते हैं।"


"फिर तो आपकी चांदी है। छापे जाओ... बेचे जाओ।" मैंने कहा। 


"तभी तो आपकी मदद की जरूरत है योगेश जी। बेदी साहब ने कहा है कि किसी भी ऐरे गैरे नत्थू खैरे से उपन्यास नहीं लिखवाना है। योगेश मित्तल से बात कर लो। वही मेरे उपन्यास लिखेगा तो छापना, नहीं तो जब भी मुझे फुरसत होगी, तब दूँगा, तभी छापना।" 


"पर मेरे लिए तो यह बहुत मुश्किल है।" मैंने कहा - "हाथ में कई पब्लिशर्स का काम है। टाइम निकालना इम्पासिबिल है।"


"योगेश जी, आपके लिए कुछ भी इम्पासिबिल नहीं है। और मुझे तो आप मना कर ही नहीं सकते। आपके भरोसे ही मैंने बेदी साहब को कापीराइट के लिए बहुत मोटी रकम दी है। शायद आप भूल गये हों तो आपको याद दिला दूँ - मेरठ में पहला 'ब्रेक' मैंने ही आपको दिया था। आपको एडवांस भी दिया था, जबकि मैं आपको मैं जानता भी नहीं था। आपको एडवांस चाहिये तो मैं अब भी देने को तैयार हूँ, पर आपकी मनाही स्वीकार नहीं की जायेगी।" कहते-कहते विपिन जैन ने दो सौ रूपये निकाले और उन्हें लम्बाई में आधा मोड़ते हुए मेरी ओर बढ़ा दिये। 


आती हुई लक्ष्मी देख, योगेश मित्तल जैसे साधू स्वभाव व्यक्ति का दिल भी एकबारगी लालच से भर गया। पर फिर भी दिखावे के लिए मैंने एक दो बार 'नहीं-नहीं' कहा, किन्तु विपिन जैन ने जबरन मेरी मुट्ठी में नोट ठूँसे तो मैंने ठूँसने दिये। 


भाई लोगों, उस समय दो सौ रुपये की रकम छोटी नहीं होती थी और मुझ जैसे आसानी से प्रकाशकों के काबू में आ जाने वाले लेखक को तो कई बार काम करने के बाद भी एकमुश्त पारिश्रमिक नहीं मिलता था और बिना ऊँगली हिलाये दो सौ रुपये मिल रहे थे तो भला कबूतर शिकारी के जाल में कैसे नहीं फँसता। 


जबरदस्ती मुट्ठी में आये दो सौ रुपये नाचीज़ ने अपनी पैण्ट की अन्दरूनी पाकेट के हवाले किये ही थे कि विपिन जैन ने बाल उपन्यासों के नाम की लिस्ट भी थमा दी और उनमें से आठ नामों पर सही का 'टिक् मार्क' करके बड़े प्यार से कहा - "योगेश जी, आप इन-इन नामों की स्क्रिप्ट चालू कर दो और हर कहानी के रोज चार-चार पेज देते जाओ।"


*क्या मतलब...?" मैं चिल्लाया - "एक साथ सारी कहानी लिखनी हैं....?"


"अब यह मत कहना योगेश जी कि यह आपसे होगा नहीं, गोली आप उसे देना, जो आपको जानता नहीं हो और इतना मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि मेरठ शहर में बिमल चटर्जी और योगेश मित्तल को विपिन जैन से ज्यादा कोई नहीं जानता।"


अपनी बात कहते-कहते अपने होठों को गोलाई में सिकोड़ लेना कुर्सी पर आगे को होकर दोनों हाथों की कोहनी टेबल पर टिका, हथेलियों में अपना चेहरा भर लेना, विपिन जैन की खास आदत थी। 


उसी अन्दाज़ में बैठ, चेहरे पर बहुत हल्की मुस्कुराहट लाकर रहस्य भरे अन्दाज़ में विपिन जैन ने इस बार सरगोशी की - "योगेश जी, मुझे परेशान मत करना। मेरा दीवाला मत निकलवाना। मेरा एक आदमी कल से रोज सुबह आपके पास आयेगा रोज मुझे आठों किताबों के चार-चार पेज चाहिए।"


"अजीब दादागिरी है यार। रोज आठों किताबों के चार चार पेज की जगह एक ही किताब के बत्तीस पेज ले लो। बात तो वही है।" मैंने कहा। 


"बात वही नहीं है योगेश जी, मैंने अलग अलग प्रेस वालों से बात कर रखी है। रोज हर प्रेस में थोड़ा थोड़ा मैटर जायेगा तो सभी प्रेसों में एक साथ किताब तैयार होगी और फिर एक साथ डिस्पैच होगी।"


"समझा...। और हर प्रेस वाले से डीलिंग एक महीने के उधार की होगी।" मैंने कहा। 


विपिन जैन मुस्कुराये और धीरे से बोले - "और किसी का उधार मोटा नहीं होगा, इसलिये कोई तकादे के लिये सिर पर नहीं आ चढ़ेगा। और एक ही प्रेस में सारी किताबें तैयार करवाऊँ तो एक ही प्रेस वाले आ बिल इतना मोटा हो जायेगा कि साला हर दूसरे दिन आकर माँ-बहन करेगा।"


"मगर यार, तुम्हारी इस चालूपन्ती में गरीब लेखक के तो दिमाग का कीमा बन जायेगा। जरा सोचो कि एक कहानी के पात्र का नाम दूसरी में, दूसरी के पात्र का नाम तीसरी में लिखा गया तो क्या होगा?" मैं झुंझला कर बोला। 


"कुछ नहीं होगा योगेश जी। हमने अपनी कहानियाँ लिखवाने के लिए कोई टंटपूंजिया लेखक नहीं पकड़ा है। योगेश मित्तल को चुना है, जो कहता है - किये गये कामों को सही करने से बेहतर है, पहले से ही सही काम किये जायें।"


दोस्तों, यह मेरा ही डायलॉग था, जो तब भी मैं अक्सर कह बैठता था और आज भी गाहे-बगाहे मेरी जुबान पर आ धमकता है। दरअसल कभी शेक्सपियर की किसी किताब में ऐसा कुछ पढ़ा था, जो मुझे अच्छा लगा और जिन्दगी की सोच बन गया, पर पता नहीं था कि अपनी ही लाठी, अपने सिर आ बजेगी। 


मुझे परेशानी में देख, विपिन जैन ने फिर मुंह खोला - "योगेश जी, आप काम तो शुरू करो, गलती हो भी गई तो सुधार लेंगे। भई, उपन्यास की प्रूफरीडिंग तो खुद मैंने ही करनी है। आप गलती करोगे तो फौरन पकड़ी जायेगी, पर मुझे उम्मीद है - आपसे कोई गलती हो ही नहीं सकती।"


खैर... 


कुलबुलाते नोटों की गर्मी महसूस करते हुए चाय-वाय सुड़कने के बाद, मैं विपिन जैन के आफिस से बाहर निकला और ईश्वरपुरी से आगे मामाजी के बड़े मकान में सड़क की ओर स्थित दुकानों में से एक दुकान 'श्याम बुक स्टाल' पर पहुँचा। श्याम बुक स्टाल के मालिक श्याम से मेरी यारी-दोस्ती थी। कागज-पेन आदि जरूरत की स्टेशनरी मैं उसी की दुकान से खरीदता था। 


उससे कई दस्ते फुलस्केप पेपर्स के लिए। कुछ पेन भी लिये और ईश्वरपुरी की तरफ पहुँच, अपने कमरे की ओर बढ़ा, लेकिन कम्बख्ती ने अभी मेरा पीछा नहीं छोड़ा था। 


ईश्वरपुरी के नुक्कड़ पर ही गिरधारी मोटे की चाय और पान की दुकान थी। मैंने उसकी दुकान पर पहुँच, अपना सामान एक कोने में रखा और गिरधारी से सादी पत्ती के दो जोड़ा पान बनाने को कहा। यशपाल वालिया की सोहबत ने मुझे तम्बाकू का पान खाना काफी पहले सिखा दिया था, पर वो किस्सा फिर कभी....। पान लगाने का आर्डर देने के बाद मैं सोचने लगा – एक चाय भी हलक में उड़ेल लूँ, पता नहीं आज खाना खाने का अवसर भी मिले, न मिले।' 


और जब मैं यह सोच रहा था, अचानक किसी ने पीछे से मेरी गर्दन पकड़ ली।


"बहुत अच्छे... हमने तुम्हें कंकरखेड़ा में कमरा दिलाया। अपने यहाँ काम दिया और तुम रातोंरात कंकरखेड़ा छोड़ यहाँ डाकुओं की बस्ती में आ बसे। वाह कलाकार, यह भी नहीं सोचा कि तुम्हारे बिना मेरा सारा काम रुक रहा होगा। नुक्सान हो रहा होगा।" यह सतीश जैन थे, मेरठ में जगतमामा के नाम से मशहूर, उस समय लक्ष्मी पाकेट बुक्स के स्वामी। 


"डाकुओं की बस्ती किसे कह रहे हो भाई, यहाँ तो सब तुम्हारे रिश्तेदार हैं - साले और भाँजे-भाँजी।" मैंने कहा। 


"रिश्तेदारी गई तेल लेने। बिजनेस में कोई रिश्तेदार नहीं होता। यहाँ ईश्वरपुरी वालों को पता चल गया कि योगेश मित्तल 'मामा' का राइटर है तो तुम्हें तोड़ने के लिए यहीं कमरा भी दे दिया। काम भी दे रहे हैं कि योगेश मित्तल लक्ष्मी पाकेट बुक्स जा ही नहीं सके। यह सरासर डकैती ही तो है। मेरी चीज़ पर डोरे डालना रिश्तेदारों का काम होता है।"


"मेरा चीज़....मेरा राइटर...।" मैं बुदबुदाया। मेरे होंठों से हँसी का गुब्बारा फूटने को हुआ। मैंने लक्ष्मी पाकेट बुक्स की चार किताबों में दो-दो फार्म क्या बढ़ा दिये, मैं उन्हीं की चीज़ उन्हीं का राइटर हो गया। मुझ पर लक्ष्मी पाकेट बुक्स के नाम का ठप्पा लग गया। दूसरे शब्दों में, मैं लक्ष्मी पाकेट बुक्स की प्रापर्टी हो गया था। 


मेरी हँसी और मेरे व्यंग को अनदेखा करते हुए, मेरी गर्दन पर से हाथ हटा सतीश जैन थोड़ा नर्म पड़े - "आओ, तुम्हें तुम्हारी जीजी के यहाँ घुमा लायें।"


