प्रतिध्वनि: लेख

कविता, कहानी, संस्मरण अक्सर लेखक के मन की आवाज की प्रतिध्वनि ही होती है जो उसके समाज रुपी दीवार से टकराकर कागज पर उकेरी जाती है। यह कोना उन्हीं प्रतिध्वनियों को दर्ज करने की जगह है।

शुक्रवार, 26 नवंबर 2021

रूटीन तो बहुत जरूरी है!

नवंबर 26, 2021 2


Image by Pexels from Pixabay


जिन्दगी में रूटीन बहुत जरूरी है।  सोने का रूटीन, जागने का रूटीन, खाने का रूटीन, काम का रूटीन।

 

पर ऐसा होता कहाँ है कि इन्सान हर काम रूटीन से कर पाये। 


सुबह सुबह काम धन्धों पर निकलने वालों का सुबह उठने का रूटीन आम तौर पर पाँच से सात बजे के बीच का होता है, किन्तु जिस दिन काम से छुट्टी हो, आफिस की छुट्टी हो, उस दिन कुछ नौ बजे तक तो कुछ तो बारह बजे तक बिस्तर नहीं छोड़ते। 

 

यह सब मैं अटकलबाज़ी लगाकर नहीं कह रहा, मैंने अपने इर्दगिर्द ऐसे बहुत से नमूनों कहिये या उदाहरण, को बेहद नजदीक से देखा है।  


हाँ, मेरा रूटीन आम तौर पर हमेशा एक सा रहता है ।  अमूमन सुबह साढ़े चार से साढ़े पाँच के बीच उठ ही जाता हूँ ।  रूटीन डिस्टर्ब तब होता है, जब तबियत खराब हो । 


इसी प्रकार मेरा हमेशा ही लिखने का भी रोज़ का एक निश्चित रूटीन रहा है ।  रोज़ कुछ न कुछ लिखना जरूर है।  जब लिखना मेरा फुल टाइम जॉब था अर्थात लिखने के अलावा मैं कोई दूसरा काम नहीं करता था, तब दोस्तों के साथ घूमते-फिरते रहने के बावजूद लिखने के लिए वक्त निकाल ही लेता था, लेकिन अब जब मैं एक उम्रदराज़ दुकानदार हूँ - अक्सर लिखने का रूटीन बिगड़ जाता है।

 

जब लिखना मेरा मुख्य और एकमात्र काम था, तब फालतू मटरगस्ती के बावजूद लिखने का दो वक़्त का रूटीन था।  


एक तो सुबह सुबह का समय, दूसरा रात का।  पर दोनों में से एक ही वक़्त लेखनकार्य चलता था।  


अगर रात का खाना खाने के बाद बिस्तर पर न जाकर, लिखना आरम्भ कर दिया तो लगभग दो तीन बजे तक लिखना जारी रहता था, लेकिन अगर बिस्तर पकड़ लिया और जल्दी सो गया तो सुबह तीन बजे तक अवश्य जाग जाता था।  हाँ, इसके लिये हमेशा अलार्म घड़ी में अलार्म पहले से ही अवश्य सैट कर लेता था, पर जिन्दगी में ऐसा शायद इक्का दुक्का बार ही हुआ हो, जब अलार्म से मेरी आँख खुली हो।  हमेशा अलार्म के वक़्त से पहले ही मेरी आँखें खुद ब खुद खुल जाती थीं।  


शायद इसका कारण यह होता हो कि जब भी मैं तीन बजे का अलार्म लगाता, यह सोचते हुए सोता था कि मुझे पौने तीन तक उठ जाना चाहिए, ताकि अलार्म के शोर से किसी को कोई असुविधा - डिस्टरबेन्स न हो और जब भी नींद खुलती, मेरा पहला काम तब तक न बजे, अलार्म को बन्द करने का होता था। 


बीच के कुछ सालों की अन्यमनस्कता के अलावा मेरे जीवन में लिखने का रूटीन कभी डिस्टर्ब नहीं हुआ।  तब भी मैं लिखने का ऐसा काम करता रहता था, जो शायद मेरे जैसे अन्य लेखकों ने कभी न किया हो।  वह काम था - कालोनी के बच्चों के होमवर्क में यदि कोई क्रियेटिव लेखन का काम मिला हो तो उसमें उनकी मदद, किन्तु वह मदद भलाई का काम कभी नहीं होती थी, बल्कि एक प्रोफेशनल कदम था, आर्थिक लाभ के लिये। 


वह अजीबोगरीब काम था - कालोनी के बच्चों के लिए कविता, लेख या कहानी लिखकर देने का।  उन्हें कहानी, कविता, लेख और इन्टरव्यू आदि लेने के बारे में समझाने का।  इसके मैंने बाकायदा दो सौ से पाँच सौ रुपये भी लिये हैं।  बच्चों के माता पिता से।  यह काम हमेशा मैं बच्चों के माता पिता के अनुरोध पर ही करता था।  


दरअसल मेरी कालोनी के बहुत सारे लोग मेरे बारे में यह भली भाँति जानते हैं कि मैं एक लेखक हूँ और उनके बच्चों को यदि स्कूल से या किसी टीचर से निबन्ध, कविता या कहानी लिखने का कोई ऐसा काम मिल जाता, जो पेरेन्ट्स और उनके घरेलू ट्यूटर के लिये मुश्किल होता तो पेरेन्ट्स मुझसे सम्पर्क करते थे और मैं एक निश्चित रकम के बदले कविता, कहानी या निबन्ध लिख कर दे देता था।  वह निबन्ध, कविता या कहानी मैंने कभी अपने रिकॉर्ड में नहीं रखी।  जिससे पैसे लिये - ईमानदारी से हमेशा के लिये उन्हें सौंप दी।  हमेशा के लिये - उसके नाम के लिये।  इसका अनेक बार एक अतिरिक्त लाभ भी मिला, वह यह कि जिसे जो कुछ भी लिखकर दिया, उसे यदि कभी कोई ईनाम या शाबाशी अथवा प्रोत्साहन मिला तो उसके परिवार के लोगों ने कभी आधा किलो, कभी किलो मिठाई का डिब्बा भी दिया।  किसी ने महँगी चाकलेट भी दी।  


मैंने ऐसी किसी कृति को अपने लेखन कार्य में कभी सहेज कर भी नहीं रखा।  


आप मुझे मूर्ख कह सकते हैं, पर ऐसा ही हूँ मैं।  


सितम्बर महीने के आखिरी दिनों तक मेरा लेखन कार्य नियमित रूप से सुचारु रूप से चल रहा था।  कहीं कोई रुकावट नहीं थी।  हालांकि गति मद्धिम थी, लेकिन एक साथ चार-चार लेखन कार्य जारी थे।  


एक उपन्यास - कब तक जियें (जिसके लगभग सत्तर पेज लिखे जा चुके हैं। ) 


दूसरी एक लम्बी कहानी - इश्क़ मदारी ( जिसके बस कुछ आखिरी पन्ने लिखने हैं। ) 


तीसरी - वेद प्रकाश शर्मा से अपनी यारी के किस्से ( फेसबुक पर/ब्लॉग पर) 


और 


चौथा एक लेख - क्या अच्छा लिखने के लिये अच्छा पढ़ना और बहुत ज्यादा पढ़ना जरूरी है? (फेसबुक पर) 


और रूटीन चलता रहता तो चार में से तीन का काम पूरा हो चुका होता, लेकिन ऐसा हो ना सका।  रूटीन टूट गया। 

अच्छा खासा रूटीन क्यों टूटा, इसका कारण था - अचानक कुछ बाहरी काम आ जाना।  बाहरी काम अर्थात् वो काम - जो अतिरिक्त आय भी देता है।  अतिरिक्त आय - वह कमाई - जो मुझे दुकान के काम से अलग किसी काम से हासिल होती है, चाहें वो किसी स्कूली बच्चे के लिये लिखकर प्राप्त होती हो या किसी के प्रूफ पढ़ कर अथवा किसी तरह का एडीटिंग जाब करके या कुछ लिखकर के।  


दरअसल एक मुद्दत से मेरी आय का मुख्य साधन मेरी दुकान है, जहाँ मैं फोटोस्टेट द्वारा या कम्प्यूटर कलर और ब्लैक प्रिन्ट आउट द्वारा अथवा लेमिनेशन या स्पाइरल बाइन्डिंग वर्क द्वारा या लोगों के डुप्लीकेट कार्ड बनाकर मेहनताना - मज़दूरी हासिल करता हूँ। 


डुप्लीकेट कार्ड से यदि आप मेरा मन्तव्य नहीं समझे हों तो बता दूँ कि आजकल हमारी दिनचर्या का अंग बने जितने भी तरह के कार्ड होते हैं, मेरा आशय उन सभी तरह के कार्ड्स के लिये है।  जैसे - आधार कार्ड, वोटर आई डी, पैनकार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, आर सी, हैल्थ कार्ड आदि सभी तरह के कार्ड्स के डुप्लीकेट कार्ड बनवा कर घर में रखने का प्रचलन आजकल आम है।  लोग पर्स में डुप्लीकेट कार्ड रखना ही पसन्द करते हैं।  ओरिजिनल घर पर ही रखते हैं, जिससे कभी पर्स खो जाये या चोरी हो जाये तो ओरिजिनल कार्ड्स सदा सुरक्षित रहें।  ये डुप्लीकेट कार्ड बनाने के लिये मैं कार्ड को दोनों ओर से स्कैन करके फोटो पेपर पर उनके कलर प्रिन्ट निकालता हूँ और उनके फ्रन्ट और बैक को ठीक से हुबहू कार्ड की शेप में जोड़ कर उन्हें लेमिनेशन कर देता हूँ, जिससे वे हुबहू ओरिजिनल कार्ड का रूप अख्तियार कर लेते हैं।  


इन डुप्लीकेट कार्ड्स को पर्स में रखने का फायदा यह होता है कि कार्ड होल्डर को कभी किसी भी कार्ड की फोटोकॉपी की जरूरत हो, वह डुप्लीकेट कार्ड से ही फोटोकॉपी करवा लेता है।  और फोटोकॉपी ओरिजिनल कार्ड की फोटोकॉपी से किसी भी हालत में घटिया नहीं आती, बल्कि अक्सर बेहतर ही आती है।  इसका कारण यह है कि हम कार्ड बनाते समय यह ध्यान रखते हैं कि यदि किसी के कार्ड में उसकी फोटो बहुत ज्यादा डार्क है तो और फोटोकॉपी में उसका रिजल्ट बहुत काला आता है तो उस फोटो को हम कुछ लाइट कर देते हैं।  फोटो वही रहती है।  उसमें कोई छेड़छाड़ नहीं की जाती, किन्तु उसे थोड़ा सा लाइट कर देने से कार्डधारी व्यक्ति का चेहरा कुछ अधिक स्पष्ट हो जाता है।  


और पर्स में डुप्लीकेट कार्ड रखने का सबसे खास फायदा यही होता है कि पर्स खोने या पाकेटमारी या चोरी का शिकार होने पर डुप्लीकेट कार्ड्स ही गायब होते हैं, जो कि ओरिजिनल कार्ड घर पर सुरक्षित होने की वजह से दोबारा बनवा लेना बहुत आसान होता है।  


मुझे लगता है - इस तरह का काम पश्चिमी दिल्ली में तो कम से कम मैंने ही आरम्भ किया था, क्योंकि मेरे पास तब से कम्प्यूटर है, जब दूर दूर तक लोगों को कम्प्यूटर का ज्ञान ही नहीं था।  


जो लोग कम्प्यूटर के भारत आगमन का विवरण जानते हैं, जरूर जानते होंगे कि आरम्भ में जो 286 कम्प्यूटर आया था, वह काफी बड़ा होता था और नया कम्प्यूटर उस जमाने में साठ हजार या अधिक का होता था।  


286 के बाद 386 और 486 माडल आये।  मैंने जो पहला-पहला कम्प्यूटर खरीदा था, वह एक सेकेण्ड हैण्ड 486 था, जो उस समय मुझे लगभग पन्द्रह हज़ार का पड़ा था।  बाद में अपग्रेडेशन में और भी अधिक खर्च पड़ा था।  


जानकारी के लिये आपको बताऊँ - तब मेरे कम्प्यूटर की हार्ड डिस्क कितनी थी।  


सिर्फ चार एमबी।  


और रैम थी आठ केबी।  सिर्फ आठ केबी।  उस में गाने नहीं सुन सकते थे आप।  वीडियो देखना तो बहुत दूर की बात है।  


आज न्यूयॉर्क में रहने वाली मेरी चचेरी बहन अचला गुप्ता के कम्प्यूटर की रैम ही बत्तीस जीबी है।  


