प्रतिध्वनि: कविता

कविता, कहानी, संस्मरण अक्सर लेखक के मन की आवाज की प्रतिध्वनि ही होती है जो उसके समाज रुपी दीवार से टकराकर कागज पर उकेरी जाती है। यह कोना उन्हीं प्रतिध्वनियों को दर्ज करने की जगह है।

सोमवार, 29 नवंबर 2021

टमाटर | हिंदी कविता | योगेश मित्तल

नवंबर 29, 2021 0

Image by Ernesto Rodriguez from Pixabay

 तेरे घर टमाटर, 

मेरे घर टमाटर, 

पड़ोसी के घर पर 

टमाटर नहीं है। 


पुलिस सूंघती 

आ गई घर हमारे। 

बताओ कहाँ से

टमाटर हैं मारे? 

हुए मंहगे इतने

गरीब रो रहे हैं। 

मिडिल क्लास भी

अब हुए हैं बेचारे।  


नम्बर दो का पैसा

कहाँ है छुपाया? 

लगता है वो सब

यहाँ पर नहीं है।  

तेरे घर टमाटर, 

तेरे घर टमाटर। 

पड़ोसी के घर पर 

टमाटर नहीं है। 


पुलिस वाले ने

एक डण्डा घुमाया। 

बता दे टमाटर

कहाँ से है आया? 

मना मेरी बीवी ने

मुझसे किया तो

हफ्ते से घर पर

टमाटर न लाया।


मैं जिस घर गया

तो वहाँ ये ही देखा! 

टमाटर यहाँ या 

वहाँ पर नहीं है।  

तेरे घर टमाटर

तेरे घर टमाटर

पड़ोसी के घर पर

टमाटर नहीं है। 


योगेश मित्तल

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मंगलवार, 23 नवंबर 2021

हम भी मुन्तज़िर हैं | योगेश मित्तल | हिन्दी कविता

नवंबर 23, 2021 0




हैं अगर अपने भी यदि नाराज़ तो,

और गुस्सा है जो दिल में आज तो। 


किसलिये, क्यों कर रहूँ उदास मैं, 

क्यों न रखूँ - नव खुशी की आस मैं। 


वो गले मिलते किसी भी मीत को, 

मुझको न चाहें - न मेरे गीत को। 


मैं भला शिकवा किसी से क्यों करूँ, 

उनसे ही कहते, भला मैं क्यों डरूँ?


वो अगर नाराज़ हैं, रह लें अभी, 

हम भी मुन्तज़िर हैं, वो मानेंगे कभी। 


योगेश मित्तल

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सोमवार, 27 सितंबर 2021

कचरे के डिब्बे में डालो | हिंदी कविता | योगेश मित्तल

सितंबर 27, 2021 0
Image by 👀 Mabel Amber, who will one day from Pixabay 


मुर्दों  का  जो  माँस नोचकर, 

हलवा     पूड़ी      खाते      हैं! 

खुद  को  धर्मात्मा  कहते  हैं, 

और     बाबा    कहलाते     हैं! 


गिरगिट   जैसे   रंग   बदलते, 

करते   रहते    जर्नी   -   यात्रा! 

दस प्रतिशत सच में जो मिलाते

नब्बे  प्रतिशत  झूठ  की  मात्रा! 


उन   मीठे  -  मीठे   लोगों   से 

शूगर   जैसा    रोग   न   पालो!

बीमारी   के    सभी   कीटाणु, 

कचरे   के    डिब्बे    में   डालो! 


योगेश मित्तल

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गुरुवार, 16 सितंबर 2021

इकलौते पजामे का फटना | योगेश मित्तल | हास्य कविता

सितंबर 16, 2021 2

स्रोत: पिक्साबे

 


फटा पजामा देखके, मैडम गईं घबराय। 

बोलीं, कम्बख्तों के पिता, कहाँ फाड़ के लाय? 


कहाँ फाड़ के लाय, दूसरा नहीं पजामा। 

अब क्या चड्ढी में घूमोगे, बन के गामा? 


