कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा के साथ की - 16 - प्रतिध्वनि

कविता, कहानी, संस्मरण अक्सर लेखक के मन की आवाज की प्रतिध्वनि ही होती है जो उसके समाज रुपी दीवार से टकराकर कागज पर उकेरी जाती है। यह कोना उन्हीं प्रतिध्वनियों को दर्ज करने की जगह है।

गुरुवार, 16 सितंबर 2021

कुछ यादें वेद प्रकाश शर्मा के साथ की - 16

 



"वो तो मैं हूँ....पर आपको बहुत ज्यादा गुस्सा किस बात पर आ रहा है?" मैंने बेहद शान्ति से सवाल किया। 


"तुम यार, इसे जानते कितना हो?" सतीश जैन का स्वर अभी भी गर्म था। 


"इसे... किसे...?" समझते हुए भी मैंने पूछा। 


"इसी को...रामअवतार को....?"


"नहीं जानता...।" मैंने स्वीकार किया -"आपके यहाँ ही मिला हूँ।"


"अरे मैं नहीं जानता उसे..। उसके घर के लोगों को...। कैसा आदमी है? कैसा परिवार है? और तुम.... तुम्हें उसने एक बार कहा और तुम उसके यहाँ खाने पहुँच गये। यार ये कोई तुक है। अक्ल-वक्ल कुछ है तुममें या दिमाग से एकदम पैदल हो? जितने का तुमने खाना नहीं खाया होगा, उससे ज्यादा तो तुमने किराया खर्च कर दिया। कितना किराया खर्चा?"


"साठ रुपये....।" मैंने धीरे से कहा -"तीस जाने के...तीस आने के।"


"इससे कम में, तुम यहीं किसी रेस्टोरेंट में बैठकर उससे अच्छा खाना खा सकते थे, जैसा वहाँ खाया होगा।"


"हाँ, खाना बेशक ज्यादा अच्छा खा सकता था, लेकिन रेस्टोरेंट में वो माहौल... "


"तुम यार बिल्कुल बेवकूफ हो। ऐसे ही किसी ऐरे-गैरे के यहाँ खाना खाने कैसे जा सकते हो। तुम जासूसी उपन्यास लिखते हो, तुम्हें समझना चाहिए कि तुम्हारे साथ कुछ ऊंच-नीच भी घट सकता है।"


"टेन्शन मत लो यार...। कुछ हुआ तो नहीं। रामअवतार जी बहुत सिम्पल आदमी हैं।" मैंने सतीश जैन को समझाना चाहा, पर उनका मूड सही नहीं हुआ। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वह मेरे द्वारा रामअवतार जी के यहाँ खाना खाने से खफा हैं या मैंने उन्हें अपना कोट दे दिया इसलिये, पर सतीश जैन ने कुछ जाहिर नहीं किया। मुझसे ठीक से बात किये बिना ही वह आफिस की ओर पलट गये। मैं भी सतीश जैन के पीछे पीछे आफिस में दाखिल हुआ। 


सतीश जैन की आफिस टेबल के अपोजिट बिछी फोल्डिंग चेयर पर बैठते हुए मैंने यूँ ही सवाल किया -"कितने दिन का टूर है?"


"कम से कम दो हफ्ते तो लगेंगे ही।" सतीश जैन ने कहा, पर उनकी आवाज़ में अभी भी जो तल्खी थी, मुझे समझ में आ गया कि उनका मूड अभी भी सही नहीं है। 


"कितने स्टेशन कवर करने हैं?" मैंने फिर पूछा। 


"जितने ज्यादा से ज्यादा हो जायें।" सतीश जैन ने कहा। 


फिर हम दोनों के बीच चुप्पी रही, पर कुछ देर बाद सतीश जैन ने ही मुंह खोला -"अब हमारा हिसाब तो क्लीयर है ना?"