"यार, वहाँ का रास्ता मुझे मालूम है और कल ही तो जीजी के यहाँ गया था। आज फुरसत नहीं है। बहुत काम है।" मैंने चाय पीने का इरादा छोड़ गिरधारी को पान के पैसे दिये। 


वैसे मैं समझ गया था कि सतीश जैन ब्रह्मपुरी स्थित अपने घर से किसी काम से ईश्वरपुरी आये होंगे और संयोग से मुझ पर नज़र पड़ गई और मुझे पकड़ लिया। 


"अच्छा, अभी मैं चलूँ। पाँच-छ: दिन में देवीनगर सिस्टर के यहाँ आऊँगा, तभी मिलूँगा।" सतीश जैन को कुछ ढीला पड़ते देख, मैं बोला तो गुब्बारा फिर से फूट पड़ा -"पाँच-छ: दिन...। मज़ाक मत करो यार। मैंने तुमसे पहले ही कहा था कि मेरे सारे नावल तुमने ही लिखने हैं। व्ही. व्हानवी, चंचल, बेगम कानपुरी, सैलानी...। सारे के सारे तुमने ही लिखने हैं। सबके टाइटिल बने हुए हैं।"


मैं एकदम हक्का-बक्का हो उठा और बोला - "चार-चार उपन्यास...। बिल्कुल नहीं लिख पाऊँगा मैं। और व्ही. व्हानवी तो बिल्कुल नहीं लिखूँगा...।"


उन दिनों 'व्ही. व्हानवी' के उपन्यास 'मस्तराम'  के उपन्यासों का ही दूसरा रूप थे, जिनमें सैक्स और घृणित सामाजिक रिश्तों की कहानियाँ होती थीं। 


"ठीक है...। व्ही. व्हानवी मत लिखना, बाकी सब तो शुरू करो।" सतीश जैन ने कहा।


"ठीक है, शुरू कर दूँगा, लेकिन एक हफ्ते बाद...।" मैंने सतीश जैन को समझाया, लेकिन समझना प्रकाशकों की फितरत में कहाँ होता है, जो सतीश जैन समझते। हम दोनों के बीच बड़ी देर तक 'चेमेगोइयाँ' होती रहीं, आखिर चाय वाले गिरधारी ने ही कह दिया - "यूँ खड़े खड़े ही चटर-पटर करते रहोगे। थोड़ी देर बैठ जाओ।"


गिरधारी की दुकान के सामने पड़ी मरियल सी बेंच उस समय खाली थी, लेकिन सतीश जैन एक नज़र उस बेंच पर डाल बोले - "गिरधारी ठीक कह रहा है, चलो, तुम्हारे कमरे पर चलते हैं। हम भी तो देखें, कहाँ कबाड़खाने में कमरा लिया है।"


सतीश जैन को अपने कमरे तक ले जाने का मेरा कतई मूड नहीं था, पर सिर पर सवार मुसीबत से छुटकारा पाना भी सम्भव नहीं था, मरता क्या न करता। 


गिरधारी से पान के बंधे हुए जोड़े लिये और साइड में रखा अपना सामान उठाया व कदम आगे बढ़ा दिये। 'हमारे मोहसिन, हमारे अज़ीज़' सतीश जैन हमारे साथ साथ हो लिये।


कमरे में पहुँच वह मेरे पलंग पर ही ऐसे पसर गये, मानों कयामत तक उठने का इरादा ही न हो। 


और फिर सतीश जैन के द्वारा मेरे साथ मान-मनौव्वल का लम्बा प्रहसन स्टार्ट हुआ और अन्ततः सतीश जैन ने मुझे इस बात के लिए तैयार कर लिया कि मैं उनके तीन छप चुके टाइटिल्स पर उपन्यास लिखना आरम्भ कर दूं और तीनों उपन्यासों के दो-दो तीन-तीन पेज़ रोज़ लिखकर तैयार रखूँ, रोज़ शाम को उनका बन्दा आकर मुझसे पेज ले जायेगा। 


वे तीन उपन्यास थे - उपन्यासकार के रूप में बेगम कानपुरी लेखिका का 'बेवफा', उपन्यास लेखिका चंचल का 'तुम्हारे लिए' और उपन्यासकार सैलानी का 'प्रेम का खिलाड़ी'। 


दोस्तों, किसी अच्छे भले इन्सान की रेल कैसे बनती है, तब आप मेरे करीब होते तो देखते। मगर उस समय भी मेरा हाल-बेहाल देखा भी तो तीनों रेल बनाने वालों ने ही देखा। और वे तीन थे - सुशील जैन, विपिन जैन व सतीश जैन। 


अलबत्ता सुशील जैन का उसमें इतना ही दखल था कि सबसे पहले उन्होंने ही मुझे रोज़ दो-तीन पेज का मैटर देते रहने को कहा था, किन्तु उनके लिए उस समय मुझे एक ही उपन्यास लिखना था - कैप्टेन दिलीप का अधजली लाश। जबकि विपिन जैन के आठ बाल उपन्यास और सतीश जैन के तीन उपन्यासों का रोज़ कम से कम दो-दो पेज का मैटर लिखना था, किन्तु वो दो पेज उपन्यास के दो पेज नहीं थे, योगेश मित्तल के लिखे दो पेज होते थे और उन में से एक-एक पेज में पैंसठ से सत्तर लाइन होतीं थीं तथा एक लाइन में बीस से बाइस तेइस शब्द। 


डायलॉगबाजी वाली लाइनों में जरूर कम मैटर होता था, किन्तु तब भी लिखे हुए एक पेज में सत्ताइस लाइनों से तीन-सवा तीन पेज बन ही जाते थे और दो पेज का मतलब था - उपन्यास के लगभग सात पेज।


मेरी ज़िन्दगी का वह सबसे भयानक कहिये या यादगार, लेकिन बड़ा ही खतरनाक दौर था। 


एक ही वक़्त में मैं एक साथ बारह उपन्यासों में दो-दो तीन-तीन पेजों का मैटर लिख रहा था। इसके लिए मुझे अपनी डायरी में हर उपन्यास का नाम सबसे ऊपर लिखकर नीचे उसमें रखे गये पात्रों के नाम लिखने होते थे। हर उपन्यास की शुरुआत के साथ ही उस उपन्यास का पेज बनाया गया। बारह उपन्यासों के कुल बारह पेज तैयार हुए और जब जिस उपन्यास के पेज लिखे जाते, डायरी में उस उपन्यास के पन्ने को खोलकर रखा जाता। 


मैं रात-रात भर जागकर भी लिखता। 


सुबह छ: सात बजे के करीब हरीनगर स्थित रामाकान्त मामाजी के घर जाता, वहीं फ्रेश होता, वहीं नहाता, वहीं चन्द्रावल मामीजी के हाथ का बना नाश्ता करता और फिर वहीं दो-ढाई घंटे की डटकर नींद लेता। सोने से पहले मामीजी को अपने उठने का समय बताकर कह देता था कि यदि मैं अपने आप न उठूँ तो मुझे झंझोड़कर जगा दें, लेकिन जगा जरूर दें। 


पर हमेशा मैं स्वयं ही समय से जाग जाता था। अगले पन्द्रह बीस दिनों में महज़ दो तीन बार ही ऐसा हुआ, जब मामीजी को मुझे जगाना पड़ा। दोपहर का खाना खाने के लिए लगभग तीन बजे के करीब मैं मामीजी के यहाँ पहुँचता और खाना खाकर वापस कमरे पर लौट जाता। मामीजी और मेरी सारी की सारी ममेरी बहनें मुझे रोज़ टोकतीं कि भइया, खाना खाने के लिए तो टाइम से आ जाया करो, पर मैंने अपनी सारी मजबूरी कहिये या कहानी मामीजी और बहनों को बता दी थी, इसलिए वे भी मेरे साथ पूरा सहयोग करती रहीं। रात का खाना खाने की उन दिनों मैंने पूरी छुट्टी रखी, लेकिन अपने कमरे पर ग्लुकोज के बिस्कुट के पैकेट अवश्य हर रोज़ ले आता था, लिखते- लिखते कभी कभी एक बिस्कुट मुँह में डाला और चबा डाला। कभी बिस्कुट दाँतों में चिपक जाता तो काम में रुकावट डाले बिना, देर तक जुगाली करता रहता, पर उँगली दाँत की तरफ कभी नहीं ले जाता। 


बीच में एक दिन निकाल कर, मैंने रायल पाकेट बुक्स के दोनों उपन्यासों में मैटर बढ़ाने का काम भी पूरा किया। रायल पाकेट बुक्स के स्वामी मेरे मकान मालिक भी थे, पर पारिश्रमिक देने में उन्होंने जरा भी देरी नहीं की। 


खैर, खरामा-खरामा मेरे जीवन का वह सबसे खराब दौर खत्म हुआ। विपिन जैन के बाल पाकेट बुक्स का काम सबसे पहले खत्म हुआ, क्योंकि उनमें एक एक उपन्यास में पाँच-छ: फार्म से ज्यादा नहीं लिखने थे, लेकिन अधजली लाश और लक्ष्मी पाकेट बुक्स के उपन्यासों में कुछ ज्यादा वक़्त लगा। 


तब मुझे खुद पर भरोसा नहीं था कि सब उपन्यास ठीक-ठाक लिखे जायेंगे, लेकिन मुसीबत का वक़्त टल गया तो जाना कि मैंने अपने दिमाग से जितना भी भूसा निकाला था, सब ठीक ठाक कहानी के रूप में इज्जत बख्श गया। 


सच कहूँ तो मेरठ में उन बीस दिनों में मेरा हाल, जो बदहाल हुआ था, उसकी वजह से मैंने मन ही मन सोच लिया था कि अब की दिल्ली गया तो जल्दी वापस मेरठ नहीं आऊँगा। 


सबसे आखिर में लक्ष्मी पाकेट बुक्स में लेखिका चंचल के नाम से छपने वाला उपन्यास 'तुम्हारे लिए' समाप्त हुआ। अब मुझे तीनों प्रकाशकों से अपना पूरा पारिश्रमिक लेना था। 


लेकिन उसके लिए प्रकाशकों के यहाँ जाना भी मजबूरी थी। 


अपना-अपना मैटर तो तीनों ही प्रकाशक अपना आदमी भेजकर मँगवाते रहे थे। 


सभी उपन्यासों का काम निपटाने के बाद, अगले दिन मामाजी के यहाँ मैं सुबह का बिस्तर पर गिरा, दोपहर तक जमकर सोया। 


दोपहर खाने के वक़्त मामीजी ने झिंझोड़कर जगाया तो जागा। फिर खाने के बाद सोचा - पहले सुशील जैन से पारिश्रमिक वसूल लूँ, फिर एक चक्कर तुलसी पाकेट बुक्स का लगा आऊँ। 


पर सोचा हुआ, सोचा ही रह गया। ईश्वरपुरी में ही वेद प्रकाश शर्मा सुरेश जैन के मकान के समीप मिल गये। बोले - "कहाँ गायब था, मुझसे वादा करके मिलने भी नहीं आया।"


"नहीं यार, वादा तो नहीं किया था।" मैंने कहा - "हाँ, आने को बोला जरूर था।"


"तो वादा और किसे कहवैं हैं?" वेद भाई एकदम मेरठिया टोन में आ गये।


"आज इधर कैसे आ गये?" मैंने बात का रुख पलटा। 


"क्यों...? मेरे यहाँ आने पर मनाही है क्या? सालों से यहीं आना-जाना, उठना-बैठना रहा है। एकदम से छूट जायेगा क्या?" 