तो यह सब कुछ तो मैंने आपको अपने कामों का विस्तृत विवरण बताया है, लेकिन हम बात कर रहे थे रूटीन की और लेखकीय रूटीन की।  


तो सितम्बर के आखिरी दिनों में मेरे सभी तरह के लेखन कार्यों का रूटीन अचानक टूट गया और रूटीन का टूटना कभी अच्छा नहीं होता।  सब कुछ अव्यवस्थित हो जाता है और रूटीन टूटने पर जो लेखन कार्य आप बीच में ही छोड़ देते हैं, दोबारा उसे फिर से आरम्भ करना बहुत ज्यादा आसान नहीं होता, क्योंकि जो कुछ हम लिख रहे होते हैं, सबका सब एक बार पाठक के तौर पर खुद भी एक या अधिक बार पढ़ना पड़ता है, ताकि कान्टीन्यूटी ठीक ठाक रहे।  गलतियाँ न होयें।  


बाहरी काम करने के बाद ही मुझे चार दिन के लिए अपनी पत्नी और छोटे भाई-भाभी के साथ रांची जाना पड़ा।  रांची के बर्धमान कम्पाउंड में मेरी सबसे बड़ी से छोटी, दूसरे नम्बर की बहन सविता गुप्ता उर्फ बीता जीजी रहती हैं। 


उन्नीस अक्टूबर को सुबह आठ बजकर पैंतालीस मिनट पर हम गो एयर की फ्लाइट से दिल्ली से राँची के लिए रवाना हुए।  सुबह साढ़े दस बजे तक रांची के बिरसा मुण्डा एयरपोर्ट पर पहुँच गये।  एयरपोर्ट पर भांजे हिमांशु गुप्ता के पुत्र रिषभ गुप्ता और पुत्री रिशीका गुप्ता दो अलग अलग कारों में हमें रिसीव करने आये हुए थे।  


मैं मेरी पत्नी राज और रिषभ एक कार में, दूसरी में छोटा भाई राकेश, उसकी पत्नी कान्ता और रिशीका बैठे और लगभग पौन घण्टे के सफर के बाद बर्धमान कम्पाउंड पहुँच गये।  


जिन भाइयों की अपनी उम्र से दस से पन्द्रह साल बड़ी, बड़ी बहन हों, वे बड़ी बहन का प्यार क्या होता भली भाँति समझ सकते हैं।  बड़ी बहन में एक अदद माँ मुफ्त में हासिल रहती है और हम इस मामले में बहुत बहुत खुशकिस्मत हैं।  इसलिये भी कि जीजी के सुपुत्र हिमांशु और बहू विनीता ही नहीं, अगली पीढ़ी की औलादें रिशीका और रिषभ तथा परिवार के अन्य रिश्तेदारों ने चार दिन कैसे बीत गये, पता ही नहीं चलने दिया।  


आखिरी दिन 22 अक्टूबर को साढे़ चार बजे एयर एशिया से वापसी के टिकट थे।  उसी दिन सुबह राँची में फेसबुक मित्र परमाणु सिंह से कुछ ही देर की सही, बहुत आत्मीयता भरी मुलाकात हुई, जो सदैव याद रहेगी।  


दिल्ली लौटने तक सब कुछ ठीक ठाक रहा।  खास बात यह रही कि इस पूरे दौर में स्वास्थ्य भी बहुत बेहतरीन रहा, लेकिन फिर दिल्ली वापसी के पश्चात्, अचानक कुछ बेमौसमी बरसातों के आगमन के बाद से बिगड़ा स्वास्थ्य उन्नीस-अठारह-सतरह होता चला गया।  फिलहाल बदलते मौसम का यह झटका जारी है, इसलिये लिखने का रूटीन ही नहीं, दुकान का रूटीन भी बिगड़ गया।  सुबह दस बजे से रात आठ बजे तक दुकान में बिताने वाले मुझ जैसे शख्स के लिये लिखने का रूटीन बनाये रखना कितना मुश्किल होता है, यह समझाना तो मुश्किल है, पर यकीन दिलाता हूँ कि जल्दी ही फिर से उसी अन्दाज में आगाज हो जायेगा और पिछली कड़ियाँ आगे भी बढ़ेंगी, बस आप सबकी दुआएँ और शुभकामनाएँ चाहिये।  अभी तो तीस नवम्बर तक दुकान भी सुबह दस बजे से दोपहर ढाई बजे तक ही खोल रहा हूँ, क्योंकि दिल्ली में पोल्यूशन बहुत है, जो कि दिल्लीवासियों के लिये तो ज़हर है ही, मेरे जैसे दमा रोगियों के लिये शायद ज़हर से भी कुछ ज्यादा है।  


आज फिर से मैदान में कूदे हैं तो अब कदम दर कदम फिर से बढ़ने की कोशिश भी जारी रहेगी।  


छोटों का प्यार और बड़ों का आशीर्वाद बना रहे।  बस....।  


रूटीन पर आउट ऑफ रूटीन लेख लिखने का भी एक विशेष कारण है, वह यह कि आप में से जो भी लेखक हैं - एक बात गाँठ बाँध लें कि लिखना - रोज का एक रूटीन जरूर होना चाहिए।  दिन में एक पेज लिखें या दस - कलम हर दिन चलनी अवश्य चाहिए।  


तभी आप अच्छे और बेहतरीन लेखक बन सकेंगे, अन्यथा आप सौ किताबें भी लिख लें, यादगार जैसा कुछ लिखना मुश्किल ही होगा।  मानसिक रूप से आप स्वयं भी अपने लेखन से कभी सन्तुष्ट नहीं हो सकेंगे।  


लिखिये और रोज लिखिये।  रूटीन बनाकर लिखिये।  रूटीन बनाना सम्भव न हो तो आउट ऑफ रूटीन भी लिखिये, किन्तु कुछ न कुछ रोज लिखिये।


(इति) 

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गुरुवार, 8 जुलाई 2021

राजहंस बनाम विजय पॉकेट बुक्स - 5

जुलाई 08, 2021 0

पिछली कड़ी: राजहंस बनाम विजय पॉकेट बुक्स 4


ज्ञानेन्द्र प्रताप गर्ग की बात पर मैं मुस्कुराया- "जरूर चन्दर ने बताया होगा आपको...?"


"तुझे कैसे मालूम....? " अब की बार चौंकने की बारी ज्ञान की थी। 


मैं मुस्कुराया -"चन्दर की दुकान, मनोज की दुकान से बिल्कुल सटी हुई है। उसके कान मनोज में होने वाली बातों पर अक्सर लगी रहती हैं। और मनोज में लगभग सभी बुलन्द आवाज में बात करने वाले हैं। चन्दर ने कुछ टूटा-फूटा सुना और आपको वही सुना दिया।"


"मतलब बात सही है ना। मुकदमा शुरू हो गया।" 


"नहीं, अभी कोई मुकदमा शुरू नहीं हुआ।" मैंने कहा -"पर पासिबिल्टी है। और भाईसाहब, जब मुकदमा शुरू होगा ना, तब मैं स्पेशली दरीबे आऊँगा - आपको बताने के लिए।"


"हैंएएए....।" ज्ञानेन्द्र प्रताप गर्ग मेरी बात और मिज़ाज नहीं समझे और जब तक वह कुछ समझते मैं उठते हुए दोबारा बोला - "अच्छा, चलता हूँ, मुझे राज और गौरी भाई साहब मेरा इन्तजार कर रहे होंगे। उन्हीं के साथ शक्तिनगर से आया हूँ।"


और मैं तुरन्त ही पीछे लौट पड़ा। 


"अरे योगेश, सुन, सुन तो... " ज्ञान पीछे से चिल्लाये, मगर मैं पलट कर "बाय-बाय" के अन्दाज़ में हाथ हिलाते हुए बोला -"बाद में..।" और आगे बढ़ गया।


ज्ञान ने बाद में भी आवाज दीं, पर मैंने सुनकर भी अनसुनी कर दीं और मनोज में पहुँचा। 


वहाँ राज और गौरी कहीं दिखाई नहीं दिये। काउन्टर पर सबसे आगे पन्नालाल जी बैठे थे। राजकुमार, गौरीशंकर और विनय कुमार गुप्ता के पिताजी। उनके पीछे बैठे थे जगदीश जी, जोकि रिश्ते में शायद राज, गौरी, विनय के भाई लगते थे। 


मैंने पन्नालाल जी को नमस्कार किया और विनम्र स्वर में उनसे पूछा - "भाई साहब कहाँ हैं?"


"कौन से भाई साहब?" पन्नालाल जी ने पूछा। 


"राज और गौरी भाई साहब।"


"वो तो गये...?" जवाब पीछे बैठे जगदीश जी ने कहा। 


"गये.....कहाँ....?" मुझे झटका सा लगा। मैं उनके साथ आया था और जब मैं शक्तिनगर जाता था, अगर कभी वे सीट पर नहीं होते तो मैं उनका इन्तजार करता था और आज मैं उनके साथ ही शक्तिनगर से दरीबा कलां आया था, पर दरीबा कलां से वह मुझसे कुछ भी कहे बिना एकदम कहाँ गायब हो गये? 


तब मैं बहुत ज्यादा भावुक इन्सान था। छोटी छोटी बातें मुझे चुभ जाती थीं। इसलिए बहुत खराब लगा। फिर भी मैंने यूँ ही जगदीश जी से सवाल कर लिया - "कहाँ गये हैं?"


"पटेलनगर....।"


जगदीश जी से यह जवाब सुनकर तो मुझे दूसरा झटका लगा। 


"अरे पटेलनगर मुझे भी ले जाते तो मुझे साथ न भी रखते तो मैं खेल खिलाड़ी के आफिस में बैठकर भारती साहब के लौटने का इन्तजार कर सकता था या वह पटेलनगर की जगह वापस शक्तिनगर जाते तो भी मुझे साथ ले सकते थे, वहाँ से मैं आगे विजय पाकेट बुक्स तो पैदल ही जा सकता था। 


बहरहाल जगदीश जी के जवाब के बाद अनमने मन से 838 नम्बर बस के स्टाप पर पहुँचा। बस पहले से खड़ी थी। उसमें बैठने की सीट थी। मैंने रमेशनगर का टिकट लिया और बैठ गया। 838 की कोई बस तिलकनगर और कोई उत्तमनगर जाती थी और उसका रास्ता पटेलनगर, रमेशनगर से था। 


पटेलनगर आने से पहले मेरे मन में आया कि पटेलनगर उतर जाता हूँ और पटेलनगर आने पर मैं आगे जाकर अगले दरवाजे से नीचे उतर गया, किन्तु बस चलने से पहले ही मेरा मूड बदल गया और मैं पिछले दरवाजे से फिर उसी बस में चढ़ गया। 


कभी-कभी ऐसी स्थिति कि सामना हर एक इन्सान को करना पड़ता है, जब मन दोतरफा हो जाता है। 


अगले दिन मैं इस इन्तजार में रहा कि शायद भारती साहब आयेंगे या शायद वालिया साहब ही आ जायें। 


इन्तजार करते-करते मैंने मनोज पाकेट बुक्स के लिए अपनी अगली बाल पाकेट बुक्स का मैटर लिखना आरम्भ कर दिया और देर तक लिखता ही रहा। 


दोपहर हुई। खाना खाया। फिर दोबारा पेन उठा लिया। शाम हुई। चाय पी। फिर लिखना आरम्भ कर दिया। 


राजहंस और विजय पाकेट बुक्स के बीच का ऊंट किस करवट बैठा है, मुझे कुछ भी मालूम नहीं हुआ, क्योंकि उस दिन भी भारती साहब या वालिया साहब के दर्शन नहीं हुए। मेरे मन में बहुत ज्यादा निराशा उत्पन्न हुई और इसका मुख्य कारण था - बहुत सारे प्रकाशकों की लल्लोचप्पो और तारीफ भरी बातों, उनसे निरन्तर सम्मान मिलते रहने के कारण मेरी इम्पोर्टेन्स, मेरी अपनी ही नज़रों में बहुत ज्यादा बढ़ा दी थी। मुझे अपनी ही नज़रों में बहुत विशेष बना दिया था। बेशक मैं नाम से नहीं छपता था, लेकिन हर प्रकाशक से मेरे बहुत अच्छे रिश्ते थे। करीबी रिश्ते थे। इसलिये मैं खुद को किसी अफलातून से कम नहीं समझता था, मगर इस घटना ने मुझे मेरी औकात बता दी। 


इस बारे में मैंने भारती साहब, वालिया साहब या अन्य किसी से कभी कुछ नहीं कहा, लेकिन यह घटना मेरे दिल-ओ-दिमाग में एक सबक बनकर अंकित हो गई। 