"हाँ....।" मैंने कहा। 


"अभी मेरठ ही रहोगे या दिल्ली जाना है?" सतीश जैन ने फिर पूछा। स्वर पहले जैसा रूखा था। 


मुझे लगा कि मुझे उठ जाना चाहिए और उठते हुए मैं बोला -"शाम तक यहीं हूँ... शाम को निकल जाऊंगा।"


"ठीक है, फिर.... शाम तक जिस जिस से मिलना हो, मिल लो। तुम्हारे तो बहुत सारे घर हैं मेरठ में...।"


"ठीक है, चलता हूँ।" मैं बोला। 


तभी जैसे सतीश जैन की व्यापारिक बुद्धि में कोई बात आई और वह एकाएक ही एकदम कोमल स्वर में बोले -"यार, मेरी बात का बुरा मत मानना। तुम हमारे लिए बहुत कीमती हो, इसलिए हमें तुम्हारी चिन्ता होती है। और कोई भी काम करो, सोच समझ कर किया करो। खुद समझ न आये तो सलाह ले लिया करो।"


मैं बोला कुछ नहीं। मुस्कुराते हुए सहमति में सिर हिलाते हुए लक्ष्मी पाकेट बुक्स के आफिस से बाहर निकल गया।


उसके बाद मैं सोचने लगा कि जीजी के यहाँ जाऊँ या एक चक्कर ईश्वरपुरी लगा लूँ। दिल चाहता था कि बड़ी बहन के यहाँ जाकर कुछ खा-पीकर सो जाऊँ, पर दिमाग ने कहा -'मुझे ईश्वरपुरी जाना चाहिए।'


मुझे याद आया कि मैंने रायल पाकेट बुक्स के मकान में एक कमरा किराये पर लिया हुआ है। उसका किराया तो मात्र पचास रुपये था, पर महीनों हो गये थे, मुझे ताला लगाकर दिल्ली गये और अभी तक लौटकर मैं वहाँ झांकने भी नहीं गया था। 


मैंने हिसाब लगाया कि किराया भी लगभग पांच सौ रुपये के आसपास हो रहा होगा। 


गनीमत है - किराया अदा करने के लिए रुपये थे मेरे पास, लेकिन मन में एक गिल्ट सा पैदा हो रहा था। 


ईश्वरपुरी का रिक्शा करके जाते हुए मैं यही सोच रहा था कि रायल पाकेट बुक्स के स्वामी जयंती प्रसाद जी मुझसे क्या कहेंगे और जवाब में मैं क्या कहूँगा। और यह भी मैं सोच रहा था कि मेरे पास जो रुपये हैं, वो सारे के सारे तो शायद उनके यहाँ के कमरे का किराया अदा करने में ही निकल जायेंगे या हो सकता है - कुछ कम ही पड़ जायें। और पैसे कम पड़े तो मुझे वापसी के किराये का भी कहीं से जुगाड़ करना पड़ेगा। 


यह समस्या मेरे सामने चाहे बहुत बड़ी थी, पर एक आदत तब भी मुझमें थी और अब भी है, वो यह कि बात कितनी ही बड़ी क्यों न हो, मैं खुद को कभी बहुत ज्यादा टेन्शन नहीं देता। मस्त रहता हूँ।


ईश्वरपुरी पहुँच सबसे पहले मैंने अपने कमरे पर ही जाना था, पर ऐसा न हो सका। 


आरम्भ में ही पड़ने वाले नूतन पाकेट बुक्स के आफिस में मुझे एसपी साहब और वेद प्रकाश शर्मा दिखाई दिये। 


दिल में आया, अन्दर घुसूँ और पूछूँ कि क्या हो रहा है, पर दिमाग ने तुरन्त रोक दिया कि नहीं, कुछ आपसी बातचीत हो रही होगी। शायद छपने और छापने की। मुझे अन्दर नहीं जाना चाहिए। देखकर भी अनदेखा कर, मैं आगे बढ़ गया, किन्तु अभी चन्द कदम दूर गंगा पाकेट बुक्स के आफिस से भी आगे नहीं बढ़ा था कि कानों में आवाज आई -"योगेश....।"


पलटकर देखा - नूतन पाकेट बुक्स के आफिस के बाहर वेद खड़े थे और सहसा वह मेरी तरफ बढ़ने लगे और मैं तो उनकी ओर बढ़ना शुरू कर ही चुका था।

 

एक मिनट बाद हमारे हाथ मिल चुके थे। 


"यहाँ कहाँ?" वेद ने पूछा। फिर खुद ही कहा -"गंगा में...?"