"नहीं यार, मेरा मतलब यह नहीं था।।" मैंने कहा। 


"तो क्या मतलब था तेरा?" बातों के वेद भाई भी खलीफा थे और बाल की खाल खींचने के बेहतरीन उस्ताद। मेरे जैसे नौसिखिये का उनके सामने टिक पाना तो मुश्किल ही था, इसलिए थोड़ा और ज्यादा विनम्र होकर बोला - "मेरा मतलब है, आये हो तो किसी काम से ही आये होगे।"


"क्यों...? यह क्या मेरी जन्मपत्री में लिखा है कि मैं किसी काम से ही कहीं आ जा सकता हूँ। सुरेश जी मेरे बहुत पुराने दोस्त हैं। उनसे मिलने तो मैं हज़ार बार बिना काम के भी आ सकूँ हूँ।" वेद भाई फिर मेरठिया टोन में आ गये। मुझे कोई जवाब या सवाल नहीं सूझा तो हँसी आ गई और मेरा दायाँ हाथ अपने बालों की खूबसूरती को सहलाने लगा। 


उन दिनों मेरे बाल बहुत खूबसूरत और लम्बे-लम्बे थे। बाबकट महिलाओं के बालों की तरह कन्धे तक झूलते थे और दाढ़ी भी माशाअल्लाह आज के बाबा रामदेव से तो बेहतरीन ही थी। 


मुझे खामोश देख या यूँ कहिये कि चित्त हुआ देख, वेद भाई का स्वर सिम्पल-सरल हो उठा, बोले - "सुरेश जी से कुछ खास बात करने आया था, बातचीत करके, अब तो मैं वापस जा रहा हूँ। चले क्या... मेरे साथ?"


"चलो...।" हर वक़्त यारों के हर कदम में साथ देने की फितरत के तहत, मेरे मुँह से न चाहते हुए भी निकल ही गया। 


"आ फिर...।" वेद भाई के कदम ईश्वरपुरी से बाहर की ओर बढ़ गये और मैं जिन कदमों से गंगा पाकेट बुक्स में सुशील जैन जी से मिलने की हुड़क में ईश्वरपुरी आया था, उन्हीं कदमों से गंगा पाकेट बुक्स से महज़ बीस कदम दूर रहते, वापस पलट गया। 


वेद भाई उस दिन कार से नहीं आये थे। बाहर मुख्य सड़क पर आ उन्होंने एक रिक्शा रोका। रिक्शे वाले से शास्त्रीनगर चलने की बात की और फिर मुझसे कहा- "बैठ...।"


मेरे बैठने के बाद वह भी समीप बैठे तो मैंने बातों का रुख प्रकाशन की बातों पर घुमा दिया। बोला - "अब सुरेश जी से अलग होने के बाद तो तुम नये लेखक भी खड़े कर सकते हो।"


"खड़े तो कर दें, पर यार, नये लेखक हैं कहाँ और जो हैं, उनमें दम कहाँ है? जिसे छापना हो, उसमें कुछ तो ऐसा होना चाहिए कि लगे इसे तो छापना ही छापना है।"


"हाँ, ये  बात तो है। पर दो तीन लेखक तो तुम्हें सैट करने ही होंगे। प्रकाशक के तौर पर सिर्फ अपनी ही किताब थोड़े ही छापोगे।"


"नहीं, छापना तो औरों को भी पड़ेगा। छ: किताबों से कम का सैट तो निकाला ही नहीं जा सकता।" वेद भाई गम्भीरतापूर्वक बोले। 


"वही तो मैं पूछ रहा हूँ। ट्रेडमार्क लेखकों और नकली उपन्यासों के तुम हमेशा खिलाफ रहे हो तो अब क्या, कुछ लेखकों को उनके नाम और फोटो समेत छापोगे?"


जवाब देने से पहले ही वेद के चेहरे पर गहरी सोच के बादल घुमड़ आये। 


रिक्शा तब तक हापुड़ अड्डे के चौक पर आ पहुँचा था। 


(शेष फिर) 

योगेश मित्तल

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बुधवार, 21 जुलाई 2021

बरसो बारिश, बरसो बारिश | हिंदी कविता | योगेश मित्तल

जुलाई 21, 2021 4
बरसो बारिश, बरसो बारिश | हिंदी कविता | योगेश मित्तल
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 बरसो बारिश, बरसो बारिश।


गरम गरम धरती की साँसें, बरस-बरस कर ठंडी कर दो।

सूखी धरती के सीने में, प्रेम-बूंदों से दरिया भर दो।

खूब नहाऊँ  मैं बारिश में, मिट जाए तन-मन की खारिश।


बरसो बारिश, बरसो बारिश।

लेकिन ऐसी अनहोनी क्यों, कहीं बाढ़-सैलाब आ रहा।

जिंदा लोगों के सपनों में, मरने का ही ख्वाब आ रहा।

दुखियों का दुःख दूर करो, करो खुशी की सब पर मालिश।


बरसो बारिश, बरसो बारिश


-योगेश मित्तल

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रविवार, 18 जुलाई 2021

राजहंस बनाम विजय पॉकेट बुक्स - 10

जुलाई 18, 2021 2
नाश्ता करके हम पटेलनगर के लिए निकले। भारती साहब घर पर नहीं थे। 


मैंने ऊपर खेल खिलाड़ी के आफिस में जाकर खेल खिलाड़ी की डाक देखी। पढ़ने में वक़्त लगता, इसलिए सारी डाक इकट्ठी करके एक बड़े ब्राउन में रख लीं और जवाब देने के लिए कुछ पोस्ट कार्ड साथ में डाल लिये। 

"अब किधर चलें?" वालिया साहब ने स्कूटर स्टार्ट करते हुए मुझसे पूछा। 

"बैक टू पैविलियन...।" मैंने कहा। 

"नहीं यार, इतनी जल्दी घर जाकर क्या करेंगे? चलो, कनाट प्लेस चलते हैं।" और वालिया साहब ने स्कूटर पटेलनगर से शंकर रोड पर ले आये। फिर काफी देर सीधे चलने के बाद राम मनोहर लोहिया अस्पताल (तब के विलिंग्डन हास्पिटल) के पास से मोड़ लिया। 

फिर बंगला साहब गुरुद्वारे के निकट, बाहर ही फुटपाथ के समीप स्कूटर रोक दिया और बोले - "योगेश जी, आप यहीं रुको, मैं जरा मत्था टेक आऊँ।"

"मैं भी चलूँ..?" मैंने कहा। 

"फिर स्कूटर कौन देखेगा? पार्किंग में खड़ा किया तो ख्वामखाह टाइम वेस्ट होगा।"

"ठीक है।" मैंने कहा और स्कूटर के साथ खड़ा हो गया। वालिया साहब मत्था टेकने चले गये। स्वभाव से यशपाल वालिया भी धार्मिक प्रवृत्ति के थे। पर किसी विशेष गुरुद्वारे या मन्दिर जाने की उनकी आदत नहीं थी। चांदनी चौक गये तो शीशगंज गुरुद्वारे में मत्था टेक लिया। सेन्ट्रल सेक्रेटियेट गये तो रकाबगंज में मत्था टेक दिया। बिड़ला मन्दिर के निकट से गुज़रे तो वहाँ सिर झुकाने चले गये। 

मत्था टेक कर वह लौटे तो उनके हाथ में कड़ाहाप्रसाद (हलुवे) का दोना था। दोना मुझे थमाते हुए बोले - "योगेश जी, यह आप खत्म कर दो।"

"आप भी तो लो।" मैंने कहा। 

"मैं तो छक कर आ रहा हूँ। यह आपके लिए ही लाया हूँ।" वालिया साहब ने कहा। 

मैंने हलवा खत्म किया तो मुझे अपने पीछे बैठा वालिया साहब ने स्कूटर स्टार्ट कर दिया। 

वहाँ से वह सीधे रीगल सिनेमा के पीछे जनपथ पर जाकर रुके। 

वहाँ दायें हाथ को पहला मोड़ था, वहीं कार्नर पर फुटपाथ ही काफी बड़ी जगह पर इंग्लिश उपन्यासों का जखीरा था। 

स्कूटर फुटपाथ पर चढ़ा, वहीं पास में रोककर, वालिया साहब इंग्लिश उपन्यासों पर नज़र डालने लगे। उस समय मुझ पर आर्ची और रिची रिच के अंग्रेजी कामिक्स पढ़ने का फितूर छाया हुआ था और कभी कभी मिस्टी और मैड की कामिक मैगज़ीन भी खरीद लेता था। 

वहाँ मेरी पसन्द का सब कुछ था। जितनी देर में वालिया साहब ने इंग्लिश के दो उपन्यास छाँटे, मैंने पाँच-छ: कॉमिक्स छाँटकर उनकी पेमेन्ट कर दी थी। 

वालिया साहब ने एक उपन्यास जॉन क्रेज़ी और कार्टर ब्राउन का एक-एक उपन्यास लिया। लेखकों के नाम इसलिये याद हैं, क्योंकि पढ़ने के बाद वालिया साहब ने वे मुझे दे दिये थे। 

उपन्यास एवं मेरा सारा सामान डिकी में डालने के बाद वालिया साहब ने कनाट सर्कस का एक चक्कर मारा और स्कूटर लेडी हार्डिंग अस्पताल के निकट ले आये। 

"वापस इधर से चलना है।" मैंने पूछा। 

"हाँ, इधर मैं आपको एक खास चीज दिखाने लाया हूँ।"