उस रात बिस्तर पर पहुँचने के बाद मैंने बहुत सोचा और निर्णय किया कि छोटी-छोटी बातों से कभी अपना दिमाग खराब नहीं होने दूँगा। और तब से ही मैं बहुत ज्यादा समझदार भी हो गया।


अगला दिन भी मेरा यूँ ही बाल उपन्यास लिखते हुए बीत जाता, अगर अचानक एस. सी. बेदी जी न आये होते। 


दोपहर दो बजे तक कोई नहीं आया, न भारती साहब, ना ही वालिया साहब। मगर दो बजे के बाद मैं दोपहर का खाना खा कर निपटा ही था कि एस. सी. बेदी जी की हकलाती हुई आवाज कानों में आई - "योगेश...।"


मैं झट से बाहर आया। बेदी साहब को देख खुशी का इज़हार करते हुए उन्हें अन्दर बुला लिया। 


दोपहर के वक़्त मेरे पिताजी व मम्मी व भाई बहन दूसरे कमरे में थे। खाना-पीना और दोपहर का आराम, उसी कमरे में होता था। पहले कमरे का एक द्वार सड़क की ओर खुलता था, उसी में पिताजी ने अपना क्लिनिक बना रखा था, जहाँ एक टेबल के अलावा कुछ फोल्डिंग कुर्सियाँ और एक बेंच थी। 


मैं और बेदी साहब साथ-साथ बेंच पर ही बैठे। 


"यार, वालिया साहब का पता है कहाँ हैं। घर गया था। वहाँ तो ताला लगा है।"


"ताला लगा है, तब तो सब कर्मपुरा गये होंगे।" मैंने अनुमान प्रकट किया। कर्मपुरा में यशपाल वालिया जी के माता पिता व छोटी बहन रहते थे। 


"नहीं...। पड़ोस में वो जो लड़का मनोज रहता है। उसकी मम्मी टैरेस पर थीं। वहीं से उन्होंने बताया कि वालिया साहब तो सुबह ही घर से निकल गये थे और मिसेज वालिया विग्गू को लेने स्कूल गई हैं। ( विग्गू - वालिया साहब के बड़े बेटे 'भारत' का घरेलू नाम था।) और बाहर जो पनवाड़ीे है, जिससे पान खाये बिना वालिया साहब आगे नहीं जाते, वो भी बता रहा था - वालिया साहब साढ़े नौ-दस बजे के करीब अपने स्कूटर से मोतीनगर की तरफ गये थे।" बेदी साहब ने यह सारी बातें धीरे धीरे अटक-अटककर किश्तों में बताई थीं, जो मैं एकमुश्त आपको बता रहा हूँ।


"तब तो वो जरूर पटेलनगर गये होंगे।" मैंने बेदी साहब से कहा- "भारती साहब के यहाँ। पर यह बताइये - आप वालिया साहब को क्यों ढूँढ रहे हैं?"


"एवैंइ यार... सुबह नावल कम्पलीट किया था तो सोचा थोड़ा घूम लिया जाये। रिलैक्स हो लेइये।" बेदी साहब ने कहा। फिर बोले - "चल, बाहर चलते हैं।"


मैं मम्मी-पिताजी से कहकर बेदी साहब के साथ घर से बाहर निकल गया। बाहर निकलने के बाद कुछ कदम आगे बढकर बेदी साहब ने जेब से सिगरेट निकाल कर होठों से लगाते हुए बोले - "बड़ी देर से तलब लग रही थी। घर पर आपके मम्मी पापा थे, इसलिए...।" 


वालिया साहब, बेदी साहब के अन्दर बड़ों के पैर छूने, उनके सामने सिगरेट न पीने की आदत थी। बल्कि मैंने अपने जीवन में यह आदत अपने लगभग सभी पंजाबी और सिख दोस्तों में पाई है। नहीं कह सकता, यह  पंजाबी संस्कृति का अंग है या मेरे दोस्तों की ही विशेषता थी। 


विशेषताओं की बात आई तो एक बात और बता दूँ - यशपाल वालिया 120 नम्बर तम्बाकू का पान खाते थे और वह जहाँ-जहाँ जाते थे, पनवाड़ीे एक ही होता था। बालीनगर में बालीनगर बस स्टैण्ड के ठीक पीछे एक पनवाड़ीे की दुकान थी। इसी तरह रमेशं नगर, कर्मपुरा, राणाप्रताप बाग में भी, पटेलनगर में भी और मेरठ में भी पनवाड़ीे फिक्स थे। किसी नई जगह से वह पान तभी बनवाते थे, जब कहीं लम्बे रास्ते में पान का एक्स्ट्रा बीड़ा जेब में नहीं होता था। 


इसी तरह बेदी साहब में उन दिनों एक खास और मुख्य आदत थी, हर उपन्यास कम्पलीट करने पर एक दिन मौज-मस्ती में यार-दोस्तों के साथ जरूर बिताते थे। 


रमेशनगर से हम बाहर मेन रोड पर आ गये। रास्ते में मैंने बेदी साहब को अपना अनुमान बता दिया कि भारती साहब और वालिया साहब विजय पाकेट बुक्स गये होंगे और अनुमान का कारण भी बता दिया। 


सब कुछ जानकर एस. सी. बेदी बोले - "हम लोग चलें राणा प्रताप बाग...?"


उस समय साढ़े तीन से ऊपर का समय हो चुका था। मैंने कहा - "राणा प्रताप बाग पहुँचते हुए हमें पांच बजेंगे। ऐसा न हो, हम वहाँ पहुँचे और वहाँ कोई मिले ही नहीं या सब उठने वाले हों।"


"हाँ, यह तो है। चल पिक्चर चलते हैं। यहीं नटराज सिनेमा पर..।" बेदी साहब ने कहा। तब रमेशनगर और मोतीनगर के बीच कीर्तिनगर में नटराज सिनेमा था। 


"जब तक पहुँचेंगे, फिल्म आधी निकल चुकी होगी।" फिल्म की बात पर मैं बोला। 


"हाँ, यह तो है।" बेदी साहब ने कहा -"चल, चाय पीते हैं।"


फिर बेदी साहब मुझे एक टी स्टाल में ले गये। वहाँ हम काफी देर बैठे। बेदी साहब अगले उपन्यास का प्लाट सुनाते रहे और मैं बीच-बीच में मशवरा देता रहा।


चाय पीने के बाद बेदी साहब और मैं टी स्टाल से बाहर निकले और बेदी साहब ने मोतीनगर के लिए एक थ्रीव्हीलर रुकवाया और अलग होते हुए बोले - "वालिया साहब आयें तो बोलना, मुझसे मिलें।" बेदी साहब जानते थे कि मेरा और वालिया साहब का लगभग रोज ही मिलना जुलना होता था। लम्बा गैप कभी कभी ही होता था। 


पर उस दिन और उसके अगले दिन भी भारती साहब और वालिया साहब नहीं आये। मुझे विजय पाकेट बुक्स और राजहंस के बीच के तनाव में आगे क्या हुआ। कुछ पता नहीं चला। 


पूरे पाँच-छ: दिन मेरा किसी से भी मिलना नहीं हुआ। फिर एक दिन सुबह-सुबह भारती साहब आये। 


"क्या चल रहा है?" उन्होंने मुझसे पूछा। 


"मैं तो मनोज के लिए ही लिख रहा हूँ।" मैंने कहा। 


"घूमने का मूड है तो आ चल, चलते हैं।" भारती साहब ने कहा। 


"कहाँ...?"


"विजय में... राणा प्रताप बाग....।*


" पर आज सण्डे है।"


"तो क्या हुआ? सरकारी आफिस थोड़े ही है। आज तेरी वासुदेव और हरविन्दर से भी मुलाकात करवा देंगे। मिला है - उनसे कभी।"


'नहीं....।" मैंने कहा।


"चल फिर....।"


मैं फटाफट तैयार हो गया। रास्ते में मैंने भारती साहब से पूछा - "राजहंस से मीटिंग तो कई हो चुकी होंगी।"


"हाँ, पर कोई फायदा नहीं हुआ। बेल किसी मुंडेर पर नहीं चढ़ी।" भारती साहब बोले - "वालिये ने भी केवल को बहुत समझाया कि हिन्द और मनोज में जाने से उसकी पहले जैसी वैल्यू नहीं रहेगी। राजहंस और विजय पाकेट बुक्स, दोनों को ही नुक्सान होगा, पर केवल को कोई समझा नहीँ पाया।"


"फिर अब क्या होगा? विजय बाबू मनोज, हिन्द और राजहंस पर मुकदमा करेंगे क्या?" मैंने पूछा। 


"मुकदमा करना इतना आसान है क्या? विजय अगर मुकदमा करेगा तो उसे मनोज, हिन्द और राजहंस तीनों पर अलग-अलग मुकदमा करना पड़ेगा। हमलोग विचार कर रहे हैं - कुछ ऐसा भी किया जाये कि तीन-तीन तारीखों का लफड़ा न पड़े। वासुदेव और हरविन्दर को भी विजय ने इसीलिए सलाह-मशवरे के लिए बुलाया है। वो भी अब विजय पाकेट बुक्स परिवार का ही एक हिस्सा हैं। वालिये को आज सुबह कर्मपुरे किसी काम से जाना था, वो बाद में सीधे पहुँचेगा।"


शक्तिनगर बस से उतर मैं और भारती साहब आगे बढ़े। चौराहे तक पहुँच हम बायीं ओर मुड़ गये। 


शक्तिनगर चौराहे से दायीं ओर का  रास्ता कमलानगर से होते हुए आगे बस अड्डे की ओर जाने वाले रास्ते से मिल जाता था। 


सीधा रास्ता रूपनगर - कमलानगर के बीच से होते हुए बैंग्लो रोड की ओर जाता था। 


बायीं ओर के रास्ते में आगे जाकर एक नाले के ऊपर बने पुल को क्रास करने पर राणा प्रताप बाग का एरिया शुरू हो जाता था। 


अक्सर हम शक्तिनगर से राणा प्रताप बाग के लिए रिक्शा कर लेते थे। पर उस दिन खाली रिक्शा मिला नहीं और रिक्शे को ढूँढते हम आगे बढ़ते चले गये। 


शक्तिनगर की अग्रवाल मार्ग की गली पार कर हम आगे बढ़े ही था कि सामने से आते जगदीश जी दिखाई पड़ गये। 


मैं जगदीश जी की नजरों से बचना ही चाह रहा था, पर उन्होंने मुझे देख लिया और बोले - "आज तो सण्डे है योगेश जी। आफिस बन्द है। यहाँ कहाँ घूम रहे हैं?"


"हाँ, अभी याद आया, अब यहीं हम चाय पीकर लौट जायेंगे।" जवाब राज भारती साहब ने दिया और मेरा हाथ पकड़कर  साथ ही दिख रही चाय की दुकान में दाखिल हो गये और बोले - "चाय पीकर ही चलते हैं।"


ख्वामखाह हमने चाय पी। चाय पीते-पीते मैंने कहा - "बेकार चाय पीने घुसे, विजय पाकेट बुक्स में तो पता नहीं कितनी बार चाय चलेगी।"


"हाँ, पर वो जगदीश एकदम सामने आ गया तो यही मुझे सही लगा। यह एक मनोज में ही काम करता है ना। दरीबे में देखा है कई बार...।" भारती साहब बोले। 


"रिश्ते में भाई हैं जगदीश जी...।" मैंने कहा - "राज और गौरी से कहेंगे तो जरूर कि राज भारती और योगेश को देखा और फिर वो लोग, जो सोचें, वो जाने।" मैंने कहा। 


चाय पीकर हम पैदल ही चहलकदमी करते हुए राणा प्रताप बाग पहुँचे। 


विजय पाकेट बुक्स का मुख्य द्वार खुला हुआ था, लेकिन उस बड़े हाल के साइड में स्थित छोटे से आफिस का द्वार बन्द था। आज उस हाल में ही बहुत सारी कुर्सियाँ  बिछी हुई थीं, जहाँ डिस्पैच के लिए वीपी पैकेट और रेलवे के बण्डल  बनाये जाते थे। 


आज वहाँ वासुदेव और हरविन्दर पहले से ही उपस्थित थे। 


बीच में एक सेन्टर टेबल पड़ी थी, जिस पर एक नया सर्कुलर पड़ा था। सर्कुलर में सबसे ऊपर राजहंस के नये उपन्यास का आधे पेज पर विज्ञापन था और नीचे दो कालम बना चार उपन्यासों का नाम और लेखकों का नाम था। 


सबसे नीचे आर्डर देने वाले एजेन्ट के नाम और पते के लिए लाइनें बनी हुई थीं। 


सबसे ऊपर राजहंस के जिस नये  उपन्यास का नाम दिया गया था - वह उपन्यास था - तलाश। 


आर्डर के लिए राजहंस वाले खाने में "प्रतियाँ" लिखकर .......... डाट-डाट-डाट लाइन  खिंची हुई थी। उसके नीचे के चारों बाक्स में भी आर्डर के लिए लाइन बनी हुईं थीं। 


और उन चार लेखकों में दो नाम थे। मनोज पाकेट बुक्स में छपने वाले दो ट्रेडमार्क लेखक - मनोज और सूरज और अन्य दो नाम थे -  हिन्द पाकेट बुक्स में छपने वाले कर्नल रंजीत और शेखर। 


(शेष फिर) 



और फिर क्या विजय पाकेट बुक्स से पांच किताबों का वह नया सैट निकला? 