कह योगेश कविराय, हो गई मुश्किल भारी। 

पजामा क्या फटा, लग गई क्लास हमारी। 


कैसे फटा, कहाँ पर फाड़ा, किसने फाड़ा? 

बजा कानों में, प्रश्नों का, पुरजोर नगाड़ा।


क्या बतलायें फटने की दुख भरी कहानी। 

पतले से मोटे होने की है, ये कारस्तानी।


पहले पजामे में अक्सर दौड़ लगाते। 

अब मुश्किल है, जरा भी ढंग से, बैठ न पाते। 


एक एक करके, बदल गये हैं सारे कपड़े। 

मगर पजामा सालों से, हम एक ही पकड़े। 


आखिर कब तक - साथ निभाता एक पजामा। 

अब क्या पहनूँ - तुम्हीं बता दो मेरे रामा? 


- योगेश मित्तल

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मंगलवार, 14 सितंबर 2021

हिन्दी के दोषी | योगेश मित्तल | हिंदी कविता

सितंबर 14, 2021 0
हिन्दी के दोषी | योगेश मित्तल | हिन्दी कविता
Image by Harish Sharma from Pixabay


आज हिन्दी रो रही है, अपने मान के लिए।

दोषी कवि लेखक हैं इस अपमान के लिए। 


कवियों की मूर्खताओं से हिन्दी हुई बीमार। 

लेखकों ने भी किया है - हिन्दी को शर्मसार। 


मेरी को मिरी लिखते हिन्दी गजल में ये। 

तेरी को तिरी लिखते हिन्दी गजल में ये।


मैं भी अक्सर लिखता - गंवार को जाहिल। 

सुस्ती दिखाने वाले को लिखा मैंने काहिल।


मैं भी सभी सा दोषी हूँ - हिन्दी के लिए। 

हिन्दी की हो रही चिन्दी-चिन्दी के लिए। 


खुद को सभी बदल सकें तो धन्य होगी हिन्दी। 

दुनिया की हरेक भाषा से अनन्य होगी हिन्दी। 


योगेश मित्तल

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मंगलवार, 31 अगस्त 2021

सच्चाई मेरा नाम है | योगेश मित्तल | हिन्दी कविता

अगस्त 31, 2021 0
Image by Arek Socha from Pixabay


जिस तरफ भी मैं चलूँगा, 

तुम   मेरे    पीछे    चलोगे। 

रुक गये तो सोच लो तुम

खुद को खुद से ही छलोगे।


रास्ते    हों    टेढ़े  -  मेढ़े, 

फिर भी चलता जाऊँगा मैं। 

ऊबड़ खाबड़ राह पर भी, 

हँस  - निकलता जाऊँगा मैं।


गाँधी   जैसे   पाँव   मेरे, 

नेहरू    जैसा    ओज    है। 

जिद्द है  -  बढ़ते रहने की

बाकी   सब   तो  मौज   है।


मैं पथिक हूँ, यायावर हूँ, 

मस्त      बंजारा     हूँ      मैं। 

फांकता      हूँ       धूल

गलियों-गलियों का मारा हूँ मैं।


मैं  मुसाफिर  हूँ  सदी  का, 

आगे    बढ़ता    जाऊँगा   मैं। 

आँख  के  अन्धों  को  भी, 

अब   राह   दिखलाऊँगा   मैं। 


मेरे   पीछे   जो   चलेगा, 

रास्ता       मिल       जायेगा। 

खुश रहेगा, वो सदा और

फूल - सा    खिल    जायेगा। 


लोग   सच   कहते   मुझे, 

सच्चाई    मेरा     नाम     है। 

पाँव    तोड़ूँ    झूठ    के, 

बस,  ये  ही   मेरा  काम  है। 


योगेश मित्तल