"क्या चीज़...?" मैंने पूछा। 

"उधर देखो....।" वालिया साहब ने इशारा किया। 

मैंने लेडी हार्डिंग अस्पताल के सड़क पार, दूसरे छोर पर थोड़ी थोड़ी दूरी पर कई महिलाएँ खड़ी थीं। 

वालिया साहब उनमें से सबसे दूर खड़ी एक कम उम्र स्त्री के पास गये, स्कूटर रोका, लेकिन स्कूटर का इंजन स्टार्ट ही रखा। उस स्त्री को देखा, लेकिन बोले कुछ नहीं, बस सिर को दायीं उसी स्त्री की ओर ही एक झटका दिया। अगला ही पल मुझे बौखला देने वाला था। बल्कि यूँ कहूँ कि मेरी एकदम सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। 

वह स्त्री एकदम मेरे पीछे बैठ गई। वालिया साहब खुद ही कुछ आगे सरक गये थे, मुझे उस स्त्री ने आगे धकेल दिया। वह दोनों तरफ टाँगे निकाल, मेरे पीछे बैठ गई और अपने दोनों हाथ, उसने मेरी कमर से आगे निकाल, वालिया साहब की कमर थाम ली थी। वालिया साहब ने तुरन्त स्कूटर आगे बढ़ा दिया था। 

उस समय सचमुच मुझे कुछ भी समझ नहीं आया था कि यह सब क्या है? मैंने यही सोचा था कि वह औरत वालिया साहब की कोई परिचिता है। 

पर आगे गोल डाकखाने के पास वालिया साहब ने एकाएक स्कूटर रोक दिया और बोले - "उतर जाओ।" 

सबसे पीछे वह औरत थी, वह स्कूटर से उतर गई। मैं उतरने लगा तो वालिया साहब ने टोका - "आप बैठे रहो।"
फिर अंगुली के इशारे से उस औरत को आगे बुलाया और अपनी जेब में हाथ डाल कुछ रुपये निकाले, जो कि दस-दस के दो नोट थे। वालिया साहब ने उस स्त्री के एक हाथ में वो बीस रुपये ठूँस, बिना कुछ कहे स्कूटर आगे बढ़ा दिया। 

"यह सब क्या था?" मैंने कुछ नाराज़गी दिखाते हुए पूछा। 

"नहीं समझे।" वालिया साहब ने पूछा। 

"नहीं।"

"यहाँ जो औरतें खड़ी होती हैं। ये जीबी रोड की कोठेवाली वेश्याएँ तो नहीं होतीं, इनमें ज्यादातर गरीबी से दुखी मजबूर टाइप की होती हैं। पैसों के लिए ये तुम्हारे साथ कहीं भी जा सकती हैं। बहुत से कालेज के लड़के इन्हें सिर्फ फिल्म देखने के लिए साथ ले जाते हैं। पैसे वाले रईसजादे, जिनके पास ऐयाशी के लिए जगह होती है, वो ऐयाशी के लिए ले जाते हैं। इन्हें 'गश्ती' कहा जाता है।" वालिया साहब ने बताया। 

तब यह मेरे लिए बिल्कुल नई जानकारी थी। पर मुझे बहुत बुरा सा लगा। मन में यह बात आई कि अगर हमारे किसी नाते-रिश्तेदार ने यह सब देखा होता तो क्या होता । 

मैंने वालिया साहब से कहा - "दोबारा मुझे ऐसा कुछ मत दिखाइयेगा।" तो वालिया साहब बोले - "योगेश जी, आप एक उपन्यासकार हो, आपको सब मालूम होना चाहिए कि हमारी दुनिया में क्या हो रहा है। मैंने जो उस लड़की को बीस रुपये दिये हैं। वो इसलिए कि साथ बैठाकर उसे कुछ भी नहीं देते तो यह उसके साथ अन्याय होता। फैक्ट यह है कि ये रुपये मैंने आपको काली दुनिया का एक सच दिखाने के लिए बरबाद किये हैं।"

"पर वालिया साहब, अगर यह कोई शरीफ औरत होती तो...?" 

"तो फटाफट भाग निकलते, इसीलिए तो यहाँ आने वाले मुस्टण्डे हमेशा स्कूटर या बाइक का इंजन स्टार्ट रखते हैं।" वालिया साहब ने बताया। 

"पर आपको यह अचानक क्या सूझी? आपने पहले भी किसी लड़की को ऐसे स्कूटर पर बैठाया है?"

"पागल हो, यह तो आपको दुनिया का हाल दिखाने के लिए कोशिश की थी, वैसे मुझे भी डर लग रहा था। मेरा एक शादीशुदा दोस्त, बीवी जब मायके होती है, अक्सर यहाँ से लड़कियाँ अपने फ्लैट पर ले जाता है। पर इस बात से आप मुझे गलत मत समझ लेना। और अपनी भाभी से बिल्कुल कुछ मत कहना। आप जानते ही हो, हमारी लव मैरिज है और हम दोनों में बहुत प्यार है।"

मैंने सहमति में सिर हिला दिया,  बोला कुछ नहीं। 

उसके बाद वालिया साहब मुझे मेरे घर के लिए मुझे रमेशनगर बस स्टाप पर छोड़ कर, बालीनगर, अपने घर के लिए आगे निकल गये। 

घर पहुँचकर मैं खरीदे गये कामिक्स पढ़ने में लग गया। पर सच कहूँ - मेरा दिल बहुत घबरा रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे मैंने बहुत बड़ा अपराध किया है और घर के लोगों को कभी भी मेरे उस औरत के साथ बैठने के बारे में पता चल जायेगा। उस दिन रात को सपने में भी वह औरत मुझे मेरी पीठ से चिपकी महसूस होती रही और डराती रही। 

आज शायद लोगों को यह मामूली बात लगे, पर उन दिनों इज्जत और मर्यादा जैसे शब्द केवल किताबी नहीं थे, लोगों की ज़िन्दगी का भी हिस्सा होते थे।

उसके बाद मेरा और यशपाल वालिया का मिलना रविवार को हुआ। मैं वालिया साहब के यहाँ जाने के लिए निकला और रमेशनगर के गोल चक्कर से होते हुए मेन रोड की ओर बढ़ ही रहा था कि सामने से अपने वेस्पा स्कूटर पर वालिया साहब आते दिखाई दिये। 

वालिया साहब को देख मैं ठिठक गया। वालिया साहब ने स्कूटर सीधा मेरे निकट रोका और पूछा - "किधर...?"

"आपके यहाँ ही जा रहा था।" मैंने कहा। 

"बैठो फिर...।" वालिया साहब ने गर्दन को पीछे झटका दे पीछे बैठने का संकेत किया। 

मैंने सोचा था वालिया साहब वापस घर जायेंगे, लेकिन वालिया साहब का रुख पटेलनगर की ओर था। 

पटेलनगर में भारती साहब अपने फ्लैट में नहीं थे। वह ऊपर खेल खिलाड़ी के आफिस में थे। हम खेल खिलाड़ी के आफिस में पहुँचे तो देखा, वहाँ भारती साहब तो तख्त पर बैठे हैं और एक भारी भरकम शख्स सामने ही एक फोल्डिंग चेयर पर बैठे थे। 

तख्त पर भारती साहब के निकट उनकी कई किताबें भी रखी थीं। 

भारती साहब ने उनसे हमारा परिचय कराया। वह भारती साहब के स्कूली जमाने के दोस्त थे और यह बात भारती साहब ने बाद में बताई थी कि वह साल में कभी-कभार ही उनसे मिलने आते थे और जब आते थे - भारती साहब से उनकी लिखी बहुत सी किताबें ले जाते थे। वैसे भारती साहब के कई ऐसे दोस्त थे - जो कम ही आते थे, लेकिन जब आते थे, पढ़ने के लिए उनकी लिखी किताबें, हक से माँगकर ले जाते थे। 

वह एक वकील थे और उनसे भारती साहब विजय पाकेट बुक्स और राजहंस के मुकदमे की बातें कर रहे थे। 

हम दोनों भी फोल्डिंग चेयर खोलकर वहीं बैठ गये। 

जब हम वहाँ पहुँचे थे, वह वकील साहब भारती साहब से कह रहे थे - "डबल बेंच के सीनियर जस्टिस ने जो भी फैसला किया है। बहुत सोच-समझ कर ही किया होगा और वो किसी भी हालत में गलत नहीं हो सकता।"

"क्यों, गलत क्यों नहीं हो सकता। जज की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति भी इन्सान होता है, वो भी गलती कर सकता है। गलती तो इन्सान से ही होती है।" भारती साहब ने उस वकील से कहा। 

"की गल्ल चल रही है?" वालिया साहब ने पंजाबी अन्दाज़ और लहज़े में पूछा। 

तब भारती साहब ने अपने उस दोस्त का परिचय कराया, किन्तु आज मुझे उसका नाम याद नहीं। एक ही बार मिला था उससे। भविष्य में कभी उसे याद करना पड़ेगा, यह बात उस समय कल्पना से परे थी। आज बस, यह याद है कि वह कोई वकील था। 

उससे परिचय कराने के बाद भारती साहब यह बोले - "इससे राजहंस के मुकदमे के बारे में बात कर रहा था। कुछ अजीब नहीं है कि हिन्द पाकेट बुक्स को उसके ट्रेडमार्कों पर स्टे मिल गया कि विजय पाकेट बुक्स कर्नल रंजीत और शेखर के उपन्यास नहीं छाप सकती। मनोज पाकेट बुक्स को स्टे मिल गया कि विजय पाकेट बुक्स मनोज और सूरज के उपन्यास बेच नहीं सकती, लेकिन विजय पाकेट बुक्स को राजहंस पर यह स्टे नहीं मिला कि हिन्द और मनोज राजहंस के उपन्यास छाप नहीं सकते।"

"इसमें राजहंस अर्थात लेखक इन्वाल्व है ना और लेखक गरीब होता है। कलम का मजदूर होता है । मजदूर के घर का खर्च तो तभी चलेगा न, जब वह मजदूरी करेगा और उसे उसकी मजदूरी का मेहनताना मिलेगा।" वालिया साहब बोले। फिर एक क्षण रुक कर उन्होंने पंजाबी में भारती साहब से कहा - "आपने बताया था न कि जस्टिस साहब ने विजय पाकेट बुक्स की एप्लीकेशन के जवाब में कहा था कि एक लेखक कभी ट्रेडमार्क नहीं हो सकता।"