योगेश मित्तल

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बुधवार, 23 जून 2021

एक व्यक्ति अनेक नाम

जून 23, 2021 0

रजत राजवंशी मेरा ही उपनाम है । इस नाम से माया पाकेट बुक्स, मेरठ से मेरे कई उपन्यास मेरी फोटो सहित छपे हैं।


'प्रणय' नाम से अमर पाकेट बुक्स, मेरठ से दो उपन्यास 'पापी''कलियुग' बैक कवर में मेरी रंगीन फोटो सहित छपे हैं।


'मेज़र बलवन्त' नाम से जनता पाकेट बुक्स, दिल्ली से मेरा उपन्यास 'चीख का रहस्य' मेरी जैकेट और हैट में जासूस स्टाइल की फोटो सहित छपे हैं।


तब सत्यकथा लेखक सुरेन्द्र पुष्कर तथा कई अन्य लोगों के साथ हम जासूसी भी किया करते थे। एक टीम थी हमारी। वो किस्से भी कभी वास्तविक नाम और स्थान बदल कर प्रकाशित करवाने के लिए मुझे प्रिय मित्र विकास नैनवाल ने सलाह दी है, क्योंकि वास्तविक नाम किन्हीं अपरिहार्य कारणों से नहीं दिये जा सकते। कभी याद करके वे सच्चे किस्से भी लिखूँगा।


भारती पाकेट बुक्स और मनप्रिय प्रकाशन से 'विक्रांत, जगत, जगन सीरीज़' के मेरे कई उपन्यास 'योगेश' नाम से भी प्रकाशित हुए थे। मनप्रिय प्रकाशन में बैक कवर पर लम्बे बालों में, मेरी एक तस्वीर भी छपी थी।


"वैष्णो देवी"और "फूलनदेवी" पर हिन्दी में सबसे पहले छपने वाली दो अलग-अलग किताबों में, दोनों में ही एक-एक किताब मेरी ही लिखी थी, जो गर्ग एण्ड कम्पनी के ज्ञानेन्द्र प्रताप गर्ग ने अपने ही नाम से छापी थी।


मैं प्रकाशन जगत के उन लेखकों में से हूँ, जिसे पाठक बहुत कम जानते हैं, लेकिन हर बड़े से बड़ा प्रकाशक व छोटे से छोटा प्रकाशक बहुत अच्छी तरह जानते हैं तथा मैं उनके परमप्रिय लेखकों में से एक रहा हूँ। 


बहुत सारे बड़े लेखकों ने भी मुझसे उपन्यास व सत्यकथाएं लिखवाई हैं, जो कि उनके नाम से छपती थीं, पर मुझ जरूरतमन्द को तत्काल पैसे मिल जाते थे, इसलिए उनमें भी मैं बेहद लोकप्रिय था।


और सामाजिक तथा जासूसी उपन्यास भी मैंने बहुत सारे नकली नामों, बहुत सारे ट्रेडमार्क और घोस्ट नामों से तो लिखे ही हैं, कुछ प्रसिद्ध लेखकों के लिए जासूसी, सामाजिक एवं बाल उपन्यास भी लिखे हैं।


हर एक नाम से लिखे अपने उपन्यास और कहानियों का ब्यौरा और प्रमाण देना मेरे लिए असम्भव है, क्योंकि मैंने अपने लिखे का कभी रिकॉर्ड एवं प्रमाण नहीं रखा, किन्तु मुझे दृढ़ विश्वास है कि यदि मैंने रिकॉर्ड रखा होता तो मैं सबसे ज्यादा नामों से लिखने वाला विश्व का अव्वल लेखक होता।


कुछ फेसबुक मित्र मेरे बारे में अधिक जानने के लिए लगातार सम्पर्क व फोन कर रहे थे, इसलिए यह विवरण दिया है।


खेल खिलाड़ी, क्रिकेट जगत, विश्व क्रिकेट, नन्हा नटखट, अपराध कथाएँ, मानसी कथाएँ, राजभारती का मायाजाल, तन्त्र मन्त्र कहानियाँ, ब्यूटी मैडम, मनपसन्द कहानियाँ तथा और भी आधा दर्जन से अधिक पत्रिकाओं के बहुत सारे अंकों का सम्पादन तथा प्रूफरीडिंग मैं करता रहा था एवं कहानी सेलेक्शन तब मेरा ही होता था।


- योगेश मित्तल


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बुधवार, 26 मई 2021

राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 4

मई 26, 2021 2

 हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स

यूँ तो कोई भी लेखक प्रकाशकों द्वारा लेखक के नाम के ट्रेडमार्क रजिस्ट्रेशन और ट्रेडमार्क नाम में किसी भी लेखक की कृति के प्रकाशन की परिपाटी का समर्थन शायद ही करे, पर उन दिनों पाकेट बुक्स ट्रेड में दो लेखक ऐसे थे - जो ट्रेडमार्क लेखकों के सिस्टम के  सख्त खिलाफ थे। 

एक वेद प्रकाश शर्मा और दूसरा मैं। मौका मिलने पर दोनों ही ट्रेडमार्क प्रचलन के विरुद्ध जी भरकर ज़हर उगल देते थे। 


जब हम दोनों आपस में बातचीत करते तो ऐसे प्रकाशकों के खिलाफ मन की भड़ास भी खूब निकालते थे। 


हमारी नज़र में एक ट्रेडमार्क नाम टाइटिल कवर पर देकर, अन्दर किसी भी उपन्यासकार का उपन्यास छापना, पाठकों से सरासर चीटिंग था। धोखा था। 


हमें इससे बेहतर पैटर्न तो वह लगता था, जब प्रकाशक कोई भी नाम एक पत्रिका के रूप में रजिस्टर्ड करवा लेते थे और उसमें किसी भी लेखक का उपन्यास छाप देते देते थे, किन्तु तब वह अन्दर के पहले या तीसरे पृष्ठ पर असली लेखक का नाम भी अवश्य छापते थे।


विजय पाकेट बुक्स बनाम राजहंस, हिन्द पाकेट बुक्स और मनोज पाकेट बुक्स के मुकदमे के समय ट्रेडमार्क पर अपने विचारों के मामले में, मैं कन्फ्यूज-सा हो गया था, लेकिन वेद प्रकाश शर्मा तब तक अपने स्टैण्ड पर कायम रहे, जब तक कि उन्होंने और सुरेश चन्द जैन ने पार्टनरशिप में तुलसी पाकेट बुक्स की शुरुआत नहीं की।


मुझ में और वेद प्रकाश शर्मा में सबसे बड़ा फर्क यह था कि मैं प्रकाशकों के सामने ट्रेडमार्क विषय पर अपने व्यक्तिगत विचार कभी नहीं रखता था, सिर्फ नजदीकी दोस्तों के सामने ही अपने विचार प्रकट करता था, जबकि वेद प्रकाश शर्मा प्रकाशकों के सामने भी बेहिचक अपने उद्गार प्रकट कर देते और ट्रेडमार्क सिस्टम और नकली उपन्यासों के लिए प्रकाशकों को ही सौ परसेन्ट दोषी करार देते थे। 


विजय पाकेट बुक्स में राज भारती जी और विजय कुमार मलहोत्रा परस्पर राजहंस के मनोज और हिन्द में छपने पर देर तक विचार विमर्श करते रहे, उस दौरान मैं एक मूक दर्शक की तरह खामोश बैठा रहा, वैसे भी मेरी सम्पूर्ण सहानुभूति केवलकृष्ण उर्फ राजहंस के साथ थी, क्योंकि कई बार जब हमारी अकेले में बातचीत होती थी तो केवलकृष्ण के मुँह से यही निकलता था कि यार, अपने लिए, नाम के लिए, प्रकाशकों के लिए बहुत लिख लिया, अब बच्चों के लिए, फैमिली के लिए, फैमिली की सिक्युरिटी के लिए भी कुछ करना है। इन्सान के जीवन का क्या भरोसा, आज है - कल नहीं। जो इन्सान शादी करता है, उसे अपने जीवन काल में कुछ तो ऐसा भी करना चाहिए, जिससे अचानक उसे कुछ हो जाये तो परिवार एकदम ही बेसहारा न हो जाये। 


और जैसे मैं राजहंस की लेखनी की भिन्नता और खूबियों का कायल था, वैसे ही उसकी बातें मेरे दिल को गहराई तक छूती थीं। इसलिए राजहंस ने हिन्द और मनोज में उपन्यास दिये तो मुझे इस में भी कुछ गलत नज़र नहीं आया। 


तब मन ही मन मैं यही सोचता था कि केवलकृष्ण ने यह बहुत अच्छा किया है। अब वह दो-चार सालों में इतना पैसा तो इकट्ठा कर ही लेंगे कि अपने बीवी बच्चों के लिए दो चार प्रापर्टी खरीद सकें। 


उस समय केवलकृष्ण की फाइनेन्शियल पोजीशन के बारे में मुझे कोई सटीक जानकारी नहीं थी, पर वह एक लेखक थे, इसलिए मेरी सारी सहानुभूति केवलकृष्ण के साथ थी,  इसलिए विजय कुमार मलहोत्रा और राज भारती जी की बातें निर्विकार भाव से सुनता रहा, मगर जब अचानक ही विजय जी ने मुझसे पूछ लिया -"योगेश, तेरा क्या विचार है?" तो मैं तुरन्त ही कुछ बोल नहीं पाया। कुछ सूझा ही नहीं मुझे। 


विजय कुमार मलहोत्रा ने फिर पूछा - "तू भी बहुत बार केवल से मिला है। यही बता कि केवल को किस तरह समझाया जाये कि वह फिर से विजय पाकेट बुक्स के साथ जुड़ जाये, हिन्द और मनोज को छोड़ दे।"


"दो तीन मीटिंग तो करनी ही चाहिए।" मैंने वही वाक्य कह दिया, जो भारती साहब और विजय जी की बातों में सुना था। 


चाहें मैंने बिना सोचे समझे अपना विचार प्रकट किया था, पर विजय जी ने उसे गम्भीरता से लिया और राज भारती जी से बोले - "योगेश का भी यही विचार है तो ठीक है, करते हैं एक दो और मीटिंग।" 

फिर एक क्षण रुककर पुनः भारती साहब से बोले - "तू कल फिर  ग्यारह बजे तक आ जाना, कल वालिये को भी साथ ले आना।"


उस दिन हम जितनी देर वहाँ बैठे, चाय के दो दौर चल चुके थे, मगर नतीजा एक ही था कि केवलकृष्ण उर्फ राजहंस के साथ एक-दो बैठकें और की जायें और उसे बार-बार प्यार से समझाने की कोशिश की जाये।


उस दिन जब हम विजय पाकेट बुक्स से वापसी के लिए चले, रास्ते में रिक्शा न मिलने के कारण शक्तिनगर तक पैदल ही पहुँच गये। 


रास्ते भर हम राजहंस, हिन्द पाकेट बुक्स, मनोज पाकेट बुक्स और राजहंस तथा विजय कुमार मलहोत्रा व विजय पाकेट बुक्स की बातें करते रहे। 


शक्तिनगर बस स्टैण्ड पर हमें मलकागंज से उत्तमनगर तक जाने वाली 816 नम्बर की बस मिल गई। बस में बैठने की सीट नहीं मिली तो हम ड्राइवर के ठीक पीछे एकदम आगे, साथ-साथ खड़े होकर बातें करते रहे, लेकिन हमारी बातें निर्रथक थीं, क्योंकि हम दोनों ही ऐसा कोई फैसला नहीं कर सकते थे कि विजय कुमार मलहोत्रा जी को क्या कदम उठाना चाहिए और क्या उनके प्रकाशन के लिए बेहतर है।


