विक्रांत सीरीज के उपन्यासकार कुमार कश्यप जी के साथ बीते कुछ यादगार पलों की एक झलक - प्रतिध्वनि

कविता, कहानी, संस्मरण अक्सर लेखक के मन की आवाज की प्रतिध्वनि ही होती है जो उसके समाज रुपी दीवार से टकराकर कागज पर उकेरी जाती है। यह कोना उन्हीं प्रतिध्वनियों को दर्ज करने की जगह है।

बुधवार, 9 जून 2021

विक्रांत सीरीज के उपन्यासकार कुमार कश्यप जी के साथ बीते कुछ यादगार पलों की एक झलक

कुमार कश्यप जब बहुत बुलन्दी पर थे, तब उनसे हमेशा मेरठ में किसी न किसी प्रकाशक के यहाँ ही मिलना हुआ, पर जब भी वह मिलते हमेशा जल्दी में रहते थे, "नमस्ते - जय राम जी की" से आगे बात कम ही बढ़ी। 


आम तौर पर उन्हें बाहरी चाय की दुकान पर चाय पीते कभी देखा नहीं, पर एक बार सुबह-सुबह वह  ईश्वरपुरी के बाहर ही गिरधारी चाय वाले की दुकान पर दिख गये। 


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उपन्यासकार कुमार कश्यप से कुछ मुलाकतें 

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