"हाँ...।" भारती साहब बोले। 

"तो पक्की बात है, विजय बाबू ने एप्लीकेशन ही गलत डलवाई होगी।" वालिया साहब ने कहा - "विजय पाकेट बुक्स की ओर से एप्लीकेशन यह डाली गई होगी कि राजहंस लेखक उनका ट्रेडमार्क है। तो कोर्ट ने फैसला दे दिया कि एक लेखक कभी ट्रेडमार्क नहीं हो सकता।"

"तेरा मतलब है.... " भारती साहब कुछ कहने ही जा रहे थे कि वालिया साहब उनकी बात काटते हुए बोले - "मेरा मतलब है - ट्रेडमार्क और नाम व्यापारी अपने 'गुड्स' के लिए, सामान के लिए रखते हैं। जैसे 'लक्स' एक साबुन है। साबुन 'लक्स' के नाम से बेचने के लिए लक्स बनाने वालों ने उसका नाम एक विशेष स्टाइल से लिखवाया, फिर उसे ट्रेडमार्क के रूप में रजिस्टर्ड करवा लिया। अब 'लक्स' का नाम लिखने का स्टाइल उसका ट्रेडमार्क है और ट्रेडमार्क के साथ लक्स का नाम रजिस्टर्ड है तो कोई और साबुन कम्पनी 'लक्स' नाम से साबुन नहीं बेच सकती।"

"तो राजहंस...।" भारती साहब ने फिर कुछ कहना चाहा तो वालिया साहब फिर उनकी बात काटते हुए बोले -

"विजय पाकेट बुक्स ने राजहंस नाम रजिस्टर्ड करवाया है - अपने पब्लिकेशन का सामान बेचने के लिए। 'सामान' - जो 'उपन्यास' है, वह प्रकाशक का सामान है, लेकिन जब उसमें लेखक का नाम जुड़ गया तो वह सामान कहाँ रह गया। वह तो लेखक का उपन्यास हो गया और कोर्ट का फैसला सही है कि एक लेखक कभी ट्रेडमार्क नहीं हो सकता। 'राजहंस' एक नाम प्रकाशक की वस्तु, जो कि उपन्यास है, बेचने के लिए ट्रेडमार्क हो सकता है। लेकिन राजहंस लेखक ट्रेडमार्क कैसे हो सकता है। लेखक कोई सामान नहीं है। कोई वस्तु नहीं है।"

"सही गल्ल है।" भारती साहब ने सिर हिलाया। साथ की कुर्सी पर बैठे वकील ने प्रशंसात्मक नज़रों से वालिया साहब को देखा - "आपको तो वकील होना चाहिए था।"

"फिर आपका क्या होता?" वालिया साहब उस वकील से बोले । एक ठहाका लगा, जिसमें वह वकील और भारती साहब दोनों शामिल थे, पर मैं बस, मुस्कुरा कर रह गया। 

उसके बाद भारती साहब का वह वकील दोस्त वहाँ रखी उनकी किताबें लेकर चला गया। 

भारती साहब यशपाल वालिया से बोले - "तेरी बात में दम है। तू यह बात विजय और मरवाहा साहब के सामने करियो।"

उसके बाद काफी देर तक राज भारती जी और यशपाल वालिया विजय पाकेट बुक्स और राजहंस के मुकदमे में अगली करवट क्या-क्या हो सकती हैं, इसकी अटकलें लगाते रहे। इस बीच भारती साहब ने कई सिगरेटें फूँक  दीं, जबकि वालिया साहब एक में ही सुट्टे मारकर ठहर गये थे। मुझसे भी वालिया साहब ने पूछा था। पर मैंने मना कर दिया, क्योंकि उस दिन मेरी तबियत ढीली थी। पिछली रात दमे से परेशान रहा था। दवाएँ और स्टीम लेने से सुबह तक ठीक हो गया था। आप में से कई लोग सोचते होंगे कि जब मुझे दमा था और मैं जानता था कि दमे में सिगरेट हानिकारक है तो सिगरेट पीता ही क्यों था। तो कभी इस बारे में भी खुलकर बताऊँगा। पर वो किस्सा फिर कभी...?

वालिया साहब और भारती साहब की बातों में ब्रेक लगा तो मैंने भारती साहब से कहा -"गुरु जी, एक बात बताओ।"

"क्या...?" भारती साहब ने पूछा। 

"विजय जी को मेरे शक्तिनगर मनोज पाकेट बुक्स में जाने और फिर वहाँ से राज और गौरी भाई के साथ दरीबा कलां जाने की बात कैसे पता चली थी?"

"तू अभी तक उसी बात से परेशान है?" भारती साहब हँसे - "मामूली सी बात है। विजय के यहाँ के पैकर का रिश्ते का भाई मनोज पाकेट बुक्स में काम करता है। दोनों का घर साथ साथ है। तो मनोज पाकेट बुक्स में काम करने वाले ने विजय पाकेट बुक्स में काम करने वाले को बताया कि योगेश मित्तल आये थे और मालिकों के साथ ही कार में दरीबे गये थे, बस विजय पाकेट बुक्स के पैकर ने उन्हें यह बात बता दी। यह सोचकर कि विजय बाबू खुश होंगे। ये वर्कर भी तो जानते हैं न कि विजय और मनोज में लफड़ा चल रहा है।"

मैं गहरी साँस  लेकर रह गया। यह मामूली सी बात थी, मगर इसने कई दिनों से मुझे परेशान कर रखा था। 

अब एक खास बात उन सभी को बता दूँ, जिन लोगों को यह बात समझ में नहीं आ रही है कि जब हाईकोर्ट ने यह कह दिया कि एक लेखक ट्रेडमार्क नहीं हो सकता तो भिन्न भिन्न प्रकाशक ट्रेडमार्क लेखक को कैसे छाप रहे हैं। 
वे इस बात को समझें कि एक प्रकाशक जब ट्रेडमार्क के अन्तर्गत कोई उपन्यास बेचता है, वह प्रकाशक के लिए उसका 'सामान' होता है। पाठक के लिए वह उपन्यास ही होता है। होता तो प्रकाशक के लिए भी उपन्यास ही है, लेकिन वह उपन्यास प्रकाशक का सामान है, इसीलिए आज भी प्रकाशकों के ट्रेडमार्क चल रहे हैं।

मेरी समझ में तो यही बात आती है कि किसी भी ट्रेडमार्क के अन्तर्गत प्रकाशक अपना सामान बेच रहा होता है। वह सामान किसी लेखक का उपन्यास बेशक हो, प्रकाशक के ट्रेडमार्क के अन्तर्गत वह उसका सामान है। 

जब तक सरकार ऐसा कोई कानून नहीं लाती कि किसी प्रकाशन संस्था का कोई ट्रेडमार्क रजिस्टर्ड नहीं किया जायेगा, ट्रेडमार्क के रूप में नये नये लेखक जन्म लेते रह सकते हैं। और सरकार के लिए कोई भी बन्दिश लगाना इस लिए सम्भव नहीं, क्योंकि पुस्तक प्रकाशन भी एक व्यवसाय तो है ही और किसी एक व्यवसाय के लिए वे नियम कैसे बदले जा सकते हैं, जो अन्य व्यवसायों पर लागू होते हों। 

विदेशों में भी ट्रेडमार्क सिस्टम ऐसे ही चल रहा है। भारत में तो विदेशों की नकल के रूप ट्रेडमार्क सिस्टम का जन्म हुआ है, वरना यहाँ पहले सिर्फ उपन्यास पत्रिकाएँ छपती थीं। जैसे - फरेबी दुनिया, डबल जासूस, खूनी पंजा, भयानक दुनिया, रूपसी, रहस्य, रोमांच, जासूसी दुनिया, तिलस्मी दुनिया, दोषी, गुप्तचर, जासूसी फंदा आदि। 
इन पत्रिकाओं में भी आम तौर पर लिखने वाले नियमित रूप से लगे-बंधे लेखक होते थे। बदलाव बहुत कम होता था। 

यदि मुझसे कोई पूछे कि इन्टरनेट और ई-बुक्स के जमाने में पुस्तक प्रकाशन पर असर पड़ेगा तो मैं समझता हूँ। ई-बुक्स का भारत में नया-नया चलन है, लेकिन भविष्य फिर से करवट लेगा। कागजी किताबें और प्रकाशन जगत में फिर से उबाल आयेगा। ई-बुक्स से जंगली घास की तरह बेशुमार लेखक अवश्य पैदा हो जायेंगे, लेकिन क्वालिटी लेखन बहुत ज्यादा सामने नहीं आ सकेगा। 

फिर मोबाइल या कम्प्यूटर पर पढ़ना आँखों के लिए तो घातक होगा ही, सिरदर्द और माइग्रेन के मरीज़ों की संख्या भी बढ़ायेगा। 

उस रोज मैं और यशपाल वालिया डेढ़ बजे पटेलनगर से वापस चल दिये। घर पहुँच लंच करने के बाद मैं आराम करने लगा।

अगले कुछ दिन मेरा घर से निकलना सम्भव नहीं हुआ। अचानक दमे का प्रकोप बढ़ गया था। फिर कई दिन बिस्तर पर ही रहा। वालिया साहब रोज दिन में एक बार जरूर आते और कम्पलीट रेस्ट करने की सलाह देकर चले जाते। भारती साहब भी एक दिन छोड़कर आते रहे, पर वह हमेशा शाम को ही आते रहे। 

ठीक होने में काफी दिन लग गये। काफी दिन बाद मैं सुबह आठ बजे के लगभग घर से निकला और सीधा वालिया साहब के घर गया। 

मुझे देखते ही वालिया साहब ने मीना भाभी से कहा - "एक आमलेट योगेश जी के लिए भी।"

आज के जमाने में दोस्तों के साथ कितना अपनापन होता है, पता नहीं, लेकिन तब बिमल चटर्जी, अशीत चटर्जी, अरुण कुमार शर्मा, राज भारती, एस. सी. बेदी, यशपाल वालिया और एन. एस. धम्मी, सभी के घर मुझे बेपनाह प्यार और अपनापन मिला था। 

भाभी जी ने मुझसे कहा - "योगेश जी, आप बहुत कमजोर हो, हड्डी-हड्डी नज़र आती है, आप अण्डे रोज खाया कीजिये।"

मैं कुछ नहीं बोला। ऐसा ही मुझसे किसी समय बिमल चटर्जी कहते रहते थे। बल्कि मुझे पूरी तरह नानवेजिटेरियन दरअसल बिमल चटर्जी ने ही बनाया था। 

नाश्ते के बाद वालिया साहब ने पूछा - "अब तबियत पूरी तरह ठीक है?"