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रविवार, 29 अगस्त 2021

बीवी का नौकर | हिन्दी कविता | योगेश मित्तल

अगस्त 29, 2021 2
Image by Thomas G. from Pixabay


आलू लाना, अदरक लाना, 

और ले आना प्याज़। 

बीवी ने समझाये हमको, 

घर-गृहस्थी के काज़। 


घर से सीधा बाज़ार जाना, 

बाज़ार से घर आना। 

बीच राह में मिले, जो कोई, 

हरगिज़ नहीं बतियाना। 


पैसे गिन कर देना-लेना, 

नहीं  छोड़ना  एक  भी  पैसा। 

धनिया-मिर्ची मुफ्त माँगना, 

चाहें  दुकानदार  हो  कैसा।


एक किलो ले लेना टमाटर, 

सख्त सख्त और लाल लाल हों। 

सब्जी सारी ताजी लाना, 

सड़ा या बासी नहीं माल हो। 


बैंगन  लेना  लम्बे  मोटे, 

नीबू  रस  से  भरे  और छोटे। 

पैसे जब वापस लो, देखना, 

पकड़ा न दे कोई सिक्के खोटे। 


आधा किलो भिन्डी ले आना, 

शलजम मूली भूल ना जाना। 

दो तीन सस्ते फल भी देखना, 

और ले आना, मकई का दाना। 


एक गड्डी पालक की लेना, 

मेथी  ले  लेना  -  दो  गड्डी। 

मोल भाव भी जमकर करना, 

कहीं न रहना, जरा फिसड्डी। 


रस्ते में दिखे कोई पड़ोसन, 

झट से आगे तुम बढ़ जाना। 

भूले से भी बात न करना, 

दोबारा   न  पड़े  समझाना। 


जाओ फटाफट, जल्दी आना, 

एक  मिनट  भी  नहीं  गँवाना। 

घर  के  बहुत  काम  बाकी है, 

रुककर  कहीं  नहीं  सुस्ताना। 


करता सभी काम बीवी के, 

चाहें  हँसकर, चाहें  रोकर। 

इकलौती  बीवी  है  मेरी, 

मैं उसका  इकलौता नौकर। 


योगेश मित्तल

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सोमवार, 16 अगस्त 2021

मेरी आजादी | योगेश मित्तल | हिन्दी कविता

अगस्त 16, 2021 2
मेरी आजादी | योगेश मित्तल | हिन्दी कविता
Image by motionstock from Pixabay


आँखों  में  दहशत  के  साये, 

डर  है  ये   किस  बरबादी   का। 

जाने  क्यों  अब  फीका  सा  है

यह  जश्न   मेरी   आजादी   का। 


कोई खुलकर बात नहीं करता, 

कोई खुलकर नहीं अब मुस्काता। 

मैं  हंसना  भी  यदि  चाहूँ  तो, 

जाने    क्यों    रोना    है   आता।


रिश्ते नातों में कुछ पता नहीं, 

कौन अपना है - कौन है दुश्मन?

अब यारी में भी सियासत है, 

पार्टी - पार्टी  के  हो रहे हैं  मन।


भूखी  जनता  लगती  झूठी, 

लगें   उनके   आँसू   घड़ियाली। 

सूरज की आँखें -  फूट गईं, 

है  बलात्कारी,  हर  रात काली। 


सांसें   लेना   अपराध   हुआ, 

जीना   फांसी   का   फन्दा   है। 

मैं सच को अगर सच कह दूँ तो, 

सब  कहते  हैं - यह  अन्धा  है।


आँखों   वालों   की   दुनिया में, 

हर   तरफ  अन्धेरा   फैला   है। 

क्यों  मेरी  आजादी  घायल  है, 

क्यों   मेरा   झण्डा   मैला   है? 