कर्मपुरा बस स्टाप से पहले ही भारती साहब ने एक टिकट मुझे थमा दिया और बाद में स्वयं मोतीनगर उतर गये व उतरते हुए मुझसे बोले - "तू तो रमेशनगर उतर जाइयो।"


उस समय मैं अपने समूचे परिवार के साथ रमेशनगर रहता था। 


अगले दिन मैं सुबह बहुत जल्दी तैयार हो गया। मुझे उम्मीद थी - भारती साहब मेरे यहाँ आयेंगे, क्योंकि उन्होंने मुझसे पटेलनगर आने को नहीं कहा था। 


मैं इन्तजार करता रहा, लेकिन भारती साहब नहीं आये तो मैंने सोचा - 'हो सकता है, वह वालिया साहब के साथ विजय पाकेट बुक्स चले गये हों।' 


दिल में यह उत्सुकता जग गई थी कि विजय जी राजहंस से बात करते हैं या नहीं और अगर बात करते हैं, बातें हुईं  तो क्या बातें हुई होंगी। 


दिल में ख्याल आया कि मुझे भी विजय पाकेट बुक्स में होना चाहिए, पर अकेले जाने का मूड नहीं बन रहा था। सोचा - वालिया साहब के यहाँ जाऊँ, पर फिर सोचा कि पटेलनगर ही चलता हूँ, वहाँ खेल खिलाड़ी की डाक भी देख लूँगा। 


और मैं पटेलनगर पहुँचा। 


वहाँ पहले भारती साहब के फ्लैट में पहुँचा।  


भाभी जी से पता चला कि साढ़े नौ-दस बजे के करीब वालिया साहब आये थे, भारती साहब उन्हीं के साथ उनके स्कूटर पर चले गये। जाते हुए वह आपस में राणा प्रताप बाग जाने का जिक्र कर रहे थे, पर भारती साहब भाभी जी से सीधे कुछ कहकर नहीं गये थे। 


मैं कुछ देर ऊपरी फ्लोर पर खेल खिलाड़ी के आफिस में बैठा रहा। वहाँ नई डाक कोई खास नहीं थी, इसलिए थोड़ी देर बाद सरदार मनोहर सिंह से इजाजत लेकर निकल पड़ा। 


मेन रोड पर पहुँचते-पहुँचते मेरे दिमाग में ख्याल आया, मनोज पाकेट बुक्स चलता हूँ। 


शादीपुर डिपो तक मैं पैदल ही गया। 


वहाँ से उन दिनों मलकागंज की बस बनकर चलती थी। उसका एक स्टाप शक्तिनगर भी होता था। 


शक्तिनगर में अग्रवाल मार्ग पर मनोज पाकेट बुक्स की शानदार कोठी थी, जिसके बेसमेंट में मनोज पाकेट बुक्स का आफिस था और ग्राउण्ड फ्लोर पर भाइयों और माता-पिता के रहने का अलग-अलग पोर्शन था।


मैं बेसमेंट स्थित मनोज पाकेट बुक्स के आफिस में लकड़ी और पारदर्शी शीशे के संयोजन से बने खूबसूरत आफिस में पहुँचा। 


वहाँ काफी बड़ी टेबल के पीछे दो रिवाल्विंग चेयर थीं। और इन्ट्री द्वार के पीछे तीन गद्देदार खूबसूरत कुर्सियां थीं। 


पीछे की रिवाल्विंग चेयर पर बायीं ओर सबसे बड़े भाई राजकुमार गुप्ता और दायीं ओर की चेयर पर गौरीशंकर गुप्ता विराजमान थे। 


मुझे देखते ही गौरीशंकर गुप्ता खूबसूरत हँसी बिखेरते हुए बोले - "आ भई योगेश, तेरे लिए खुशखबरी है।"


"क्या...?" बिल्कुल अन्जान बन, कुर्सी पर बैठते हुए मैंने पूछा। 


"अब से राजहंस भी हमारे यहाँ छपेगा।" जवाब राजकुमार गुप्ता जी ने दिया। 


"यह तो सचमुच बहुत अच्छी खबर है।" मैंने कृत्रिम मुस्कुराहट और खुशी बिखेरते हुए कहा। 


आज मैं सब कुछ सच कह सकता हूँ, पर तब सच का सामना करने की स्थिति में भी नहीं था।


"इसी खुशी में, तेरा मुँह मीठा कराते हैं।" गौरीशंकर गुप्ता बोले। खिलाने-पिलाने में वह हमेशा से बहुत दिलदार थे, जब मैंने उनके यहाँ बाल पाकेट बुक्स लिखने से शुरुआत की थी, तब भी वह चाय के साथ कभी बिस्कुट, कभी मट्ठी, कभी ब्रेड पकौड़ा, समोसा या कचौड़ी मँगवा लेते थे। 


गौरीशंकर गुप्ता ने एक वर्कर को बुला कर ऊपर भेजा। ऊपर घर में पहले से मँगाई मिठाई रखी थी। वर्कर एक ट्रे में - बर्फी, बिस्कुट और नमकीन  की प्लेटें लेकर आया। 


ट्रे उसने टेबल पर बीच में रख दी। 


"ले योगेश, शुरू कर, अभी चाय भी मँगाते हैं।" राजकुमार गुप्ता मुस्कराते हुए बोले।


"कितने में बात हुई..?" मैंने बर्फी के पूरे पीस से एक छोटा टुकड़ा तोड़ कर मुँह में डालने के बाद पूछा। 


"मत पूछ... बड़ा मोटा माल दिया है।" राजकुमार गुप्ता बोले। 


"मोटा कितना...?" मैंने पूछा। 


"क्या करेगा जानकर, तू दस जगह उठता-बैठता है, कहीं मुँह से निकल गया तो अच्छा नहीं होगा।" राजकुमार गुप्ता बोले। 


"आप मुझे जुबान का इतना कच्चा समझते हैं...?" मैं कुछ नाराजगी भरे अन्दाज़  में बोला तो गौरीशंकर गुप्ता झट से बोले - "अरे यार, तू तो बुरा मान रहा है। अरे तुझसे क्या छिपाना, तू तो घर का आदमी है, लेकिन अभी थोड़ा सब्र कर ले। तुझसे कुछ छिपना थोड़े ही है, पर अभी विजय जी का रुख भी देखना है। फिर आयेगा तो आराम से बात करेंगे। अभी तो हमें भी जरा काम से दरीबे जाना है। या तूने भी चलना हो तो चल।"


"मै क्या करूँगा चलकर...।" मैंने कहा। 


"क्यों, घंटे-दो घंटे हमारे साथ बिताने में कोई टोटा है क्या? बहुत ज्यादा बिज़ी चल रहा है?" राजकुमार गुप्ता बोले। 


"नहीं-नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है।" मैंने कहा। 


"तो....चल फिर....।" गौरीशंकर गुप्ता बोले। 


इन्कार की कोई गुंजाइश नहीं थी। मैं साथ चलने के लिए तैयार हो गया। 


मैं आगे ड्राइवर के साथ की सीट पर बैठा। पीछे की सीट पर राजकुमार गुप्ता और गौरीशंकर गुप्ता बैठे। 


ड्राइवर ने कार पत्थरवालान से दरीबा कलां के पीछे के रास्ते की ओर ले जाकर वहीं एक खाली जगह रोक दी। 


हम मनोज पाकेट बुक्स की दुकान पर पहुँचे। नारंग पुस्तक भण्डार की दुकान मनोज पाकेट बुक्स की दुकान के साथ एकदम सटी हुई थी। अत: नारंग पुस्तक भण्डार के स्वामी चन्दर ने मुझे राज और गौरी भाई साहब के साथ देख लिया। उसने तुरन्त आवाज दी - "योगेश, जरा इधर तो आ...।"


"जा, सुन ले, चन्दर की बात।" गौरीशंकर गुप्ता ने मुस्कुराते हुए मुझे इशारा किया तो मैं चन्दर की दुकान पर चढ़ गया। 


चन्दर काउन्टर के पास से मेरा हाथ थाम अपनी संकरी सी दुकान में कुछ पीछे ले गया, जहाँ किताबों के तीन-तीन, चार-चार बण्डलों का लाइन से अम्बार लगा था, जो कि और पीछे नीचे से ऊपर आठ- नौ बण्डलों की पंक्तियों में बदल गया था। 

किताबों के एक बण्डल पर खुद बैठ, दूसरे पर मुझे बैठाकर, चन्दर इस तरह मुझसे बोला, जैसे कोई बहुत ही रहस्य की बात कर रहा हो -"अबे यार, सुना है विजय पाकेट बुक्स और राजहंस के बीच मुकदमा शुरू हो गया।"


मैं हक्का-बक्का रह गया।

 

अभी मुकदमा आरम्भ होने जैसी कोई बात शुरू भी नहीं हुई थी और बुक्स मार्केट के सबसे चर्चित खलीफा के पास मुकदमे की खबर भी पहुँच गई। 


जवाब में मैंने कहा -"यह तो मैं आपके ही मुँह से, पहली बार सुन रहा हूँ।"


"रहने दे यार, मुझे सब मालूम है। 'विजय' में भी तेरा खूब आना-जाना है और मनोज में तो तू घर का ही आदमी है। फिर राजहंस के साथ भी तेरा उठना-बैठना रहा है।"


"नहीं सच, अभी मुकदमे जैसी कोई बात नहीं है। और है तो मुझे पता नहीं।" मैंने कहा। 


"रहने दे यार, मुझे ही गोलियाँ दे रहा है। मुझे मालूम है - तुझे सब पता है।"


"नहीं यार, पता होता तो मैं झूठ क्यों बोलूँगा। इसमें छिपाने वाली कौन सी बात है।" मैंने कहा, लेकिन चन्दर नाराज़ हो गया-"जा यार, हम तो हमेशा से तुझे अपना भाई समझते हैं। मेरठ के हर पब्लिशर से मैं तेरी तारीफ करता रहा हूँ और तू मुझसे ही बात छिपा रहा है। जा, मनोज में जा, राज और गौरी तेरा इन्तजार कर रहे होंगे।"


चन्दर की दुकान से मैं नीचे उतरा ही था कि गर्ग एंड कंपनी में काम करने वाला रमेश निकट आया और बोला - "योगेश जी, ज्ञान भाई साहब, आपको बुला रहे हैं।"


मैं रमेश के साथ ही गर्ग एंड कंपनी पहुँचा। ज्ञानेन्द्र प्रताप गर्ग मुझे बैठाते हुए बड़े प्यार से बोला-"आ भई, अब तो बड़े-बड़े पब्लिशरों का लेखक हो गया है तू - मगर एहसानफरामोश साले, भूल गया, जब मैंने गोलगप्पा में तेरी कहानियाँ छापी थीं, तब तुझे कोई जानता भी नहीं था।"


"नहीं भाई साहब, ऐसी कोई बात नहीं है। काफी दिनों से आपने खुद ही कोई काम नहीं बताया।" मैंने कहा। 


"अबे, काम तो तब बताऊँगा, जब तू आयेगा। तू साले, पीछे से पीछे, मनोज में आकर गायब हो जाता है या वहीं शक्तिनगर में... मराता रहता है।" ज्ञानेन्द्र प्रताप गर्ग ने स्वभावानुसार गन्दी सी गाली देते हुए कहा। 


मुझे गालियों से हमेशा चिढ़ रही है। मैं स्वयं कभी किसी को गालियाँ नहीं देता, ना ही गालियाँ सुनना मुझे अच्छा लगता है, पर गर्ग एंड कंपनी के ज्ञानेन्द्र प्रताप गर्ग की आदत थी, प्यार में भी गालियाँ देने की। 


मगर मैं भी गालियाँ सुन, हमेशा नाराजगी प्रकट करते हुए जरा भी नहीं हिचकिचाता था। 


उस समय ज्ञान का डायलॉग सुन, मैं एकदम खड़ा हो गया और गुस्सा दिखाते हुए बोला- "भाई साहब, हजार बार कहा आपसे, मेरे सामने गालियाँ मत दिया कीजिये। गन्दे शब्द मत निकाला कीजिये।"


ज्ञान ने फौरन मुझे पकड़ कर बैठा दिया और बोला -"अबे यार, तुझे पता है, मेरी आदत है। अच्छा अब ध्यान रखूँगा, बता क्या पियेगा?"