"हाँ, फर्स्ट क्लास...।" मैंने कहा। 

"घर पर बोलकर आये हो ना...?" 

"हाँ....।"

"वापसी की जल्दी तो नहीं है?"

"नहीं...।"

"तो फिर चलें....?"

"कहाँ...?"

"हाईकोर्ट...।"

"हाईकोर्ट...।" मैं बुरी तरह चौंका और याद आया कि आज तो राजहंस और विजय पाकेट बुक्स के मुकदमे की तारीख है। तुरन्त मैं बोला -"हाँ, चलते हैं ना...।"

पहले हम बस से ही पटेलनगर गये। वहाँ भारती साहब पहले से ही तैयार थे। 

समय से पहले ही हम हाईकोर्ट पहुँच गये। वहाँ विजय कुमार मलहोत्रा और उनके साथ कुछ मित्र हमसे भी पहले पहुँचे हुए थे।

मनोज पाकेट बुक्स की ओर से राजकुमार गुप्ता और गौरीशंकर गुप्ता भी थोड़ी देर बाद आ गये। उनके साथ केवलकृष्ण कालिया उर्फ राजहंस भी थे। 

हिन्द पाकेट बुक्स के नुमाइन्दे और उनके वकील एडवोकेट सरदार अनूपसिंह थोड़े-थोड़े समय के अन्तराल में आये। सबसे आखिर में विजय पाकेट बुक्स के वकील एडवोकेट सोमनाथ मरवाहा और अशोक मरवाहा आये। 

आते ही अशोक मरवाहा विजय कुमार मलहोत्रा को एक साइड में ले गये और मुकदमे के बारे में बातें करने लगे।

मुकदमे आरम्भ होने का सही वक़्त याद नहीं, लेकिन ग्यारह बजे के बाद का था। हम सभी पहले से ही अदालत की दर्शक दीर्घा में बैठ गये थे।

मैं, भारती साहब और वालिया साहब एक साथ पीछे की एक पंक्ति में बैठे थे, जबकि विजय कुमार मलहोत्रा, अपने संगी-साथियों और अशोक मरवाहा के साथ अग्रिम पंक्ति में बैठे थे। 

उस दिन सरदार अनूपसिंह और सोमनाथ मरवाहा के बीच की बहस घमासान युद्ध की तरह थी।  

उस दिन सरदार अनूपसिंह ने साबित कर दिया कि मनोज और सूरज वास्तव में मनोज पाकेट बुक्स के और कर्नल रंजीत तथा शेखर हिन्द पाकेट बुक्स के रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क हैं। इनमें एक लम्बे अर्से से मनोज और हिन्द ही पब्लिशिंग मैटर छापते आ रहे हैं। विजय पाकेट बुक्स ने मनोज व हिन्द द्वारा उपन्यासकार राजहंस का उपन्यास प्रकाशित करने की घोषणा के बाद ही व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता के कारण मनोज, सूरज शेखर और कर्नल रंजीत छापने का प्रोग्राम बनाया और देश भर के पुस्तक विक्रेताओं को सर्कुलर भेजा। सरदार अनूपसिंह ने माँग की कि विजय पाकेट बुक्स द्वारा मनोज, सूरज, शेखर और कर्नल रंजीत के उपन्यासों के प्रकाशन पर प्रतिबन्ध लगाया जाये। कोर्ट ने सरदार अनूपसिंह की यह माँग स्वीकार कर ली। 

अब मामला था राजहंस का। 

सरदार अनूपसिंह ने राजहंस के कई उपन्यास प्रस्तुत किये, जिनमें राजहंस का पाठकों के नाम लिखा पत्र भी था और टाइटिल बैक कवर पर फोटो भी थी। सरदार अनूपसिंह ने पुरज़ोर लहज़े और शब्दों में यह दावा किया कि राजहंस उनके क्लाइन्ट केवलकृष्ण कालिया का 'पेननेम' है। लेखक के रूप में उपनाम है। विजय पाकेट बुक्स को इस नाम का दुरूपयोग करने से रोका जाये और विजय पाकेट बुक्स द्वारा राजहंस का नाम प्रयोग करने पर प्रतिबंध लगाया जाये। 

विजय पाकेट बुक्स के एडवोकेट सोमनाथ मरवाहा ने सरदार अनूपसिंह की इन दलीलों का जबरदस्त विरोध किया और बताया कि "राजहंस" वास्तव में विजय पाकेट बुक्स का रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क है और इसका उपयोग वह केवलकृष्ण कालिया के उपन्यास छापने से पहले भी करते रहे हैं। सबूत के तौर पर सोमनाथ मरवाहा ने विजय पाकेट बुक्स में  राजहंस की पहले उपन्यास से दो साल पहले प्रकाशित पाकेट बुक्स दिखाईं। 

अपना डिस्पैच रजिस्टर दिखाया, जिसमें उन किताबों की डिस्पैच की तारीख और वर्ष लिखा था। इसके बाद केवलकृष्ण कालिया के राजहंस नाम से प्रकाशित होने के डिस्पैच की तारीख भी डिस्पैच रजिस्टर में दिखाई। 

सरदार अनूपसिंह और सोमनाथ मरवाहा दोनों ही सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक़्ता थे, दोनों में जबरदस्त गर्मागर्मी वाली बहस चली। 

लेकिन उस दिन कोर्ट किसी नतीजे पर नहीं पहुँची। सुनवाई की अगली तारीख मुकर्रर कर दी गई।

अगली तारीख पर भी कुछ देर वकीलों की बहस की गहमागहमी रही। एडवोकेट सोमनाथ मरवाहा ने विजय पाकेट बुक्स द्वारा विभिन्न पत्रिकाओं में राजहंस का पूरे-पूरे पेज का नियमित रूप से विज्ञापन करने की ढेरों क्लिपिंग दिखाईं। राजहंस के उपन्यास आज जिस तादाद में बिक रहे हैं, उस में विजय पाकेट बुक्स का बहुत बड़ा योगदान है, यह सोमनाथ मरवाहा जी ने साबित कर दिया। 

फिर जस्टिस महोदय ने  दोनों वकीलों को अपने चैम्बर में बुलाया। चैम्बर से निकलने के बाद दोनों वकील गम्भीर थे। 

सरदार अनूपसिंह हिन्द और मनोज वालों की तरफ मुड़ गये। 

सोमनाथ मरवाहा विजय कुमार मलहोत्रा से फुसफुस करने लगे। 

अदालत की कार्यवाही कुछ समय के लिए एडजर्न्ड कर दी गई। 

हम सब अदालत से बाहर आ गये। हमें पीछे ही खड़ा रहने को कह, भारती साहब विजय जी और एडवोकेट सोमनाथ मरवाहा की ओर बढ़ गये। 

थोड़ी देर बाद भारती साहब लौटे और बताया कि दोनों जस्टिस साहब कह रहे हैं कि वे राजहंस नाम पर 'बैन' (प्रतिबन्ध) लगा रहे हैं। ना तो विजय पाकेट बुक्स भविष्य में 'राजहंस' नाम का प्रयोग कर सकेगी और ना ही केवलकृष्ण कालिया भविष्य में 'राजहंस' नाम से अपने उपन्यास प्रकाशित नहीं करवा सकेंगे। 

यह स्थिति दोनों पार्टियों के लिये बड़ी भयंकर थी। वालिया साहब ने पूछा - "नये नाम से लिखने पर केवल को तो बहुत दिक्कत होगी। राजहंस जैसी रिस्पांस तो मिलेगी नहीं। विजय पाकेट बुक्स तो चलो, राजहंस नाम के पुराने उपन्यासों के रिप्रिन्ट करते रहेंगे।"

"उसके लिए भी कोर्ट ने एक रास्ता सुझाया है।" भारती साहब ने कहा। 

"क्या...?" वालिया साहब ने पूछा। 

"आपस में कम्प्रोमाइज़ कर लो। खुद बैठकर लफड़ा सुलझा लो तो राजहंस नाम बचा रहेगा, लेकिन कोर्ट अगर निष्पक्ष निर्णय देगी तो भविष्य में "राजहंस" नाम के प्रयोग पर हमेशा के लिए "बैन" लग जायेगा, क्योंकि अपनी अपनी जगह प्रकाशक और लेखक दोनों ही सही हैं। राजहंस नाम पर पहला हक विजय पाकेट बुक्स है, मगर राजहंस नाम के लिए खून-पसीना केवलकृष्ण कालिया ने बहाया है। किसी एक के पक्ष में निर्णय का मतलब है - दूसरे के साथ अन्याय।"

उसके बाद विजय कुमार मलहोत्रा ने हम लोगों से घर जाने को कह दिया। उन्होंने बताया कि हिन्द, मनोज और राजहंस से दोनों के वकीलों की मौजूदगी में मीटिंग करनी पड़ेगी। कोर्ट को भी कम्प्रोमाइज़ के बारे में बताना होगा। 
वालिया साहब, भारती साहब और मैं तीनों वापस लौट गये। 

उसके बाद कुछ दिन हमारा आपस में मिलना न हुआ। 

फिर एक रविवार के दिन दोपहर को वालिया साहब और भारती साहब मेरे यहाँ आये। 

वालिया साहब स्कूटर पर थे। भारती साहब उनके पीछे बैठे थे। मुझे घर से बाहर बुलाने के बाद, भारती साहब स्कूटर से उतरे और मुझसे बोले - "बैठ।"

मैं बैठ गया तो भारती साहब मेरे पीछे बैठ गये। आज की जेनरेशन के लोगों को बता दूँ - तब न तो हैलमेट जरूरी था, ना ही स्कूटर पर तीन सवारियों के बैठने पर कोई चालान था। 

वालिया साहब ने स्कूटर का रुख अपने घर की ओर मोड़ दिया। 

वालिया साहब के घर पहुँचने पर महफिल जमीं। तब भारती साहब ने बताया कि कम्प्रोमाइज़ हो गया है। कम्प्रोमाइज़ के अनुसार राजहंस और विजय पाकेट बुक्स दोनों ही राजहंस नाम का उपयोग कर सकेंगे, पर विजय पाकेट बुक्स में छपने वाले राजहंस के नये उपन्यास के पीछे कोई तस्वीर नहीं होगी। जबकि केवलकृष्ण कालिया के लिखे उपन्यासों के पीछे उसकी तस्वीर होगी। 