- योगेश मित्तल

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शुक्रवार, 13 अगस्त 2021

वो कल्पना थी | योगेश मित्तल | हिंदी कविता

अगस्त 13, 2021 2
वो कल्पना थी | योगेश मित्तल | हिंदी कविता
स्रोत: पिकसाबे



 वो ही थी मेरी एक कविता, 

मैं था - उसकी  एक  कहानी। 

दर्द - दर्द  था  मेरा  किस्सा, 

वो  खुश्बू  की   रात  सुहानी। 



उसकी आँखें जब खुलती थीं, 

सूरज सिर पर  आ जाता था। 

पलकें जब मुंद जाती उसकी, 

चांद  छिपा  भी, मुस्काता था। 



फूल  हमेशा  खिल  जाते  थे, 

जब बगिया में,  वो आती थी। 

भंवरे गुन - गुन - गुन गाते थे, 

जब वो खुलकर मुस्काती थी। 



मोती  चमक-दमक  जाते थे, 

जब वो हँसकर- बातें करती। 

कदम जहाँ पर पड़ते उसके, 

हरी - भरी  हो  जाती  धरती। 



मेरे  मन  की  वीणा  थी  वो, 

सात सुरों की थी  वो सरगम। 

उसके  बिना  अधूरा  हूँ  मैं, 

किसे सुनाऊँ अपना यह गम। 



ज्यों चन्दा की ज्योति खो गई, 

ज्यों सूरज भी अस्त हो गया। 

वैसे  ही   टूटा   मेरा   सपना, 

मनमोहक वो अक्स खो गया।


योगेश मित्तल

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बुधवार, 21 जुलाई 2021

बरसो बारिश, बरसो बारिश | हिंदी कविता | योगेश मित्तल

जुलाई 21, 2021 4
बरसो बारिश, बरसो बारिश | हिंदी कविता | योगेश मित्तल
Image by Free-Photos from Pixabay


 बरसो बारिश, बरसो बारिश।


गरम गरम धरती की साँसें, बरस-बरस कर ठंडी कर दो।

सूखी धरती के सीने में, प्रेम-बूंदों से दरिया भर दो।

खूब नहाऊँ  मैं बारिश में, मिट जाए तन-मन की खारिश।


बरसो बारिश, बरसो बारिश।

लेकिन ऐसी अनहोनी क्यों, कहीं बाढ़-सैलाब आ रहा।

जिंदा लोगों के सपनों में, मरने का ही ख्वाब आ रहा।

दुखियों का दुःख दूर करो, करो खुशी की सब पर मालिश।


बरसो बारिश, बरसो बारिश


-योगेश मित्तल

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मंगलवार, 6 जुलाई 2021

पटाक्षेप होने वाला है.. | योगेश मित्तल | हिन्दी कविता

जुलाई 06, 2021 4

 दोस्तों, कविता किसी की मानसिक स्थिति की परिचायक नहीं होती, कभी-कभी किसी और के एहसास भी कवि अपने शब्दों में लिख देता है। उदास कविताओं से यह न समझिये कि मैं निराशावादी हूँ। मैं बहुत खुशमिजाज मस्तमौला प्रवृत्ति का हूँ, पर लेखन अक्सर दूसरों के चेहरों में डूब कर करता हूँ तो ऐसी पंक्तियाँ भी सृजित हो जाती हैं। 