"नहीं, अपने कमरे पर जा रहा था।" मैंने कहा। 


"कमरे में...? यहाँ कमरा ले रखा है तूने?" 


"हाँ...।"


"कितना किराया है?"


"बिजली-पानी समेत पचास रुपये है। हालांकि पानी की मुझे ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि फ्रेश होने और नहाने के लिए मैं मामाजी के यहाँ चला जाता हूँ।"


"तू पागल है क्या बिल्कुल।" पूरी बात सुन, वेद ने छूटते ही कहा-"बेवकूफ, तेरे मामाओं का घर यहाँ है। हजार गज की कोठी है। उनके होते तुझे कमरा किराये पर लेने की क्या जरूरत आ पड़ी? फिर तेरी तो बड़ी बहन का घर भी मेरठ में है।"


"वो यार... अलग कमरे में...प्राइवेसी होने से कुछ ज्यादा तो लिखा जायेगा।" मैंने कुछ झिझकते हुए कहा। 


"इतना तो तूने फालतू न लिखा होगा, जितना किराये में बरबाद किया होगा और यहाँ पर तो ईश्वर पुरी में रहने वाला कोई भी जब चाहे सिर उठाये तेरा टाइम बरबाद करने आ जाता होगा, जबकि तेरे मामाओं के यहाँ या बहन के कोई भी तभी पहुँचेगा, जब कोई जरूरी काम होगा।"


वेद प्रकाश शर्मा की बात बिल्कुल सही थी। मेरी बोलती बन्द हो गई। 


"किसके यहाँ कमरा लिया है?" तभी वेद ने सवाल किया। 


"रायल पाकेट बुक्स वाले जयन्ती प्रसाद सिंघल जी के यहाँ...?"


"तो फिर उनका भी कुछ न कुछ काम जरूर किया होगा।"


"हाँ, पर उन्होंने उसके पैसे तुरन्त ही दे दिये।"


"कम दिये होंगे।"


"नहीं, बिल्कुल भी कम नहीं दिये।" मैंने कहा। 


"तो फिर तूने माँगे ही कम होंगे।"


वेद की इस बात ने मुझे निरुत्तर कर दिया। दरअसल मैं इतने ज्यादा मनमौजी स्वभाव का था कि कौन क्या ले रहा है, इसमें मेरी कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही। मार्केट रेट किस काम का क्या है, मुझे कुछ पता नहीं होता था। मैं तो बस, इतना जानता था कि मेरी जेब खाली नहीं रहनी चाहिए। जो मिले - आने दो। अब इस लिहाज़ से मैं बेवकूफ था तो था, इसमें कोई शक भी नहीं था।


"नूतन पाकेट बुक्स से कोई डील हो रही है....।" बात का रुख पलटने के ध्येय से मैंने प्रश्न किया। 

"क्यों एक पब्लिशर और राइटर साथ-साथ बैठ जायें तो इसका मतलब जरूरी है कि उनमें कोई डील हो रही है।"

"राइटर योगेश मित्तल जैसा हो तो कई बार टाइम पास हो रहा होता है, लेकिन वेद प्रकाश शर्मा हो तो डील का अन्देशा ही होता है।" मैंने कहा। 

वेद हंसा। 

"क्यों, वेद के सिर पर कोई सींग उगे हैं?"

"नहीं, मुकुट लगा है - हीरे का।" मैंने कहा। बात करते-करते सरकते हुए हम गंगा पाकेट बुक्स के आफिस के बिल्कुल सामने आ गये थे तो अचानक ही वेद ने कहा- "आ, तेरी बात करते हैं।" और मेरा हाथ थाम, मुझे लिए-लिए गंगा पाकेट बुक्स में दाखिल हो गये। 

गंगा पाकेट बुक्स के आफिस में उस समय सिर्फ सुशील जैन ही बास की चेयर पर विराजमान नज़र आ रहे थे। 


(शेष फिर)


1 टिप्पणी:

  1. आपकी यह आदत बहुत अच्छी एवं अनुकरणीय है योगेश जी कि समस्या चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, आप ख़ुद को कभी बहुत ज़्यादा टेंशन नहीं देते तथा मस्त रहते हैं। जो ऐसा स्वभाव बना ले, उसके लिए ज़िन्दगी की जद्दोजहद बहुत आसान हो जाती है।

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