"अपना खून पिला दो।" मैं तब भी गुस्से में था। 


"ले..।" ज्ञान ने पास रखा चाकू मेरी ओर बढ़ा दिया -"जितना चाहिए, निकाल ले।"


बरबस ही मुझे हँसी आ गई। ज्ञान भी हँसा - "साले, हँसता हुआ तू बहुत अच्छा लगता है। गुस्से में तो राक्षस लगता है राक्षस। गुस्सा मत किया कर।"


"ठीक है, यह बताओ, मुझे बुलाया किसलिये...?" मैंने बोरियत जताने का उपक्रम करते हुए पूछा। 


"वैसे ही, किसी काम से नहीं। सुना है - राजहंस मनोज पाकेट बुक्स में छप रहा है और विजय ने उस पर मुकदमा कर दिया है।" ज्ञानेन्द्र प्रताप गर्ग ने कहा। 


और मेरे लिए यह एक और धमाका था। 


दरीबा कलां में चन्दर और ज्ञानेन्द्र प्रताप गर्ग किसी भोंपू से कम नहीं थे। इन दोनों की जुबान से तो झूठ भी निकल जाये तो सच की तरह मशहूर हो जाता था। 


मुकदमे की शुरुआत नहीं हुई थी, मगर पूरी बुक्स मार्केट में मुकदमे की बात फैल गई थी। 


(शेष फिर) 


‼️योगेश मित्तल‼️


आगे क्या हुआ? अभी तो कई 'पंच' सामने आने हैं। आप बताइये - विजय कुमार मलहोत्रा और केवलकृष्ण के बीच अगली मुलाकातें कैसी हुई होंगी? 

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सोमवार, 24 मई 2021

राजहंस बनाम विजय पॉकेट बुक्स -3

मई 24, 2021 0

 हिन्द व मनोज  Vs. विजय पाकेट बुक्स

राजहंस बनाम विजय पॉकेट बुक्स

आप में से कितने लोग शराब पीते हैं और कितनी..? जो नहीं पीते, सवाल उनसे नहीं है। जो शराब को बुरी चीज़ समझते हैं, सवाल उनसे भी नहीं है। सवाल सिर्फ उनसे है, जो शराब पीते हैं। सवाल उनसे भी है, जो शराब पीते तो नहीं, पर शराब को बुरी चीज़ नहीं समझते। सवाल उनसे भी है,जो कभी-कभार मित्रों को कम्पनी देने के लिए घूँट, दो घूँट कहें या पैग-दो पैग हलक से नीचे उतार लेते हैं। सवाल उनसे भी है, जो दिन भर की थकान उतारने के लिए रात को सोने से पहले शराब का एक-आध पैग लेने में कभी कोई हर्ज नहीं समझते। 


और आपका जवाब जो भी हो, एक बात निश्चित जान लीजिये, शराब आखिर शराब है। आज आप उसे थकान दूर करने के लिए लेते हों, दवा के तौर पर लेते हों, अगर आपने खुद पर अंकुश नहीं रखा तो 'दवा' का 'दर्द' बनना तय है। 


केवलकृष्ण शराब तब भी पीते थे, जब वह एक साधारण सी दवा कम्पनी के मामूली एजेन्ट थे, पर तब उन्हें दिन भर घूमना पड़ता था। पैदल हों, चाहें स्कूटर पर गली-गली खाक छाननी पड़ती थी। किसी डाक्टर के पास तो किसी केमिस्ट के पास। दवाओं के बारे में बताते-बताते जुबान भी थक जाती थी। घुटनों और कूल्हों में भी दर्द होने लगता था, ऐसे में रात को खाने से पहले एक छोटा पैग ले लेने से, सोने के बाद तसल्ली की नींद आ जाती थी। उन दिनों एक ही अद्धा चार या पाँच दिन भी चल जाता था। 


पीते तो थे ही, इसलिए पीना कभी पाप नज़र नहीं आया, लेखक बने तो लेखकों और प्रकाशक महोदय के साथ पीने का अवसर मिला, जब गाँठ से अपना एक पैसा खर्च नहीं हो रहा था तो भी केवलकृष्ण को अपने पीने की सीमा पता थी। आरम्भ में वह एक पैग से ज्यादा नहीं पीता था, विजय कुमार मलहोत्रा की आदत थी - वह किसी पर भी, कभी भी, अधिक पीने के लिए दबाव नहीं डालते थे, मगर जहाँ चार यार जमा हो जायें, ना-नुकुर बेकार हो जाती है। मैं यह नहीं कहूँगा कि किन लोगों की सोहबत में केवलकृष्ण उर्फ़ राजहंस अधिक पीने लगे, मगर यह हकीकत है कि एक से दो, दो से तीन, तीन से चार, फिर पाँच-छ: पैग भी डकार लेना, राजहंस के लिए आम बात हो गई। 


और जब एक उपन्यास का पारिश्रमिक तीस चालीस हज़ार की सीमा तक आ गया तो अपने लिए मंहगी शराब खरीदना और घर में भी 'कोटा' रखना भी आम बात हो गई।


हिन्द पाकेट बुक्स और मनोज पाकेट बुक्स में राजहंस की इन्ट्री के बाद जब भी विजय कुमार मलहोत्रा ने केवलकृष्ण उर्फ़ राजहंस से मिलना चाहा, वह या तो घर में नहीं मिला या पता चला अभी आराम कर रहे हैं और फिलहाल बातचीत करने की स्थिति में नहीं हैं।


कोई भी फैसला करने से पहले विजय कुमार मलहोत्रा एक बार केवलकृष्ण से बात करना चाहते थे और बात नहीं हो पा रही थी। समय नष्ट हो रहा था। 


विजय कुमार मलहोत्रा बहुत शान्तिप्रिय व्यक्ति थे। जो लोग उन्हें जानते हैं, यह भी जानते रहे हैं कि वह बहुत शान्त रहते थे। उन्हें क्रोध में बहुत कम लोगों ने देखा होगा। 


मैंने अन्य बहुत से प्रकाशकों को अपने वर्कर्स पर बहुत बार क्रोधित होते हुए देखा है। लेकिन विजय कुमार मलहोत्रा वर्कर्स पर काम धीरे करने या किसी अन्य बात के लिए गुस्सा करते भी थे तो उनकी आवाज नाराजगी प्रकट करने की होती थी। शिकायती अन्दाज़ होता था। तेज आवाज में चिल्लाते हुए क्रोधित होते हुए विजय कुमार मलहोत्रा को उनके घर के लोगों ने कभी देखा हो तो देखा हो, बाहरी व्यक्तियों ने शायद ही देखा हो। 


जब कई दिनों तक केवलकृष्ण से मुलाकात और बात नहीं हुई तो विजय कुमार मलहोत्रा ने अपने छोटे भाई सुभाष से कहा कि 'यार, केवल से बात नहीं हो पा रही है, तू सारे काम छोड़ उससे बात कर, किसी तरह एक बार उसे लेकर आ...। चाहें तुझे दिन भर केवल के घर के बाहर ड्यूटी देनी पड़े, लेकिन देख, बात आराम से करनी है। अपना टेम्पर बिल्कुल कन्ट्रोल में रखना है। समझ ले - केवल हमारा भाई है और तू भाई से बात करने जा रहा है।'


विजय जी का छोटा भाई सुभाष बचपन से ही दबंग और गुस्सैल था, पर वह अपने बड़े भाई की बहुत इज्जत करता था। विजय कुमार मलहोत्रा की कही बात उसके लिए ब्रह्म वाक्य थी, पत्थर की लकीर थी, किन्तु सुभाष का गुस्सा भी मशहूर था और यह भी कि उसे गुस्सा आ जाये तो वह हाथ-पैर चलाने में भी नहीं हिचकता। 


विजय कुमार मलहोत्रा आम तौर पर स्कूटर ही चलाते थे, किन्तु उनके पास एक पुराने जमाने की एक शानदार कार भी थी और एक फिएट भी। 

सुभाष के पास एक मोटर साइकिल और एक वैन सरीखी काले रंग की कार थी। सुभाष ने अपनी कार 'राजहंस' के घर से कुछ दूर खड़ी कर दी और कार में बैठकर राजहंस का इन्तजार करता रहा और दोपहर बाद जब किसी काम से केवलकृष्ण घर से बाहर निकले तो सुभाष अपने गुस्सैल स्वभाव के विपरीत अनुनय-विनय करके उन्हें विजय पाकेट बुक्स के आफिस में ले आया। केवलकृष्ण के मुँह से उस समय भी 'व्हिस्की की स्मेल' आ रही थी, पर वह नशे में टुल्ल नहीं थे। 


विजय कुमार मलहोत्रा ने केवलकृष्ण से मनोज और हिन्द में जाने की वजह पूछी तो केवलकृष्ण का कहना था कि उनकी आफर ही ऐसी थी कि इन्कार किया ही नहीं जा सकता था। 


विजय जी ने कहा कि एक बार मुझसे बात तो करनी थी। मुझे उनकी आफर के बारे में बताना तो था। हो सकता है - हम आपस में बात करते तो कोई अच्छा रास्ता निकल जाता। 


फिर विजय कुमार मलहोत्रा और केवलकृष्ण में दोस्ताना लहजे में भी काफी देर तक बात हुई। केवलकृष्ण का कहना था कि अब तो हिन्द और मनोज से पक्की बातचीत हो चुकी है। उन्हें उपन्यास भी दे दिये हैं। अब कुछ नहीं हो सकता, लेकिन वह विजय पाकेट बुक्स में भी उपन्यास देते रहने की कोशिश करेंगे। 


परन्तु सबसे बड़ी बात विजय पाकेट बुक्स की प्रतिष्ठा की थी। पुस्तक विक्रेताओं में जैसी धूम उपन्यासकार राजहंस की थी, वैसी ही प्रतिष्ठा विजय पाकेट बुक्स की भी थी, बल्कि उन दिनों नये लेखकों "वासुदेव, हरविन्दर, मीनू वालिया और सावन को उनके नाम और तस्वीर के साथ छापने के कारण पुस्तक विक्रेताओं में विजय पाकेट बुक्स का नाम अधिक प्रतिष्ठित था। हिन्द, स्टार और मनोज में इतने ज्यादा फोटो वाले लेखक नहीं थे, जो कि अच्छे बिकाऊ भी थे। 


राजहंस का विजय छोड़ कहीं और छपने का मतलब आम लोगों में यही सन्देश जाना था कि जरूर विजय पाकेट बुक्स ने राजहंस के साथ कुछ अन्याय किया होगा और विजय कुमार मलहोत्रा का मानना था कि अगर वह कोई एक्शन नहीं लेते, राजहंस से अपने रिश्तों का ख्याल करके खामोश बैठ जाते तो आर्थिक नुक्सान तो जो होना था, वह तो होता ही, प्रतिष्ठा भी धूल धूसरित होती। विजय कुमार मलहोत्रा को ऐसे समय क्या किया जाये, तत्काल ही कुछ समझ में ही नहीं आया। 


उन दिनों पटेलनगर, राज भारती जी के यहाँ फोन नहीं था, पर पटेलनगर की उस बिल्डिंग में एक फोन था - खेल खिलाड़ी के आफिस में, जो कि दूसरी मंजिल पर था। भारती साहब और उनके दूसरे-तीसरे नम्बर के भाई पहली मंजिल पर रहते थे। सबसे छोटा भाई किशन ग्राउंड फ्लोर में माताजी-पिताजी के साथ रहता था। 


चूंकि खेल खिलाड़ी में छपने वाले आर्टिकल का फैसला मैं ही करता था और प्रूफरीडिंग भी मैं ही करता था, इसलिए मैं हर दूसरे तीसरे दिन आकर खेल खिलाड़ी की डाक पर नज़र डाल लेता था, लेखकों के तथा अन्य आवश्यक पत्रों का उत्तर दे देता था। 

पुस्तक विक्रेताओं के पत्रों का उत्तर देने के लिए सरदार मनोहर सिंह से जवाब पूछना पड़ता था तो वे जवाब पूछकर दे दिया करता था। 

मेरा रोज आफिस आना जरूरी न था। सरदार मनोहर सिंह की ओर से मेरे आने-जाने के टाइम की भी कोई बन्दिश नहीं थी। मैं खेल खिलाड़ी का सम्पादक था, किन्तु सम्पादक और प्रकाशक के रूप में मेरे द्वारा खेल खिलाड़ी का काम सम्भालने से पहले ही सरदार मनोहर सिंह का नाम छपता था। तब किसी का नाम सह-सम्पादक के रूप में नहीं छपता था। मेरे द्वारा काम सम्भालने के बाद सह-सम्पादक के रूप में मेरा नाम "योगेश मित्तल" छपने लगा था। 


मैं खेल खिलाड़ी के आफिस में था, जब ग्यारह बजे के करीब घंटी बजी। फोन मैंने उठाया । 


"करतार है क्या?" दूसरी ओर से विजय कुमार मलहोत्रा जी की आवाज आई। 


"हाँ, हैं।" मैंने कहा -"नीचे हैं, अभी बुलाता हूँ।"


