इकलौते पजामे का फटना | योगेश मित्तल | हास्य कविता - प्रतिध्वनि

कविता, कहानी, संस्मरण अक्सर लेखक के मन की आवाज की प्रतिध्वनि ही होती है जो उसके समाज रुपी दीवार से टकराकर कागज पर उकेरी जाती है। यह कोना उन्हीं प्रतिध्वनियों को दर्ज करने की जगह है।

गुरुवार, 16 सितंबर 2021

इकलौते पजामे का फटना | योगेश मित्तल | हास्य कविता

स्रोत: पिक्साबे

 


फटा पजामा देखके, मैडम गईं घबराय। 

बोलीं, कम्बख्तों के पिता, कहाँ फाड़ के लाय? 


कहाँ फाड़ के लाय, दूसरा नहीं पजामा। 

अब क्या चड्ढी में घूमोगे, बन के गामा? 


कह योगेश कविराय, हो गई मुश्किल भारी। 

पजामा क्या फटा, लग गई क्लास हमारी। 


कैसे फटा, कहाँ पर फाड़ा, किसने फाड़ा? 

बजा कानों में, प्रश्नों का, पुरजोर नगाड़ा।


क्या बतलायें फटने की दुख भरी कहानी। 

पतले से मोटे होने की है, ये कारस्तानी।


पहले पजामे में अक्सर दौड़ लगाते। 

अब मुश्किल है, जरा भी ढंग से, बैठ न पाते। 


एक एक करके, बदल गये हैं सारे कपड़े। 

मगर पजामा सालों से, हम एक ही पकड़े। 


आखिर कब तक - साथ निभाता एक पजामा। 

अब क्या पहनूँ - तुम्हीं बता दो मेरे रामा? 


- योगेश मित्तल

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही अच्छी हास्य कविता रची है यह योगेश जी आपने। निस्संदेह आप बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं।

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