पर विजय पाकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित 'तलाश' उपन्यास पर कोर्ट ने पहले ही प्रतिबन्ध लगा रखा था और वह प्रतिबन्ध हटाने के लिए कोई एप्लीकेशन नहीं डाली गई थी, इसलिए यशपाल वालिया का लिखा "तलाश" उपन्यास बाद में यशपाल वालिया के ही "मीनू वालिया" नाम से रिलीज़ किया। 

बाद में विजय पाकेट बुक्स से राजहंस के कई उपन्यास प्रकाशित किये गये, जो कि हरविन्दर या यशपाल वालिया अथवा किसी अन्य के लिखे हुए थे, पर उनमें से किसी में भी बैक कवर पर केवलकृष्ण कालिया की फोटो नहीं थी। 

हमारे देश के पाठकों में अगर बहुत से बेवकूफ होते हैं तो अक्लमंद पाठकों की भी कमी नहीं। राजहंस पढ़ने वाले पाठक निश्चय ही अक्लमंदों की श्रेणी के थे। उन्हें विजय पाकेट बुक्स के उपन्यासों के बैक कवर पर केवलकृष्ण कालिया की तस्वीर न होने की वजह से जल्दी ही समझ में आने लगा कि वे उपन्यास उनके राजहंस के नहीं हैं। असली राजहंस के नहीं हैं। अत: विजय पाकेट बुक्स के राजहंस की 'सेल' घटने लगी। 

और फिर कलर टीवी और बढ़ते चैनल्स ने पुस्तक व्यवसाय की पीठ पर ऐसा करारा डण्डा मारा कि आज तक पाकेट बुक्स व्यवसाय अपनी अर्थी सम्भाले खिसक रहा है या घिसट रहा है। 

(समाप्त) 

‼️योगेश मित्तल‼️

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शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

राजहंस बनाम विजय पॉकेट बुक्स - 9

जुलाई 16, 2021 0
जस्टिस फौजा सिंह गिल के अल्फ़ाज़ सबके लिए एक झटका थे। जस्टिस महोदय का कहना था -  ट्रेडमार्क किसी कम्पनी द्वारा किसी वस्तु विशेष के लिए अपनी पहचान का ठप्पा लगाने के लिए रजिस्टर्ड किये जाते हैं और एक लेखक कोई वस्तु नहीं होता। 

कोर्ट में दूसरी एप्लीकेशन राजहंस की थी। उनकी ओर से सरदार अनूपसिंह ने पैरवी करते हुए कहा कि राजहंस - केवलकृष्ण कालिया का नाम है। विजय पाकेट बुक्स राजहंस नाम से 'तलाश' उपन्यास प्रकाशित कर रहा है, जो कि केवलकृष्ण कालिया का लिखा नहीं है। विजय पाकेट बुक्स द्वारा राजहंस का नकली उपन्यास 'तलाश' प्रकाशित और वितरित किये जाने पर रोक लगाई जाये। 

विजय पाकेट बुक्स की ओर से राजहंस नाम पर विजय पाकेट बुक्स के स्वामित्व की उनके एडवोकेट सोमनाथ मरवाहा तरह-तरह की दलीलें देते रहे। जिनका जवाब सरदार अनूपसिंह निरन्तर देते रहे। सरदार अनूपसिंह और राजहंस के हक में  जस्टिस महोदय का यह कथन और सोच 'एक लेखक कभी ट्रेडमार्क नहीं हो सकता' उनका पक्ष मजबूत कर रही थी और आखिरकार फैसला राजहंस के पक्ष में ही हुआ। 'तलाश' उपन्यास पर राजहंस को स्टे मिल गया।

उस रोज उससे ज्यादा बहस नहीं चली। 

अगले दिन मैं मेरठ चला गया। मेरठ में तब मेरा बहुत से लोगों से गहरा अपनापन था। 


मेरे अन्दर आदत थी कि मैं एक का काम लेकर जाता था तो भी सबसे "हैलो - हाय - नमस्ते - जयराम जी की" करके ही आता था। 

मेरठ के ओडियन सिनेमा वाली सड़क पर, ओडियन सिनेमा के बाद ईश्वरपुरी का क्षेत्र पूरी तरह प्रकाशकों का गढ़ कहलाता था। 

अन्दर घुसते ही दायें हाथ की ओर सबसे पहला मकान सलेक चन्द जैन का था, जिनके बड़े बेटे अमर चन्द जैन के लिए सलेक चन्द जैन द्वारा खोली गई "अमर पाकेट बुक्स" में मेरे दो सामाजिक  उपन्यास "पापी" और "कलियुग" "प्रणय" नाम से छपे थे। "प्रणय" के बैक कवर में मेरी रंगीन फोटो छपी थी। पर वह किस्सा फिर कभी...। 

सलेक चन्द जैन जी के दूसरे बेटे अरविन्द जैन ने पहले सामने की ही एक बिल्डिंग के अपर फ्लोर को किराये पर लेकर अपना घर अलग बसाया और गली के आखिर में एक बाहरी कमरे को किराये पर लेकर पूजा पाकेट बुक्स खोली थी, किन्तु असली कामयाबी उसे "गौरी पाकेट बुक्स" खोलने पर, "केशव पंडित" रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क में खतौली के राकेश गुप्ता उर्फ राकेश पाठक के उपन्यास छापने पर मिली। पर यह किस्सा भी फिर कभी.. 

ईश्वरपुरी में दूसरा मकान सुमत प्रसाद जैन का था ।  जिनके पुत्रों संजीव जैन, राजीव जैन और पंकज जैन - तीनों से मैं कभी न कभी बेहद करीब रहा हूँ। 

इसके बाद तिलक चन्द जैन का मकान था, जिनके सुपुत्रों राकेश जैन ( धीरज पाकेट बुक्स) और मनेश जैन से मैं जब तक मेरठ जाता रहा, हमेशा मिलकर आता था। 

उसके बाद तब की गंगा पाकेट बुक्स और बाद में दुर्गा पाकेट बुक्स के प्रकाशक सुशील कुमार जैन की बिल्डिंग थीं। उनके बड़े बेटे दीपक जैन से आज भी मेरा सम्पर्क है। 

आगे सड़क के आखिर में बायें मोड़ पर रायल पाकेट बुक्स का आफिस था। उनके मकान में कुछ समय तक मैं किरायेदार भी रहा था। 

आगे महावीर जैन का अनिल पाकेट बुक्स भी आफिस था। वहीं कहीं परशुराम शर्मा और मदन सेन जैन की पारस पाकेट बुक्स भी थी। 

और ईश्वरपुरी से बाहर उसी रोड पर आगे का क्षेत्र हरीनगर कहलाता था। वहाँ पहले सीक्रेट सर्विस पब्लिकेशन का कार्यालय था। बाद में अरुण जैन और मनेश जैन के राधा पाकेट बुक्स, रवि पाकेट बुक्स और धनेन्द्र कुमार जैन के पब्लिकेशन का आफिस था। 

यह सब आपको बताने का कारण यह कि हर पब्लिकेशन में मैं पाँच से बीस मिनट तक लगाकर ही मैं मेरठ से वापस लौटता था। 

कभी-कभी देवीनगर में लक्ष्मी पाकेट बुक्स तथा अन्य स्थानों पर स्थित पाकेट बुक्स पब्लिकेशन्स के आफिस में घूम आता था। मतलब कोई व्यापारिक नहीं था। बस, आदत थी मिलते-जुलते रहने की। हरीनगर में मेरे चार माताओं का घर भी था और देवीनगर में मेरी सबसे बड़ी बहन का। वहाँ भी कुछ घंटे व्यतीत करके ही वापस दिल्ली लौटता था। अत: सुबह का मेरठ गया - रात को ही दिल्ली लौटता था। कई बार बहन या मामाजी के यहाँ रुकना हो जाता तो अगले ही दिन वापस लौटना होता था। 

इस बार जब देवीनगर पहुँचा तो वहाँ लक्ष्मी पाकेट बुक्स के आफिस में पुराने मालिक जंगबहादुर नहीं थे। वहाँ मेरे पुराने प्रकाशक  छीपीवाड़ा स्थित 'ओरियन्टल पाकेट बुक्स' के सतीश जैन उपस्थित थे। सतीश जैन - वही - जो मेरठ के प्रकाशन जगत में "मामा" के नाम से मशहूर थे। मुझे वह "कलाकार" भी कहा करते थे। 

मुझे देखते ही उन्होंने कहा - "कमाल है यार, आज मैं तुम्हें ही याद कर रहा था। तुम्हारे लिए बहुत सारा काम है। यहीं मेरठ रुक जाओ। मेरे घर चलो, वहीं मैं तुम्हारे रहने-खाने-पीने का इन्तजाम कर देता हूँ।"

"रहने की तो कोई समस्या नहीं है। पास की गली में मेरी बड़ी बहन रहती हैं और हरीनगर में मामाजी रहते हैं। वैसे काम क्या है?" मैंने पूछा। 

"यार, चार उपन्यासों में तो दो-दो फार्म बढ़वाने हैं और अगले सैट के चार-पाँच उपन्यास लिखवाने हैं। तुम नहीं आते तो मैं तुम्हें चिट्ठी लिखने वाला था।"

"मेरा पता मालूम था आपको?" मैंने पूछा। 

"नहीं, पता तो नहीं मालूम था, पर तुम्हें कौन नहीं जानता। किसी न किसी से मिल ही जाता।" सतीश जैन ने कहा। 

"पर आज तो मैं घर पर भीड़ बोलकर नहीं आया। अधिक से अधिक उपन्यास का मैटर बढ़ा सकता हूँ।"

"ठीक है। आज एक उपन्यास का मैटर बढ़ा दो। कुछ पेज शुरू में बढ़ा देना, कुछ बीच में और कुछ आखिर में...। जहाँ-जहाँ जैसा तुम ठीक समझो।" सतीश जैन ने उपन्यास मुझे थमा दिया और कहा- "इसके बाद यार दो चार दिन बाद तुम मेरठ आ जाओ। मेरा सारा काम तुम पर ही आश्रित है।" 

मैं उस रोज वहीं रुक गया। रात को अपनी सबसे बड़ी बहन प्रतिमा जैन के यहाँ रुक गया। तब वह देवीनगर में एक मकान के फर्स्ट फ्लोर पर किराये पर रहती थीं। बाद में जीजाजी के रिटायर होने पर उन्होंने नेहरूनगर में अपना मकान ले लिया, अब वह वहीं रहती हैं। 