"योगेश बोल रहा है...?" आवाज पहचान विजय जी ने पूछा। 

 

"हाँ...।" मैंने कहा। 


"मैं विजय बोल रहा हूँ। करतार को बोल, फौरन राणा प्रताप बाग पहुँचे। मैं इन्तजार कर रहा हूँ।" दूसरी ओर से यह कहकर विजय कुमार मलहोत्रा ने फोन रख दिया।


मैं नीचे गया। भारती साहब के फ्लैट में पहुँच, उन्हें विजय कुमार मलहोत्रा का सन्देश दिया। भारती साहब सोच में पड़ गये - ऐसा क्या जरूरी काम आ पड़ा, कहीं उनके या वालिया के उपन्यास में मैटर कम-ज्यादा तो नहीं पड़ गया। 


"चल, तू भी साथ चल।" भारती साहब मुझसे बोले-"मैटर कम-ज्यादा हुआ तो तू देख लेना।"


भारती साहब ऐसे कामों में मुझे सबसे ज्यादा एक्सपर्ट मानते थे। बाद में मेरठ के प्रकाशकों ने भी मेरी इस खूबी का खूब फायदा उठाया। गौरी पाकेट बुक्स के अरविन्द जैन ने तो, जब वह पूजा पाकेट बुक्स चलाते थे, तब मुझसे वेद प्रकाश वर्मा, कुमार कश्यप और कई अन्य लेखकों के उपन्यासों में दो-दो, तीन-तीन फार्म का मैटर बढ़वाया था। लेखक की शैली से शैली मिलाकर उपन्यास का मैटर बढ़ाने में मुझे महारत हासिल थी। 


हमने पटेलनगर से मोतीनगर की बस पकड़ी और फिर उन दिनों कर्मपुरा से बनकर मलकागंज जाने वाली 81 नम्बर की बस पकड़ी, जिससे शक्तिनगर के स्टाप पर उतर गये, वहाँ से राणा प्रताप बाग अन्दर तक जाने के लिए रिक्शा पकड़ा और एक-सवा घंटे के बाद विजय पाकेट बुक्स के आफिस पहुँच गये। 


आफिस में अपनी कुर्सी पर विजय कुमार मलहोत्रा बहुत परेशान बैठे थे। बस, उन्होंने अपना माथा नहीं पकड़ रखा था यही गनीमत थी। 


हम बैठे तो हमारे सामने उन्होंने हिन्द पाकेट बुक्स और मनोज पाकेट बुक्स के सर्कुलर रख दिये।


इन्देश ने तत्काल एक ट्रे में पानी के तीन गिलास टेबल पर रख दिये, किन्तु हम में से किसी ने भी पानी का गिलास नहीं उठाया। मैं और भारती साहब उन दोनों सर्कुलर्स को हक्के-बक्के से देख रहे थे। 


मेरे और भारती साहब के लिए वे सर्कुलर अचम्भा ही थे, क्योंकि हम दोनों यही जानते थे कि विजय कुमार मलहोत्रा और केवलकृष्ण कालिया के आपसी सम्बन्ध अत्यन्त प्रगाढ़ हैं। उनके बीच घरेलू सम्बन्धों जैसा रिश्ता है। 


"ये क्या हो गया...?" भारती साहब ने अफसोस जताने वाले अन्दाज़ में पूछा तो अनायास ही विजय कुमार मलहोत्रा की आँखों में आँसू आ गये। एकदम वह कुछ नहीं बोल सके। 


मेरे जीवन में वह पहला और आखिरी मौका था, जब मैंने विजय कुमार मलहोत्रा जैसे मजबूत इन्सान की आँखों में आँसू देखे। 


भारती साहब ने कुछ देर विजय कुमार मलहोत्रा को सिसकने दिया। जब उनके मन का गुब्बार कुछ हल्का हुआ और आँसू पोंछ वह सामान्य हुए तो भारती साहब पंजाबी में बोले -"हुण दस्सो, कि गल्ल है, ये सब क्या है..? कैसे हो गया यह सब...?"


विजय कुमार मलहोत्रा ने धीरे धीरे हमें वह सब कह सुनाया, जो पिछले कुछ दिनों में गुजरा था। बाहरी पुस्तक विक्रेताओं से हिन्द और मनोज के सर्कुलर मिलने और फिर मुश्किलातों के बाद केवलकृष्ण से मिलने का सारा वाकया विजय जी ने विस्तार से कह सुनाया। अन्त में बोले - "समझ नहीं आ रहा, हुण की करिये...।"


"करना क्या है।" भारती साहब बोले -"अगर आपसी सहमति से बात नहीं बन रही तो किसी न किसी अच्छे वकील से तो बात करनी ही पड़ेगी।"


"यार, अच्छा नहीं लगता। रोज साथ उठना-बैठना, खाना-पीना चलता रहा है। हर तरह का हँसी-मज़ाक होता रहा है। मेरे साथ सुभाष से भी ज्यादा अच्छा रिश्ता था केवल का। बरसों का रिश्ता एकदम ऐसे खत्म तो नहीं किया जा सकता।"


"आप कहो तो हम केवल के घर जाकर कुछ बात करें?" भारती साहब ने कहा। 


"उसका कोई फायदा नहीं मिलेगा। मैंने दसियों बार कोशिश की, हर समय वह टुल्ल मिला। बाद में सुभाष उसे साथ लेकर आया तो भी शराब की महक उसके मुँह से आ रही थी। मुझे तो डर लग रहा है कि कहीं इस तरह केवल खत्म ही न हो जाये। पीना कोई बुरा नहीं है। हम भी पीते हैं, पर पिछले दिनों केवल का जो हाल देखा है, डर है कि उसका प्रभाव कहीं उसके लिखने पर भी न पड़े। मैंने यह सारी बातें भी उसे समझाने की कोशिश कीं, पर पता नहीं उस पर मेरी बातों का कुछ असर हुआ भी या नहीं।"


मामला गम्भीर था। 


सलाह देने के तौर पर भारती साहब बोले - "आप ही देख लो, क्या करना है। एक-दो मीटिंग और करके देखो, शायद कुछ हल निकल आये, मामला कोर्ट तक न जाये तो अच्छा है।"


दोस्तों, आरम्भ में मैंने शराब की बात यूँ ही नहीं की थी। पहले आदमी शराब पीता है। फिर शराब उसे पीने लगती है। आपने विजय पाकेट बुक्स में केवलकृष्ण के उपन्यास पढ़े हैं और बाद में बाहरी फर्मों में प्रकाशित हुए उपन्यास भी। ज्यादा न सही कुछ थोड़ा सा फर्क तो आपने जरूर महसूस किया होगा। विजय पाकेट बुक्स से सम्बन्ध विच्छेद के बाद केवलकृष्ण उर्फ़ राजहंस शराब भी ज्यादा ही पीने लगे थे। यह खबर मुकदमे की शुरुआत के बाद विजय जी को भी केवलकृष्ण के करीबी मित्रों से मालूम हो गई थी, लेकिन वह कुछ नहीं कर सकते थे, क्योंकि तब डाँटने और नाराज़ होने का अधिकार भी उनके पास नहीं रहा था। 


केवलकृष्ण बहुत ही इमोशनल शख्स थे। आर्थिक आवश्यकताएँ बढ़ने पर अपने बाल-बच्चों की फिक्र के कारण, काफी कुछ सोचने के बाद ही उन्होंने हिन्द और मनोज में उपन्यास देने का मन बनाया था, किन्तु विजय पाकेट बुक्स को भी छोड़ने की उनकी कतई इच्छा नहीं थी, पर वह विजय जी से जब भी मिले, नशे में मिले। शायद इसीलिए खुलकर अपनी बात समझा नहीं सके। ना ही वह विजय कुमार मलहोत्रा की बात समझ सके। 


नतीजा - वही हुआ, जो होता दिखाई दे रहा था। 


(शेष फिर) 


‼️योगेश मित्तल‼️


और फिर कैसे शुरू हुआ कोर्ट का चक्कर....?`

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रविवार, 23 मई 2021

राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स - 2

मई 23, 2021 2

 सम्बन्धों में खटास की शुरुआत

लेखक योगेश मित्तल
योगेश मित्तल

लेखक सैकड़ों पैदा हुए हैं, हैं और होते रहेंगे, लेकिन ऐसे कुछ ही लेखक होते हैं, जिन्हें पढ़ने के बाद आप उनकी लेखनी के प्रभाव से काफी देर तक अपने आपको मुक़्त न करा सकें।

 

ऐसे लेखक भी बहुत होंगे, जिनकी कृति का कथानक आपके दिल में चलचित्र सा घूमने लगे, लेकिन अगर आप स्वयं भी एक लेखक हैं तो किसी अन्य लेखक की कृतियाँ पढ़कर आपके लेखन में उसी लेखक की शैली जड़ें जमा ले, आप भी उसी लेखक की तरह लिखने लगें तो उस लेखक की शैली का लोहा तो आपको मानना ही पड़ेगा। 


ऐसे ही एक लेखक हुए हैं गोविन्द सिंह। गोविन्द सिंह की लेखन शैली का कमाल था कि पढ़ते हुए लगता था कि घटनाएँ कहीं इर्दगिर्द, कहीं निकट ही घट रही हैं। 


सुमन पाकेट बुक्स में रतिमोहन नाम से गोविन्द सिंह ही लिखते थे और अगर आप एक लेखक हैं तो रतिमोहन या गोविन्द सिंह के कुछ उपन्यास पढ़ने के बाद अपनी कहानी या उपन्यास लिखिये, आपके लेखन में उनकी भाषा शैली का प्रभाव अवश्य आ जायेगा। 


रतिमोहन (गोविन्द सिंह) के उपन्यासों में घटनाक्रम बहुत ज्यादा नहीं होता था, भावाव्यक्ति अधिक होती है। 


अब आयें "शेखर" के उपन्यासों की खूबियों पर। डाकुओं पर बेहतरीन उपन्यास लिखने वाले रामकुमार भ्रमर ही "शेखर" नाम से लिखते थे। उनके उपन्यास में घटनाएँ और भावाव्यक्ति साथ-साथ चलती थी और शेखर की शैली में भी कुछ ऐसा जादू था कि आप उसके पांच-छ: उपन्यास पढ़ने के बाद अपनी कहानी या उपन्यास लिखें तो आपकी भाषा "शेखर" की लेखन शैली के प्रभाव में अवश्य आ जायेगी। 


केवलकृष्ण कालिया उर्फ़ राजहंस। 


राजहंस उर्फ़ केवलकृष्ण कालिया की कलम में बाकी दोनों के मुकाबले कुछ ज्यादा ही विशेष खासियत थी, उनकी पंक़्तियां व डायलॉग सिर्फ भावनाओं को ही नहीं छूते थे, दिल और दिमाग में धमक भी पैदा करते थे। घटनाएँ दिल और दिमाग को अक्सर झटका सा देते हुए साथ-साथ चलती थीं। 


राजहंस के उपन्यास प्रकाशित होने के साथ ही चर्चा का विषय होने लगे थे। समाज में औरत और सैक्स के लिए पुरुषों की सोच और व्यवहार को राजहंस ने आईना दिखाया था और बड़े साहस के साथ बड़े 'बोल्ड' कथानक पेश किये थे। 


उनके कथानक की भिन्नता और साहसिक विषयों ने आम पाठकों को जितना प्रशंसक बनाया, उतना ही तात्कालीन लेखकों को भी प्रभावित किया। पाकेट बुक्स लाइन के लगभग सभी लेखकों ने राजहंस को दिल से सराहा।


वासुदेव, हरविन्दर, यशपाल वालिया और राज भारती भी राजहंस के बहुत तगड़े प्रशंसक थे और उनमें से किसी ने भी यह बात कभी भी छिपाई नहीं। 


उन दिनों आप इनमें से किसी भी लेखक के घर जाते तो उसके यहाँ राजहंस के कुछ उपन्यास दिखाई न दें, यह सम्भव ही नहीं था। 


मैं बहुत जल्दी किसी शैली के प्रभाव में नहीं आता, लेकिन जब मैं जनता पाकेट बुक्स के लिए मेजर बलवन्त नाम के लिए "चीख का रहस्य" लिख रहा था, उसमें राजहंस की शैली के प्रभाव आये बिना न रह सका, क्योंकि वह उपन्यास लिखना आरम्भ करने से पहले मैंने भी राजहंस के एक-दो उपन्यास पढ़े थे। 