***************

पन्ना - पन्ना  भीग  गया  है, 

धूमिल  हो  गये,  सारे  अक्षर। 

कुछ भी नहीं रहा जीवन में,

कहाँ जाऊँ बोलो - घबरा कर। 


जीवन की हर जिल्द फटी है, 

तहस - नहस  हैं  बाग  बगीचे। 

झूठी  आशा  में  ज़िन्दा  हूँ

कोई  तो  मीठे  बोल  से सींचे।


चाहें  वो  हों - नीम - करेले, 

पर  अपने  ही  साथी  तो  हों।

जीवन को जो रोशन कर दे, 

ऐसी  दीये  की  बाती  तो  हों।


मिला  नहीं,  जो  चाहा  मैंने, 

फिर  भी  हरदम  मुस्काया हूँ। 

गम पाया, पर खुशियाँ बांटीं, 

मत  समझो  कि  पगलाया हूँ। 


सोचा, कभी तो दिन बदलेंगे, 

सांई   सबका   रखवाला   है। 

पर  जीवन  की रात हो गई, 

पटाक्षेप    होने     वाला    है। 


योगेश मित्तल

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रविवार, 4 जुलाई 2021

तुमसे है सवाल | योगेश मित्तल | हिन्दी कविता

जुलाई 04, 2021 2

मेरी   जुबान   का    सच, 

बहुत कड़वा है, यह माना। 

मगर दिल चांदी जैसा है, 

ये तुमने  क्यों  नहीं जाना। 


तुम्हारे   पास   रहते   हैं, 

बहुत  मीठी   जुबां  वाले। 

नीयत में खोट रखते हैं, 

दिलों में छुरियाँ और भाले।


मुहब्बत क्यों है साँपों से, 

बताओ  क्या   है  लाचारी।

समन्दर जैसी आँखों  में, 

बसे    हैं   क्यों   दुराचारी? 


योगेश मित्तल

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बुधवार, 16 जून 2021

उलटी गिनती | योगेश मित्तल | हिन्दी कविता

जून 16, 2021 0

  जीवन तो है - उलटी गिनती, 

  शुरू - जन्मते  ही   होती  है।

  थाली की जो टनटन बजती, 

  अर्थी  पर  जाकर  सोती  है। 


हरेक जन्मदिन पर, जीवन की,

अनगिन  साँसे   कम  हो  जातीं।

लेकिन  दुनिया  जन्मदिन  पर, 

केक   काटती,   मौज़   मनाती।


पैदा    होते    ही    पैसा    भी, 

रोज़  नया  एक  खेल  दिखाता। 

कभी खाक को,  लाख बनाता, 

कभी  लाख  ज़ीरो  कर  जाता। 


जीवन का हर पल  नसीब की, 

इधर   उधर  -  चादर  फैलाता। 

उठते  को  यदि  चित्त  गिराता, 

गिरे   हुए  का   भाग्य   बनाता। 


रिश्तों का प्रेम और झगड़ा भी, 

कभी  रुलाता  -  कभी  हँसाता। 

सच,  ईमान,  वफा  वाला  भी, 

अपनों   से   है   ठोकर   खाता। 


यारों, ये  है - झूठ  की  दुनिया, 

यहाँ    बेइमानी     जिन्दा    है। 

सदा   भलाई   करने   वाला, 

बुरों  के  सम्मुख    शर्मिन्दा  है।


अच्छा सोचो - अच्छा कर लो, 

अच्छाई    से     नाता    जोड़ो। 

हर  बुराई   उलटी   गिनती  है, 

हर   बुराई  से  -  नाता   तोड़ो। 


पाप और जुर्म सदा विवेक के, 

होते    हरदम    दुश्मन   भारी। 

शुद्ध मन से लो साँस यदि तुम, 

डरा  न  पाये,  मृत्यु -  बीमारी। 


हर क्षण एक साँस कम होती, 

जीवन  कम   होता  जाता  है। 

सदुपयोग कर लो जीवन का, 

देखो,  शून्य  निकट आता  है। 

- योगेश मित्तल 

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नारे ही नारे | योगेश मित्तल | हिन्दी कविता

जून 16, 2021 1

 नेहरू जी  का  एक  था  नारा, 

आराम          है            हराम! 

असल   में   वो  भी  करते  थे, 

चौबीस         घण्टों        काम! 


जय  जवान- जय  किसान  की, 

भरी    शास्त्री   जी   ने   हुंकार! 

असली   गाँधीवादी   वही   थे, 

सादा    जीवन  -  उच्च  विचार! 


इन्दिरा जी  कहती थीं  हमेशा, 

काम    ज्यादा   -   बातें   कम! 

अपने खून का  कतरा-कतरा, 

बहा  देश  के लिये,  तोड़ा  दम! 


और  योगेश मित्तल  का  नारा, 

बिना   बात    मुस्काना   सीखो! 

जीवन  के   तनावों  को  त्यागो, 

हरदम  हँसना  -  गाना  सीखो! 