रात को मैंने मैटर बढ़ा दिया और सुबह जब आफिस खुला तो सतीश जैन को थमा दिया। सुबह-सुबह मैटर मिल जाने से सतीश जैन बहुत खुश हुए और बोले - "अब यार, अभी दिल्ली जाओ या शाम को। आज का दिन तो तुम्हारा खराब होना ही है। एक और नावल में दो फार्म बढ़ा दो, प्लीज़।"

और मेरे अन्दर यह खराब आदत थी कि "ना" करना तो सीखा ही नहीं था तो मैंने भी सोचा कि घर पर यह तो कहा ही मैंने कि मेरठ जा रहा हूँ तो घर में सब समझ जायेंगे कि मैं जीजी के यहाँ रुक गया होऊँगा।  

दरअसल तब मैं लापरवाह भी बहुत था। जहाँ रात हुई, वहीं रात गुज़ार ली। कुछ ऐसी ही आदत थी। घर के लोग चिन्ता करेंगे, यह सोचता भी नहीं था। इस आदत का भी एक किस्सा था, किन्तु वह किस्सा फिर कभी...। 

मैंने बारह-साढ़े बारह बजे तक लक्ष्मी पाकेट बुक्स के आफिस में ही दूसरे उपन्यास के दो फार्म भी बढ़ा दिये तो सतीश जैन बोले - "यार, अभी तो शाम होने में बहुत देर है। एक उपन्यास के दो फार्म और बढ़ा दो।"

दोपहर के लंच के लिए उन्होंने समोसे और चाय वहीं आफिस में मँगवा दिये। वह खुद भी लंच के लिए घर नहीं गये, जबकि रोज घर जाते थे। और तब मोबाइल का जमाना नहीं था और लैण्डलाइन फोन भी हर जगह नहीं होते थे। 

सतीश जैन ने मुझसे एक और उपन्यास के पेज बढ़ाने के लिए कहा तो मुझे लगा - सतीश जैन सही कह रहे हैं। एक और उपन्यास के पेज बढ़ाये जा सकते हैं। 

मैंने फटाफट तीसरे उपन्यास पर नज़र डाली और उसके पेज बढ़ाने में लग गया। उस रोज फटाफट मैटर बढ़ाते हुए साढ़े चार बजे तक मैंने तीसरे उपन्यास के भी दो फार्म बढ़ा दिये तो सतीश जैन हँसते हुए बोले - "कलाकार, अब एक उपन्यास के दो फार्म और बढ़ाने हैं। एक किताब के लिए मुझे तुम दूसरे लेखक के पास दौड़ाओ। यह कोई अच्छी बात नहीं है।" और सतीश जैन अपनेपन से मेरा दायाँ कन्धा दबाने लगे। 

"यह क्या कर रहे हो?" मैंने कहा तो हँसते हुए सतीश जैन ने कहा -  "हाथ दुख रहा हो। कन्धे दर्द कर रहे हों तो मैं दबा देता हूँ। पर  यार, अब अधूरा काम छोड़ कर मत जाओ।"

अगर मैं कहूँ कि सतीश जैन उर्फ़ मामा मेरठ के सभी प्रकाशकों से बेहतर हों न हों, उनकी वाणी में गज़ब की मिठास थी। किसी की 'ना' को 'हाँ' में बदलवाने का उनका 'हुनर और फन' लाजवाब था। 

मैंने चौथे उपन्यास को भी पढ़ना आरम्भ कर दिया। और उस दिन भी मुझे रात को मेरठ में अपनी बहन के यहाँ ही रुकना पड़ा, क्योंकि उस उपन्यास के पूरे पेज मैं उसी दिन बढ़ा नहीं सका था। 

रात को बहन के घर गया तो कसकर डाँट पड़ी -"दोपहर को खाना खाने क्यों नहीं आया? तेरे लिए खाना बनाया था मैंने।"

जब मैंने बताया कि मैं गली के बाहर ही लक्ष्मी पाकेट बुक्स के आफिस में था तो दोबारा डाँट पड़ी कि बता दिया होता तो किसी को भेजकर तुझे बुलवा लेती या खाना वहीं भिजवा देती।"

पर रात को जीजी ने मुझे ताजा खाना ही खिलाया। 

अगले दिन चौथे उपन्यास के पेज भी पूरे करके दे दिये। सतीश जैन ने मुझे मेरा पारिश्रमिक तत्काल दे दिया।

उस जमाने के जो लेखक, प्रकाशक या पाठक आज भी मौजूद हैं, उन्हें याद होगा कि आरम्भ में उपन्यास एक सौ अट्ठाइस पेज अर्थात आठ फार्म के होते थे, फिर नौ या दस फार्म के होने लगे। उसके बाद 192 पेज यानि बारह फार्म और फिर जमाना आया 240 पेजों अर्थात पन्द्रह फार्म का। 

कुछ प्रकाशक जो लेखकों का पैसा बचाना चाहते थे। वो अक्सर अपने ही यहाँ नकली नामों या ट्रेड नामों से छपे पुराने उपन्यासों में मेरे जैसे किसी लेखक से आगे पीछे और बीच में कुछ-कुछ पेज बढ़वाकर किसी नये या उस समय चल रहे नाम से छाप देते थे। 

इस तरह उपन्यास बिल्कुल नया बन जाता था और उसके पेज किसी एक्सपर्ट लेखक द्वारा बढ़ाये गये होते तो पूर्व में किसी लेखक द्वारा लिखा घटिया उपन्यास भी बढ़िया बन जाता था और प्रकाशक के पैसे भी बहुत ज्यादा बच जाते थे। 

बहुत बार पाठक भी यह बात पकड़ नहीं पाते थे। उन्हें यह तो लगता कि उस जैसी कोई कहानी पहले भी पढ़ी है, पर वह उपन्यास उन्हें नया ही लगता था। 

कई बार प्रकाशक उपन्यास के भीतरी पात्रों के नाम भी बदल देते थे और इस तरह पुराने उपन्यास को नये कलेवर में पेश कर पाठकों को एक तरह से बेहतरीन ढंग से ठगा करते थे। 

उस दिन शाम को जब मैं दिल्ली स्थित अपने घर पहुँचा, मम्मी पिताजी ने यही कहा कि मेरठ में ही रुकना था तो कम से कम पहले बता के तो जाता। 

इसका कारण था पहले एक बार ऐसा हुआ था, जब हमारा आधा परिवार गाँधीनगर था और रमेशनगर में मम्मी-पिताजी रहते थे, तब एक बार मैं चार दिनों तक घर नहीं पहुँचा था, ना गाँधीनगर, न रमेशनगर और फिर चौथे दिन रमेशनगर में मम्मी-पिताजी पुलिस में रिपोर्ट करने वाले थे, तभी मैं रमेशनगर पहुँच गया था। पर वह किस्सा फिर कभी...। 

अगले दिन मैं वालिया साहब के यहाँ जाने ही वाला था कि वह आ गये। वह अपने वेस्पा स्कूटर पर थे। स्कूटर पर बैठे-बैठे ही मुझे आवाज दी। 

मैं बाहर आया तो नाराजगी जताई - "कहाँ थे दो दिन?"

"मेरठ गया था। मैंने भारती साहब को बताया था।" मैंने कहा। 

"मुझे भी बताकर जाना था ना।"

"अगली बार ध्यान रखूँगा... Sorry.।" मैंने मुस्कुराते हुए ड्रामेटिक अन्दाज़ में अपने दोनों कान पकड़े। 

"ठीक है... ठीक है। माफ किया।" वालिया साहब बोले और स्कूटर पर बैठने का इशारा किया। 

हम बालीनगर वालिया साहब के यहाँ पहुँचे तो मीना भाभी बोलीं - "योगेश जी, आप रोज सुबह यहाँ आ जाया करो। वालिया साहब कहते हैं - योगेश बहुत कमज़ोर है। उसे रोज सुबह दो अण्डे खाने चाहिये और आपके घर तो अण्डे खाये नहीं जाते।"

हाँ, तब हमारे यहाँ अण्डे नहीं खाये जाते थे। मेरी माताजी के जीवित रहते,  हमारे घर अण्डों का उपयोग लगभग नहीं ही हुआ। उनके स्वर्गवास के बाद ही हमारे घर अण्डों और आमलेट का सेवन आरम्भ हुआ। 

जब तक वालिया साहब बालीनगर रहे, अक्सर मेरा सुबह का नाश्ता उनके यहाँ होता था और नाश्ते में अण्डे किसी न किसी रूप में अवश्य होते थे। चाहें बायल्ड अण्डे हों या हाफ फ्राई अथवा फ्राइड आमलेट। 

नाश्ता करते-करते विजय पाकेट बुक्स की बातें आरम्भ हो गईं। वालिया साहब ने बताया कि इस बार मुकदमे की लम्बी तारीख पड़ी है। पिछली पेशी पर कोर्ट ने विजय पाकेट बुक्स द्वारा छापी गईं मनोज और सूरज की किताबों की बिक्री पर भी रोक लगा दी और विजय पाकेट बुक्स को कर्नल रंजीत और शेखर के उपन्यास छापने से भी रोक दिया है। 

"तब तो विजय बाबू ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन और दरीबे से राजहंस और मनोज व सूरज का सारा माल वापस मँगवा  लिया होगा?"

"न केवल मँगवा लिया, बल्कि उनके टाइटिल कवर और आरम्भ के चार पेज भी फड़वा दिये हैं, क्योंकि स्टे मिलने के बाद राजहंस और मनोज पाकेट बुक्स वाले अगर यह आरोप लगाकर कि विजय बाबू चोरी-छिपे राजहंस, मनोज और सूरज का माल बेच रहे हैं, अगर छापा पड़वा भी दें तो पुलिस को कुछ न मिले।"

कानून के दाँव पेंचों में बहुत छोटी छोटी लगने वाली बातें भी बड़ा महत्त्व रखती हैं। वालिया साहब द्वारा बताई बातों से मुझे यह सब समझ में आने लगा था। 

मैंने निश्चय किया कि अगली पेशी में मैं भी हाइकोर्ट जाऊँगा। कम से कम यह तो पता चलेगा कि ट्रेडमार्क पर कोर्ट का फाइनल स्टैण्ड क्या है और राजहंस नाम किसे मिलता है। ट्रेडमार्क का स्वामित्व रखने वाले को या राजहंस ट्रेडमार्क के लिए लिखने और बैक कवर पर अपनी फोटो छपवाने वाले केवलकृष्ण कालिया को.....। 

(शेष फिर) 

‼️योगेश मित्तल‼️

अगली और आखिरी किश्त के लिए थोड़ा इन्तजार और करें...। 

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