अब मैंने जिन लेखकों की लेखन शैली के जादू से आपको परिचित कराया है, आप यदि लेखक हैं तो उनके उपन्यास पढ़कर भी अगर कहें कि आप पर उस लेखक की लेखन शैली का प्रभाव नहीं पड़ा तो यकीन मानिए या तो आपने उपन्यास ठीक से नहीं पढ़े या उनके प्रभाव से स्वयं को बचाने के लिए जरूरत से ज्यादा सतर्क हो गये हैं या आप झूठ बोल रहे हैं। 


खैर, वासुदेव, हरविन्दर, यशपाल वालिया और राजभारती जी उन दिनों हिन्दी में राजहंस के उपन्यासों के अलावा किसी दूसरे लेखक को पढ़ ही नहीं रहे थे और यह राजहंस की जादुई लेखनी का प्रभाव था कि उन सबकी लेखन शैली राजहंस जैसी हो रही थी। 


विजय कुमार मलहोत्रा ने किसी लेखक से नहीं कहा था कि वह राजहंस जैसी शैली में लिखे। किसी भी लेखक ने जान बूझकर राजहंस की शैली नहीं अपनाई थी, लेकिन असर तो आ गया था और केवलकृष्ण कालिया उर्फ़ राजहंस को यही लगा कि ऐसा जानबूझकर किया जा रहा है या करवाया जा रहा है। यह अनावश्यक कड़वाहट उत्पन्न होने का कारण था। 


मज़े की बात यह है कि उन दिनों खुद को साहित्यिक लेखक मानने वाले कई लेखक राजहंस की शैली को दोषपूर्ण और अशुद्ध मानते थे। 


मैं किसी का नाम लेकर विवाद खड़ा नहीं करना चाहता, लेकिन यह सच्चाई है कि तब कई लेखकों ने परस्पर बातचीत में राजहंस के अमूमन वाक्यों में 'था, थे, थी' के प्रयोग को दोषपूर्ण ठहराया था।


उन दिनों दिल्ली में बेशक हिन्द पाकेट बुक्स, स्टार पाकेट बुक्स, मनोज पाकेट बुक्स, अशोक पाकेट बुक्स, साधना पाकेट बुक्स और विजय पाकेट बुक्स जैसे दिग्गज प्रकाशक थे, जिनके यहाँ कोई भी किताब पांच हज़ार से कम नहीं छपती थी, तो भी प्रकाशकों और लेखकों का गढ़ तब भी मेरठ ही कहलाता था। 


उन दिनों दिल्ली के प्रकाशन क्षेत्र में यह बात मशहूर थी कि मेरठ के प्रकाशक जब चाहें - किसी भी लेखक का दिमाग खराब कर सकते हैं।


मुझे यह तो पता नहीं कि उन दिनों राजहंस उर्फ़ केवलकृष्ण से मिलने मेरठ के कुछ या कई प्रकाशक आये या नहीं, लेकिन एक बात मालूम है कि लेखकों से मिलने के लिए उनके प्रशंसक आये दिन आते रहते थे। बिमल चटर्जी और राज भारती जी से मिलने के लिए आने वाले दिल्ली से बाहर के कई प्रशंसकों से मैं भी मिला हूँ। 


राजहंस की तो उन दिनों धूम थी। उनसे मिलने भी अक्सर उनके "फैन" आते रहते थे। ऐसे ही एक दो अवसरों पर ऐसे "फैन" भी आये, जिन्होंने राजहंस को जतलाया कि मेरठ में उनके एक-एक उपन्यास का उन्हें एक-एक लाख तक मिल सकता है, किन्तु केवलकृष्ण मेरठ में छपने के लिए स्वयं को तैयार नहीं कर सके।


बड़े प्रकाशक जब किसी दूसरी फर्म के लेखक को अपनी फर्म में लाना चाहते हैं तो बातचीत की शुरुआत हमेशा बिचौलियों से करते हैं। खुद तब सामने आते हैं, जब बातचीत नतीजे का रूप धारण करने के कगार पर होती है। लेकिन यह स्टाइल तब के दिल्ली के प्रकाशकों का था, मेरठ के प्रकाशकों के बारे में तब दूसरी ही कहानी कही जाती थी। उन्हें तो किसी अन्य फर्म के किसी लेखक को अपने पाले में लाना होता था तो ब्रीफकेस नोटों से भरकर खुद ही लेखक के घर पहुँच जाते थे। 


No बिचौलिया, कोई बिचौलिया नहीं, इसलिए मेरठ के प्रकाशक जब किसी दूसरी फर्म के किसी लेखक को तोड़ते थे तो एकदम धमाका होता था, ऐसे धमाके मैंने तब देखे थे, जब मैं बिमल चटर्जी के साथ हुआ करता था और बिमल चटर्जी ज्योति पाकेट बुक्स के विपिन जैन के लिए लाला के बाजार स्थित कृष्णा लाज में ठहरें हुए एक उपन्यास पूरा कर रहे थे और मैं भी बिमल चटर्जी के साथ ठहरा हुआ था। तब मेरठ के अनेक प्रकाशक ब्रीफकेस लिए बिमल से मिलने आये थे। यह नहीं था कि ब्रीफकेस नोटों से ठसाठस भरा होता था, पर नोट ब्रीफकेस में ही होते थे। पर खैर... यह राजहंस बनाम विजय पाकेट बुक्स के विषय से बाहर की बात है। 


असली बात यह है कि दिल्ली के प्रकाशकों ने बिचौलियों के जरिये लम्बी बातचीत कर राजहंस को अपने यहाँ छपने के लिए तैयार कर लिया और फिर बातचीत पक्की करने के लिए खुद आगे आ गये और विजय पाकेट बुक्स के विजय कुमार मलहोत्रा को पता ही नहीं चला कि कब प्रतिद्वंद्वियों ने उनकी फर्म के लौह स्तम्भ को जमीन से उखाड़ दिया। 


उन्हें तो तब पता चला, जब उनकी मेज पर दो अलग-अलग पाकेट बुक्स फर्मों के दो सर्कुलर आ गये। और वे सर्कुलर थे - हिन्द पाकेट बुक्स और मनोज पाकेट बुक्स के, जिनमें घोषणा थी कि "राजहंस" का आगामी नया उपन्यास.......... उनके यहाँ से आ रहा है। 


आगे बढ़ने से पहले उन लोगों को सर्कुलर के बारे में विस्तृत जानकारी दे दूँ - जो प्रकाशन जगत की किसी भी जानकारी से अनभिज्ञ हैं।

 

सर्कुलर प्रकाशक की ओर से पुस्तक विक्रेता को भेजा हुआ एक पैम्फलेट होता है, जिसमें प्रकाशक आने वाले सैट में क्या क्या छाप रहा है, इसकी पूरी जानकारी होती है और तब यह प्रचलन था कि हर नया सैट भेजने से पहले प्रकाशक - अपने सैट की जानकारी भेजने के लिए पुस्तक विक्रेता को लगभग एक माह पहले सर्कुलर अवश्य भेज देते थे, जिससे पुस्तक विक्रेता सैट डिस्पैच होने के वक़्त से काफी पहले ही अपना बढ़ा या घटा हुआ आर्डर भेज दें। 


अधिकांशतः सर्कुलर ए फोर साइज का होता था, लेकिन मनोज पाकेट बुक्स तथा कई अन्य प्रकाशकों द्वारा दूसरों से भिन्नता रखने के लिए कई बार ए फोर से डबल ए थ्री साइज के सर्कुलर भी निकाले जाते थे। 


तब ऐसा भी होता था, जब प्रकाशक के पास किसी पुस्तक विक्रेता का बढ़ा हुआ आर्डर डिस्पैच के वक़्त तक नहीं पहुँचता था, तब प्रकाशक डिस्पैच रजिस्टर में उसका पिछला आर्डर देख, उतनी ही संख्या में माल भेज देते थे, जितना पिछले सैट में भेजा गया था। जब भी कभी प्रकाशकों को अपने सैट के लेखकों में कुछ नया बदलाव करना होता था, सर्कुलर अवश्य भेजा जाता था। 


अब एक खास बात और.. वह यह कि विजय पाकेट बुक्स के विजय कुमार मलहोत्रा जी के दिल्ली से बाहर के बहुत सारे पुस्तक विक्रेताओं से बहुत अच्छे सम्बन्ध थे। उन दिनों पुस्तक विक्रेताओं से उतने गहरे सम्बन्ध मनोज पाकेट बुक्स अथवा हिन्द पाकेट बुक्स के मालिकों के नहीं थे। इसके कई कारणों में से एक मुख्य यह था कि विजय कुमार मलहोत्रा जिससे भी मिलते थे - एक मित्रवत इन्सान की तरह मिलते थे। उनसे मिलते हुए न तो किसी पुस्तक विक्रेता को प्रकाशक और पुस्तक विक्रेता का सा फासला महसूस होता था ना ही लेखक को - लेखक व प्रकाशक जैसा व्यवहार महसूस होता था। विजय कुमार मलहोत्रा का व्यवहार सबसे दोस्ताना सा होता था। व्यापार की बात से पहले सुख-दुख और पहले पानी बिना किसी बात या पूछताछ के पेश करवाना, फिर चाय-नाश्ते के बारे में पूछना उनके व्यवहार का एक हिस्सा था। मुझे अच्छी तरह याद है - जब हम नई दिल्ली रेलवे स्टेशन स्थित विजय जी के बुक स्टाल पर पहुँचते थे, स्टाल पर काम करने वाला विजय जी का कारिन्दा, उनके बिना कहे ही पानी के गिलास सामने पेश कर देता था। हमारे पानी पीने के बाद ही विजय जी चाय का आर्डर देते थे, लेकिन आर्डर देने से पहले वह पंजाबी टच हिन्दी में खाने के लिए भी पूछ लेते थे, वो भी इस तरह से ब्रेड पकौड़ा चलेगा या समोसा-कचौड़ी। हाँ, मना करने पर कोई जबरदस्ती नहीं करते थे, पर चाय जरूर आती थी। 


एक खास बात और कि दिल्ली से बाहर से ट्रेन द्वारा आने वाले पुस्तक विक्रेता अक्सर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरते तो विजय जी उन्हें उनकी आवश्यकता का माल (पुस्तकें - उपन्यास, पत्रिकाएँ, जनरल बुक्स आदि) वहीं होलसेल रेट पर दे देते थे, जिससे पुस्तक विक्रेता का समय बहुत बच जाता था और इस तरह, इसलिए भी विजय जी के पुस्तक विक्रेताओं से सम्बन्ध प्रगाढ़ हो गये थे। 


तो जब पुस्तक विक्रेताओं के पास हिन्द और मनोज के सर्कुलर पहुँचे, उन्होंने अपना आर्डर तो एक पोस्ट कार्ड पर लिख कर भेज दिया और सर्कुलर विजय कुमार मलहोत्रा तक पहुँचा दिया। वैसे भी उन दिनों पोस्ट कार्ड पांच पैसे का होता था और लिफाफा पन्द्रह पैसे का। पुस्तक विक्रेता सर्कुलर में आर्डर भरकर भेजते तो ख्वामखाह पन्द्रह पैसे फूंकने पड़ते थे, जबकि पोस्ट कार्ड में आर्डर लिखकर भेजने से दस पैसे बच जाते थे। 


आज सौ के नोट की भी बहुत ज्यादा वैल्यू नहीं है, लेकिन तब पांच-पांच पैसे की वैल्यू होती थी। यह सब बातें इतनी बारीकी से मुझे इसलिए पता हैं, क्योंकि तब दिल्ली के गाँधी नगर से निकलने वाली पंकज पाकेट बुक्स और जनता पाकेट बुक्स के सारे काम मेरी आँखों के सामने होते रहे थे और भारती पाकेट बुक्स और विनय पाकेट बुक्स में भी सर्कुलर और आर्डर देखने के अवसर मुझे मिलते रहे थे। 


हिन्द और मनोज के जब सर्कुलर विजय कुमार मलहोत्रा के सामने आये तो उन्होंने केवलकृष्ण से मिलने की बहुत चेष्टा की, किन्तु जिस केवलकृष्ण से उनका मिलना हमेशा बड़ी आसानी से हो जाता था, उससे कई दिनों तक मुलाकात नहीं हुई। विजय कुमार मलहोत्रा ने किसी वर्कर को केवलकृष्ण के घर भेज कर मैसेज भी पहुँचवाये। 


पर विजय कुमार मलहोत्रा भी इस बात पर अडिग थे कि इस बारे में पहले केवलकृष्ण से बात करनी है, फिर सोचेंगे कि क्या करना है। 


(शेष फिर) 


और फिर मुकदमे की नौबत कैसे आई और किसने किया मुकदमा?

- योगेश मित्तल

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