योगेश मित्तल

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बुधवार, 9 जून 2021

हम प्यार सभी पे लुटाते हैं | हिन्दी कविता | योगेश मित्तल

जून 09, 2021 0
  
हम प्यार सभी पे लुटाते हैं | हिन्दी कविता | योगेश मित्तल


हम  मस्त हवा  के झोंके हैं,
खुशबू  बन कर  छा जाते हैं।
जब-जब जिन राहों से गुजरे,
उन  राहों  को   महकाते  हैं।

जब कोई दुखी हो रोता हो, 
आँसू  उसके   पी  जाते  हैं।
दुःख की अग्नि में ठंडक से 
हम उसका दिल बहलाते हैं ।

जब नींद उड़ी हो आँखों से, 
थपकी दे, हम ही सुलाते हैं।
और हर झपकी में कई-कई 
मीठे  से  ख्वाब  दिखाते हैं।

नफरत में जलते लोगों को, 
हम प्रेम का पाठ  पढ़ाते हैं।
कोई हमसे प्यार करे ना करे, 
हम प्यार सभी पे लुटाते हैं।

योगेश मित्तल
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मंगलवार, 8 जून 2021

धरती माँ ने पकड़े कान | हिन्दी कविता | योगेश मित्तल

जून 08, 2021 0

Image by Steve Watts from Pixabay



धरती माँ ने पकडे कान,
काहे पैदा किया इंसान! 

भाई से भाई लड़ता है,
बेटा बाप पे अकड़ता है!
धन-दौलत की खातिर इन्सां,
अपनों के सीने चढ़ता है! 


बेटी बिके बाज़ारों में,
ठगी भरी व्यापारों में!
नेता रीढ़विहीन हो गए,
जनता पिसती नारों में! 


कोई भेड़िया, कोई सूअर है,
नहीं कोई इनमें इंसान!
धरती माँ ने पकड़े कान,
काहे पैदा किया इंसान! 


अपने सीने पर मैंने
इन्सां को दिया बसेरा है!
अपने स्वार्थ के लिए इसी ने
मेरा सीना चीरा है! 


इन्सां होकर भी ये इन्सां,
इन्सां का खून बहाता है!
फिर भी जाने क्यों यह इन्सां,
इन्सां ही कहलाता है! 


एक दिन खुद ये इंसानों से,
कर देगा मुझको वीरान!|
धरती माँ ने पकडे कान,
काहे पैदा किया इंसान! 


कभी कहीं पर, कभी कहीं पर,
बम से खेल रहा है होली!
जगह-जगह बमबारी करके
फाड़ रहा है मेरी चोली! 


मैंने इसे दिया है पानी,
मैंने इसे दिया है खाना,
इसने शुरू किया है मुझ पर
हिंसा का तांडव फैलाना! 


लगता है ये इन्सां एक दिन
मेरी भी ले लेगा जान,
धरती माँ ने पकडे कान,
काहे पैदा किया इंसान! 


लूट-डकैती मार-काट,
चाकू-छुरियाँ, बम और गोली!
क्या इसको बस यही याद है,
भूल गया है मीठी बोली! 


बात-बात पर लड़ने वाला,
बिना बात झगड़ने वाला!
जाति-पाति और ऊँच-नीच की
रोज़ सीढ़ियाँ चढ़ने वाला! 


प्रेम-प्रीत और सत्य अहिंसा
का यह भूल गया है ज्ञान!
धरती माँ ने पकडे कान,
काहे पैदा किया इंसान! 


- योगेश मित्तल

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रविवार, 23 मई 2021

कमबख्त दर्द - योगेश मित्तल | हिन्दी कविता

मई 23, 2021 0
 
Image by PublicDomainPictures</a> from Pixabay


फिर  दर्द  उभर  कर  यूँ  आया, 
और  बोला - तुझे  ले  जाऊँगा। 
मैं  भी  कुछ   ज्यादा  जिद्दी  हूँ, 
बोला  -  मैं   तो  नहीं  आऊँगा। 

वो  ढीठ  घुस  गया  यूँ  सिर में, 
जैसे - तबला  उसे  बजाना  है। 
मै  बोला  -  यहीं  रह  ले  बेटे, 
तुझे जब तक साथ निभाना है। 

कुछ दिन मेरे सिर में जालिम, 
बिस्तर  ही  लगाकर  बैठ गया। 
उस दर्द की इस कम्बख्ती पर, 
मैं   भी   गुस्से   से   ऐंठ   गया। 

मै  लगा  टहलने  घर  में  ही, 
इस  कोने से - उस  कोने  तक। 
मेरे कान पे जब जूं ही न रेंगी,
वो 'दर्द' लगा रोने  फक - फक। 

आखिर  उसने  ही  जोड़े  हाथ, 
बोला  मुझसे  -  मैं   जाता   हूँ। 
मेरा  कोई  भाई, न आये इधर, 
सब   भाइयों  को  समझाता हूँ। 

-योगेश मित्तल
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रविवार, 25 अप्रैल 2021

कोरोना की.... शरारत | हिन्दी कविता | योगेश मित्तल

अप्रैल 25, 2021 0
कोरोना... की शरारत | हिन्दी कविता | योगेश मित्तल
Image by Jeyaratnam Caniceus from Pixabay


जीवन की हरएक शाम, 
शतरंज  की  बाजी  थी। 
मैं  हार  के  खुश  होता, 
तुम  जीत  में  राजी थीं।

अक्सर  हम  लड़ते भी, 
फिर  मान  भी जाते  थे। 
मन   की   सभी   गाँठें, 
हम प्यार से सुलझाते थे। 

दिन  यूँ  ही  गुजरते  रहे, 
वक़्त बहता रहा पल-पल। 
रहते  थे  हम  दोनों  ही, 
एक-दूजे  के  लिए पागल। 

जब   से  कोरोना  आया, 
बिगड़ी  है  सबकी हालत।
कुदरत  का  यह  कहर है,
या ईश्वर की कोई शरारत। 

- योगेश मित्तल
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गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

बहुत हैं | हिन्दी कविता | योगेश मित्तल

अप्रैल 01, 2021 0
बहुत हैं | हिन्दी कविता | योगेश मित्तल
Image by JL G from Pixabay


मेरे   घर   बिना  बुलाये, 
मेहमान      बहुत     हैं! 
पर भीड़ में भी घर मेरा, 
वीरान      बहुत       है! 

जो  दोस्त  हैं,  वो  सारे, 
अनजान    बहुत      हैं! 
मुझ पर जो थोपे गये हैं, 
इल्ज़ाम     बहुत      हैं! 

तेरे    दिये    दागों    के 
निशान       बहुत      हैं! 
तुझे  प्यार  करने  वाले, 
नादान      बहुत       हैं! 

  योगेश मित्तल
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शनिवार, 20 मार्च 2021

उम्र से कोई बूढ़ा नहीं होता...! | हिन्दी कविता | योगेश मित्तल

मार्च 20, 2021 0

बालों की सफेदी से - कोई बूढ़ा नहीं होता, 
ये  उम्र  किसी  दौर  का  अन्दाज़  नहीं  है! 
दिल जिन्दादिल हो और मुहब्बत में रवाँ हो,
क्या फर्क, जो कल था, मगर आज नहीं है!

बढ़ने से सालों साल कोई बूढ़ा नहीं होता, 
जीना लगे मुश्किल तो ही आता है बुढ़ापा! 
वरना तो साठवें में, हो जाता है बच्चा-सा, 
गाता है - सा-सा रे-रे गा-गा मा-मा पा-पा!

साँसों  में  जिसकी,  सरगम  सी  खनक  हो, 
नजाकत भरे अन्दाज़ में फूलों की लचक हो! 
वो  शख्स  कभी  भी - बूढ़ा  नहीं  होता, 
जिस दिल में हो शोखी, आँखों में चमक हो!

योगेश मित्तल
©योगेश मित्तल
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